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Home»व्यक्ति विशेष»Mahatma Gandhi: मोहनदास अर्थात हाड़-माँस का वह अकल्पनीय पुतला, जो दूसरा बन ही नहीं सकता!
व्यक्ति विशेष 15 Mins Read

Mahatma Gandhi: मोहनदास अर्थात हाड़-माँस का वह अकल्पनीय पुतला, जो दूसरा बन ही नहीं सकता!

Prime Time BharatBy Prime Time BharatOctober 2, 2024No Comments
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  • -त्रिभुवन
    • (लेखक त्रिभुवन राजस्थान के वरिष्ठ पत्रकार हैं)
-त्रिभुवन

महान वैज्ञानिक अल्बर्ट आइंसटीन ने महात्मा गांधी के बारे में एक बार कहा था: आने वाली पीढ़ियां शायद ही कभी विश्वास करें कि इस धरती पर हाड़-माँस का कोई ऐसा पुतला भी रहा था। अल्बर्ट आइंसटीन ही नहीं, विश्व के अनेक प्रसिद्ध वैज्ञानिकों, विचारकों और दार्शनिकों ने गांधीजी के बारे में ऐसा कहा है, जो उनके व्यक्तित्व को नभस्पर्शी, युगांतरकारी और असाधारण बनाता है। रोम्यां रोलां हों या ईएम फोर्स्टर, अर्नाल्ड टॉयन्बी हों या ऐल्डस हक़्ज़ले, लुई फ़िशर हों या रूज़वेल्ट-चर्चिल-मैक ऑर्थर, सभी ने गांधीजी के भीतर एक ख़ास तरह की महानता का दिग्दर्शन किया और उनकी युगांतरकारी भूमिका को माना। यह भारत के लिए ही नहीं, एशिया महाद्वीप और संपूर्ण मानव समाज के लिए एक गर्वीली बात है कि पश्चिम की सभी आवाज़ों को हम एक स्वर में पिरोएं तो वे कहती हैं, महात्मा बुद्ध और प्रभु ईसा के बाद अगर इस धरती पर कोई महान व्यक्तित्व हुआ है तो वह महात्मा गांधी हैं। मानव समाज की विकास यात्रा में हर युग में कोई न कोई ऐसा आया है, जो अपने कालखंड में अपने समकालीनों से बहुत अलग रहा है।

गाँधी भी ऐसे ही थे। वे जब दक्षिण अफ्रीका से भारत आए तो उन्होंने पूरे देश की यात्रा की। यहाँ के गांवों-देहातों को समझा। उन्होंने देश के सुदूर इलाकों में नागरिकों के माथे पर चिपके अभावों को महसूस किया। जीवन में बिखरे अँधेरे देखे। सूनेपन से सिहरती ज़िंदगियों से वे देश के कोने-कोने में जाकर रूबरू हुए। कमज़ोरों और मज़लूमों के चेहरों पर छितरी संताप की सलवटें देखकर वे कराह उठे। उन्होंने पीड़ा और दु:खों से लबरेज़ युग को अट्‌टहास करते पाया। इस देश के श्रेष्ठतम लोगों से वे स्वयं की पहल पर मिले। ऐसे लोगों से जो उस समय भारत भूमि पर एक अलग विचारयात्रा के लिए न केवल निकले हुए थे, अपितु अपने विचारों के अनुरूप कोई न कोई ऐसा काम भी कर चुके थे, जो अपने समय का सर्वमान्य प्रतिमान था। इनमें महान स्वतंत्रता सेनानी सीएफ ऐंड्रयूज, गुरुकुल कांगड़ी के संस्थापक और शिक्षा के अग्रदूत महात्मा मुंशीराम यानी स्वामी श्रद्धानंद और शांति निकेतन के अप्रतिम शिल्पकार रवींद्रनाथ ठाकुर प्रमुख थे। स्वामी श्रद्धानंद ने चार मार्च 1902 को हरिद्वार में शिक्षा का बहुत बड़ा केंद्र खड़ा कर दिया था, जो गुरुकुल कांगड़ी के नाम से जाना जाता है। यह शांति निकेतन से कई वर्ष पहले खुल गया था। गांधीजी को जब सीएफ एंड्रयूज यहाँ लेकर गए तो गांधीजी बहुत प्रभावित हुए। गांधी जी ने एक जगह लिखा है कि उन्हें शुरू में उस समय स्वामी श्रद्धानंद, देशबंधु चितरंजनदास, सीएफ ऐंड्रयूज और लाला लाजपतराय ने बहुत प्रभावित किया।

गांधीजी को गुरुकुल कांगड़ी में महात्मा मुंशीराम ने ही सबसे पहले महात्मा कहकर संबोधित किया था। गांधीजी ने अपनी आत्मकथा सत्य के प्रयोग में एक जगह लिखा है कि मैं अपना आश्रम कहाँ बनाऊँ, जब यह प्रश्न उठा तो उन्हें महात्मा मुंशीराम यानी स्वामी श्रद्धानंद ने हरिद्वार का सुझाव दिया। सीएफ ऐंड्रयूज ने भी सलाह दी कि हरिद्वार आपके लिए बहुत उपयुक्त रहेगा। गांधीजी ने अपनी आत्मकथा में लिखा है कि मेरी मातृभाषा गुजराती होने के कारण मुझे अहमदाबाद बहुत उपयुक्त लगा। आजादी के लिए उन दिनों के आंदोलन के बारे में गांधीजी अपनी आत्मकथा में लिखते हैं, 30 मार्च को दिल्ली में एक सप्ताह तक न केवल ऐतिहासिक हड़ताल रही, बल्कि यह हिन्दू मुस्लिम एकता का भी एक बड़ा उदाहरण थी। वजह ये कि इसमें स्वामी श्रद्धानंद और हक़ीम अजमल खाँ साहेब दोनों ने इस हड़ताल को कामयाब बनाया था। गांधीजी इसे भी बहुत अदभुत बताते हैं कि इस हड़ताल के बाद जामा मस्जिद से भाषण देने के लिए स्वामी जी को बुलवाया गया। हालांकि यह सही है कि शुद्धि आंदोलन के बाद गांधीजी के मन में बहुत सवाल उठे और मतभेद भी हुए; लेकिन दोनों की प्रगाढ़ मित्रता में कभी कमी नहीं आई।

गांधीजी के महात्मा बनने की यह कहानी तो दिलचस्प है ही, हमें यह भी जानना है कि जब उन्होंने एक ख़ास तरह की नींद में खोए देश और समाज की गहन अवचेतना में अपने सत्याग्रहों से हलचल मचाई तो ब्रिटिश सरकार का वह जंगल भी कैसे चीख पड़ा, जो संगीनों की नोंकों से चमक रहा था। गांधीजी की इस सक्रियता से भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के आकाश में एक सुनहरी आभा सी छा गई। उन्होंने कराहती धरती को यह सिखा दिया कि संघर्ष की राह पर नैतिक आभा का भी कोई मूल्य है। और उन्होंने जन-जन के हृदय को ऐसे मथ दिया कि वे स्वत: एक पिता की सी भूमिका में आ गए। लेकिन वही प्रश्न कि आख़िर पहली बार उन्हें किसने राष्ट्रपिता के नाम से संबोधित किया। अब तक के प्रमाणों और उपलब्ध साक्ष्यों के अनुसार छह जुलाई 1944 को रेडियो रंगून से जब आज़ाद हिन्द फ़ौज़ के सेनाध्यक्ष के नाते सुभाषचंद्र बोस ने राष्ट्र के नाम संदेश दिया तो उन्होंने गांधी जी का ज़िक्र किया और उन्हें पहली बार राष्ट्रपिता कहकर संबोधित किया। उस समय सुभाष बोस ने ही रंगून से आज़ाद हिंद रेडियो शुरू किया था। महात्मा गांधी ने देश को एक नई राह दिखाई थी। उन्होंने धर्म के नैतिक मूल्यों को राजनीति में समाहित कर दिया था। उन्होंने शांति और अहिंसा के लिए पूरा जीवन होम दिया। वे भारतीय जीवन दर्शन से उन मूल्यों को लेकर आए, जिनसे देश का हर व्यक्ति अपने आपको जुड़ा हुआ महसूस करता था। चाहे राम हों या उनका रामराज्य, सत्य हो या सदाचार, नीति हो या राजनीति, उन्होंने इस राष्ट्र को एक नई व्याख्या दी और सामाजिक राजनीतिक आचरण के लिए राम और रामायण के मूल्यों की एक विचार पद्धति गढ़ी।

गांधीजी ने हृदय परिवर्तन के माध्यम से बुराइयों को मिटाने का संकल्प लिया। उन्होंने अहिंसा और सत्याग्रह को परिवर्तन की राह बताया। गांधीजी ने एक नैतिक लोक का निर्माण किया। उनके नैतिक लोक का दर्शन बड़ा अदभुत है। यह गांधीजी ही थे, जिन्होंने बताया कि त्याग के मूल्यों को अपनाकर हम अपनी दुनिया, देश, राज्य, समाज या नागरिक को बेहतर बना सकते हैं। उन्होंने बलिदान की भावना को जीवन का हिस्सा बनाने का संदेश दिया। यह आत्मत्याग से आगे की भावना है, लेकिन आज हम देख रहे हैं कि त्याग के बजाय येन केन प्रकारेण छीन लेने की भावना हमारे जीवन में तारी है। गांधीजी ने शील और विनम्रता को जीवन मूल्य बताया और कहा कि भारत नामक परिवार को हम तभी समृद्ध बना सकते हैं, जब हमारे जीवन में शील और सदाचार को जगह मिलेगी। हम जब विनम्रता के मूल्यों को अपनाएंगे। हम क्रूरता, हृदयहीनता और संवेदनहीनता को पास भी नहीं फटकने देंगे। हम सत्याचरण को जीवन का आभूषण बनाएंगे, न कि सोने, चाँदी या हीरे मोतियों पर धन लुटाएंगे। गांधी जी ने सादगी और सहनशीलता के मूल्यों को राजनीतिक जीवन में उतारने के लिए चरखा कातकर अपना सूत तैयार करने और उसी के वस्त्र पहनने तक को ज़रूरी बनाया। उन्होंने नशों को जीवन से हटाने के लिए अभियान चलाया और शराब के सेवन या शराब से आने वाले पैसे को छूने तक से इन्कार दिया। आज हम देखते हैं कि गांधीजी के जीवन के मूल्यों की बात करने वाले लोग तक शराब का सेवन करते हैं और नशों के आदी हैं। अगर गांधीजी होते तो आज किसी में हिम्मत नहीं होती कि वह ऐसा कर सकें। गांधीजी ने सत्याग्रह का सिद्धांत दिया। यह सामान्य शब्द भर नहीं है। यह विवादों को दूर करने का शांतिपूर्ण तरीका है।

महात्मा गांधी ने भारत को स्वतंत्रता मिलने से बहुत पहले ही इसकी राजनीति और शासन के भीतर पैदा होने वाली आहटों और कसमसाहटों को जान लिया था। इसलिए उन्होंने विकास के बजाय सर्वाेदय की बात की। उन्होंने देश की जनता के हिस्सों को खंड-प्रखंड में नहीं बांटा, बल्कि उनके विकास की अवधारणा में समाज के सबसे निचले पायदान पर खड़े नागरिक का उत्थान सर्वाेपरि था। गांधीजी के जीवन दर्शन में लोकतंत्र शब्द बहुत कम सुनाई पड़ता है। जो शब्द उनके यहाँ बार-बार ध्वनित होते हैं वे हैं अहिंसा, सत्य, सदाचार, सत्याग्रह, सादगी, सर्वाेदय। अर्थात् उनके सपनों का लोकतंत्र इन नैतिक विशेषताओं के बिना धूल है। गांधीजी के लिए विकेंद्रीयकरण सर्वाेपरि है। विकेंद्रीकरण के बिना उनके लिए लोकतंत्र की आवाज़ें अरण्यरोदन के अलावा कुछ नहीं हैं। वाक़ई में वही हमारे राष्ट्रपिता हो सकते थे, क्योंकि गांधीजी ही एक ऐसे थे, जो स्वतंत्रता का जश्न या उत्सव मनाने के बजाय कलकत्ता या नोआखाली में अंधियारी रातों से लेकर रक्तरंजित सुबहों तक की कराहों को सुनने के लिए पहुंचे थे। उनके हृदय में प्रसन्न और प्रफुल्लित से पहले पीड़ित था। गांधीजी के सामने पांच हजार साल पुरानी सभ्यता और संस्कृति पसरी हुई थी। लेकिन यही संस्कृति और सभ्यता अन्य लोगों के सामने भी थी। लेकिन सत्य, अहिंसा, सदाचार, सर्वोदय और सादगी केवल गांधी जी के जीवन दर्शन में थी। उन्होंने जिस रामराज्य की कोंपल भारतीय स्वतंत्रता के हृदय में रोपी थी, उन्हें उस दिन कल्पना नहीं थी कि एक दिन इस चंदन वन या नंदन वन के सबसे सुंदर वृक्षों पर विषधर फुफकारेंगे। आजकल हम समय-समय पर लोकतंत्र और स्वतंत्रता की विजय दुंदुभियां सुनते हैं। लेकिन अगर गांधीजी के जीवन दर्शन को देखें तो उनके सपनों का स्वराज कुछ और था। आज स्वराज और सर्वाेदय के मूल्यों तक कोई सूनी सांवली सड़क नहीं जाती। आज इस राष्ट्रपिता के सपनों के गांव को जाने और जानने वाले दिशाज्ञान से हम वंचित और प्रवंचित हैं। यही राजनीतिक प्रवंचनाएं हमें अपने ही पिता के जीवन दर्शन से पीठ फेर लेने को प्रसन्न करती प्रतीत होती हैं।

गांधीजी के सपनों का लोकतंत्र किसी सत्तावादी तंत्र का निर्माण नहीं करता, अपितु वह ऐसे लोकतंत्र का निर्माण करता है, जो स्वराज की भावना को अपनी आत्मा में बसाता है। गांधी जी के सपनों का लोकतंत्र क्या है? वह गांव-ढाणी तक स्वराज पहुंचाकर झूम उठने का स्वाद है। गांधीजी के सपनों का लोकतंत्र सिरों को गिनने का लोकतंत्र नहीं है। वह एक तारामंडल है, जिसमें हर तारे का अपना महत्त्व है। उनका लोकतंत्र हर नागरिक हृदय को निर्भीक करता है और इस स्तर तक निर्भीक करता है कि किसी ने किसी के हृदय को पीड़ा पहुंचाई तो इस राष्ट्र का पिता उसके घर की देहरी पर खड़ा होता है। इस राष्ट्र के पिता के रथ पर कोई पुत्र सवार नहीं है। इस राष्ट्र के पिता के रथ का कोई पहिया किसी पुत्र के पास नहीं है। रथ का कोई पहिया किसी श्रेष्ठिवर्ग के धन से नहीं चलता। इस रथ से ऐसी कोई शंख ध्वनि नहीं आती, जिसमें हिंसा की कोई प्रेरणा घुली हो। गांधी किसी रक्तरंजित क्रांति का आह्वान नहीं करते। वे हृदय परिवर्तन में विश्वास करते हैं और वे जानते हैं कि रोज़ी-रोटी के महासमर में हर कंठ की पिपासा और हर उदर की जठराग्नि शांत करने का कोई सदाचारपूर्ण रास्ता होना ही चाहिए।

गांधीजी के रामराज्य की जिह्वा मांस-स्वाद लोलुप नहीं थी। वह सत्ता लोलुप भी नहीं थी। वह अर्थ प्राप्ति के स्वाद से अनजान थी। गांधीजी ने राजनीति के रूखे और क्रूर अंतर के किसी हृदयहीन कोने में कोमलतम और सुकुमारतम भावानुभूतियां भरने की कोशिश की। गांधीजी के जीवन के दर्शन में ही नहीं, उनके दिन प्रतिदिन के जीवन में सुखानुभूति देने वाले रहस्यमयी संगीत स्वर के स्पर्श उच्छवासों में उमड़ते हैं। उनके रामराज्य के नैतिक मूल्य सायास नहीं हैं। अनायास हैं और उनमें किसी प्रकार की दुराशा नहीं है। आज जिस समय समूची दुनिया पृथिवी को विदीर्ण करने की होड़ में लगी है, वह विकास के नाम पर विनाश की उन्मत्त दौड़ में जुटी है, हिंसा और अनैतिकता की असंख्य तूफानी लहरों पर सवार है, तब गांधीजी से हमें शांति और अहिंसा का मंत्र मिल सकता है। हजारों साल पहले हमारे देश में वेदों की वाणी गूंजी थी। यजुर्वेद के अध्याय 36 का 17वां मंत्र है, जो आए दिन हमें कहीं न कहीं सुनाई पड़ता है, लेकिन हमने कभी इसके भीतर निहित अर्थ को जानने को कोशिश नहीं की। यह सिर्फ़ बोल दिया जाता है। मंत्र इस प्रकार है : द्यौ: शान्तिरन्तरिक्षम् शान्ति: पृथिवी शान्तिराप: शान्तिरोषधय: शान्ति:। वनस्पतय: शान्तिर्विश्वे देवा: शान्तिर्ब्रह्म शान्ति: सर्वँ शान्ति:, शान्तिरेव शान्ति: सा मा शान्तिरेधि ॥ शान्ति: शान्ति: शान्ति: ॥ यह मंत्र कहता है कि द्यौ: यानी सूर्य आदि लोकों का प्रकाश और विज्ञान हमारे लिए सुखदायक हो। यानी हम ऐसी राह पर न जाएं, जहां इनका दु:ख पैदा हो। जो द्याै है, अंतरिक्ष है, जो पृथिवी है, जो जो ओषधियां यानी प्रकृति के अमृतदायी पादप हैं, जो वनस्पतियां हैं, जो पेड़-पौधे और विटप हैं, जो विश्व है, जो देव हैं, जो ब्रह्म है, जो ब्रहांड है, समस्त जगहों पर शांति हो। लेकिन शांति होगी कैसे? हम इस तरह के मंत्र ताे बोलते रहे। हर दिन। हर उत्सव और पर्व पर। लेकिन शांति और अहिंसा को जीवन में आत्मसात करने की विधि तो गांधीजी ने ही सिखाई। आख़िर उनकी महानता का आधार क्या है? यह प्रश्न बार-बार उठता है और अगर हम इस प्रश्न को समझ लें तो कई उलझनें दूर हो जाएंगी। राजनीति में यह आज ही नहीं हैं कि दुर्दम दुष्ट और सर्वशोषक लोगों का बोलबाला है।

आज से पहले भी यह ऐसा था और गांधीजी ने इन सबसे पार पाने के लिए ही राह दिखाई। गांधीजी को भले सुभाषचंद्र बोस ने या पंडित जवाहरलाल नेहरू ने महान बताया हो या राष्ट्रपिता कहा हो, लेकिन यह सच बात है कि यह उनका अपना जीवन ही है, जो उन्हें इस स्तर पर ऊंचा उठाता है। आख़िर ऐसा क्या है कि एक बहुत कमज़ोर बालक, जिसकी लिखावट लिखे मूसा और पढ़े ख़ुदा वाली है, जिसे स्कूल में बहुत प्रतिभाशाली नहीं माना जा रहा, जो इतना ताक़तवर भी नहीं है कि दुष्ट बच्चों से अपना बचाव कर सके, जो ब्रिटेन जाकर वक़ालत पढ़ता है, लेकिन बेहतरीन अध्ययन के बावजूद वक़ालत का यही पेशा उन्हें शर्मनाक़ लगता है। और वे जब राजनीति में आते हैं तो एक लंबा अथक संघर्ष करते हैं। राजनीति को बदलते हैं। कष्ट सहते हैं। जेलों की यात्रा करते हैं। लेकिन देश की सबसे ज्वलंत उस हिन्दू मुस्लिम समस्या का भी हल नहीं कर पाते, जो देश के विभाजन और दस लाख से अधिक लोगों की हत्या और दो करोड़ से अधिक लोगों के विस्थापन की वजह बनती है।

आख़िर क्या कारण है कि गांधीजी ने स्वयं भारत विभाजन के लिए अपनी विफलता को खुले तौर पर स्वीकार किया और वे महान माने गए? वे इस हद तक गए कि आज़ादी के प्रारंभिक दिनों में ही इन्सानियत के उच्च शिखर को छुआ, जिस वजह से उनके ही एक उन्मादी सहधर्मी ने उनकी हत्या कर डाली। इस सबकी वजह है उनकी व्यक्तिगत खूबियां। जिस सिद्धांत को अपनाया, जिस अहिंसा, सत्य, सादगी, सदाचार और सत्याग्रह को चुना, उसके लिए ऐसा समर्पण कहीं दिखाई नहीं देता। साधन और साध्य की ऐसी शुचिता अन्यत्र दुर्लभ है। वैसा आत्मत्याग क्या कहीं और दिखता है? सादगी और सदाचार से परिपूर्ण दैनिक जीवन में वैभव से दूरियां और दिखावे या प्रदर्शन जैसी कोई बात स्वप्न में नहीं। आज आज ही नहीं, आज़ादी के बाद से ही हम देखते हैं कि सत्ता का कितना दुरुपयोग होता है, लेकिन गांधीजी जिन्होंने आज़ादी दिलवाई एक भी दिन सत्ता के सुख के एक क्षण तक को नहीं छुआ। गांधीजी ने न किसी दोस्त को फायदा पहुंचाया और न किसी परिजन को। उन्होंने अपने पुत्रों तक के प्रति पिता का न्यूनतम कर्तव्य तक नहीं निभाया। उन्होंने देश के आज़ाद होने के बाद या इससे पहले कभी किसी प्रकार की सरकारी सुविधा का भाेग नहीं किया। उन्होंने अपनी समस्त ग़लतियों को समय-समय पर सार्वजनिक तौर पर स्वीकार किया और अगर कभी थोड़ी सी भी ग़लती हुई तो उसका दंड स्वयं को दिया। इस प्रकार उनके जीवन के व्यक्तिगत गुण न केवल अतुलनीय हैं, बल्कि वैसा अन्य इन्सान हमें अपने आसपास जीवन में क्या, इतिहास में भी दिखाई नहीं देता।

गांधी जी इसलिए महान हैं क्योंकि उनके लिए लोकतंत्र लोभतंत्र नहीं था। उनके जीवन दर्शन की कोई राह इस तरफ नहीं जाती। वे युद्ध और विनाश की तिज़ारत के ख़िलाफ़ थे। उन्होंने अपने जीते जी कभी किसी मौत के आढ़तिये को राजनीति में अपनी दुकान नहीं खोलने दी। अगर किसी ने ऐसा करने की कोशिश की तो उन्होंने वातावरण ही ऐसा बना दिया कि वह खु़द अपनी दुकान के शटर गिराकर चला गया। वे जनमत के बल के सामने भी नहीं झुके और धार्मिक आग्रहों के सामने भी उन्होंने घुटने नहीं टेके। गांधीजी को हम कभी सत्ता के आगे झुका हुआ नहीं देखते। अलबत्ता, डर कर नहीं या किसी लाभ या लोभ की दृष्टि से नहीं, अपनी कोई ग़लती हुई तो उन्होंने छोटे से छोटे व्यक्ति से भी क्षमा मांगने में संकोच नहीं किया। गांधीजी हमेशा विपदा से घिरे आदमी के समर्थन में खड़े दिखाई दिए हैं। इसके लिए उन्होंने न कभी ऐसे व्यक्ति की राष्ट्रीयता देखी, न धर्म और न जाति। उन्होंने कभी ऐसी राजनीतिक या प्रशासनिक शैली का समर्थन नहीं किया, जिसमें अचानक कोई इन्सान बेघर हो जाए और कोई उस पर हिंसाचार करे।

गांधी जी के जीवन को जब हम देखते हैं तो साफ़ झलकता है कि वे सत्ता के नायक या जननायक बनने के लिए उत्कंठित दिखाई नहीं देते। वे किसी मुकुट के लिए कोशिश नहीं करते। उनके लोकतंत्र में मनुष्यता से बड़ा कुछ नहीं है। अगर उन्हें लगता है कि सुदूर किसी जगह कोई कंठ प्यास के कारण एक बूंद के लिए तड़प रहा है तो वे नंगे पांव कोई झरना सिर पर उठाए तपती धरती पर चलते हुए दिखाई देंगे। उनके लिए आज़ादी की गोल्डन या हीरक जयंतियां महत्व नहीं रखतीं। उनके लिए आज़ादी का मतलब अपनी आज़ादी और अपनी स्वतंत्रता के साथ जीना है। वहां दिखावे, प्रदर्शन या विज्ञापन का मायाबल नहीं है। गांधी पथराई प्यास के रेगिस्तान में जलद मेघों की कतार हैं। उनके लोकतंत्र के अंत:करण में पीड़ितों और वंचितों का महकता वसंत है। उनका लोकतंत्र कमज़ोर से कमज़ोर नागरिक को भी अकेला नहीं होने देता, बल्कि उसे ऐसी जिजीविषा और अभय प्रदान करता है, जिसके बल पर वह नृशंस विजेता की बर्बर मुद्रा के सामने भी मुस्कुराकर खड़ा होने का साहस अपने भीतर भर लेता है। यही गांधीवाद है और यही वह कारण है, जो उन्हें राष्ट्रपिता बनाता है।

(लेखक त्रिभुवन राजस्थान के वरिष्ठ पत्रकार हैं)
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