Rajesh Pilot: कांग्रेस के प्रमुख नेता रहे राजेश पायलट का आज जन्मदिन है। उन्होंने अपने जीवन में ज़मीन से आसमान और आसमान से संसद तक की जो उड़ान भरी, वह बहुत से परिश्रमी और स्वप्नदर्शी युवाओं के लिए प्रेरक है। कभी सोचा है कि एक साधारण गांव का लड़का, जो हवा में बम गिराता है, कैसे राजनीति के मैदान में आम जनता का मसीहा बन जाता है? राजेश पायलट, (Rajesh Pilot) जिनका असली नाम राजेश्वर प्रसाद बिधुड़ी था, यही जीवंत उदाहरण हैं। धरती का बेटा आकाश से होकर जनता के दिल में उतरा तो वह हर किसी को यह कहता है कि युवा चाहें तो वे सुदूर गाँव के किसी पशुपालक किसान का बेटा होकर भी इस मुल्क़ में उल्लास सृजित कर सकता है। 10 फरवरी 1945 को ग्रेटर नोएडा के वैदपुरा गांव में जन्मे इस कृषक गुर्जर बेटे ने मेहनत और प्रतिभा से न सिर्फ आसमान छुआ, करोड़ों आम लोगों के दिलों में जगह बनाई। उन्होंने ज़मीन से आसमान तक बहादुरी की इबारत लिखी।
वायुसेना में आकाश में उड़े, धरती पर सेवा के लिए उतरे
राजेश पायलट की कहानी की शुरुआत भारतीय वायुसेना के कॉकपिट से होती है। 1966 में पायलट ऑफिसर के रूप में उनका कमीशन हुआ। एक ऐसे दौर में जब गांव के युवाओं के लिए वायुसेना में जाना स्वप्न से कम नहीं था। लेकिन राजेश ने यह स्वप्न पूरा किया, और वह भी अपनी मेहनत के दम पर। 1971 का भारत-पाक युद्ध राजेश पायलट के जीवन का निर्णायक मोड़ था। कारिबू बॉम्बर उड़ाते हुए उन्होंने दुश्मन के ठिकानों पर बम बरसाए। आकाश में तैरती गोलियां, विस्फोटों की गूंज, और हर उड़ान में मौत का खतरा; लेकिन राजेश अडिग रहे। उनके साहस और कौशल ने न सिर्फ दुश्मन को नेस्तनाबूद किया, भारतीय सेना के मनोबल को भी बुलंद किया। फ्लाइंग ऑफिसर से स्क्वाड्रन लीडर तक की उनकी यात्रा प्रतिभा और समर्पण की गवाह है। वायुसेना में उन्होंने 13 साल तक देश की सेवा की, हर उड़ान में तिरंगे की इज्जत बचाते हुए। उनके जीवन का वह निर्णायक लम्हा था जब वे 1979 में आकाश छोड़कर धरती पर उतरे। 1979 में जैसलमेर में तैनात रहते हुए, एक गहरा सवाल राजेश के मन में उठा: क्या सिर्फ आसमान से देश की सेवा हो सकती है? क्या धरती पर, आम जनता के बीच, उनकी प्रतिभा और अधिक काम आ सकती है?
सेना का आकाश छोड़ राजनीति के अनिश्चित आकाश में उतरे
दोस्त राजीव गांधी के प्रभाव और अपनी आंतरिक प्रेरणा से उन्होंने एक साहसिक निर्णय लिया। वायुसेना का कमीशन छोड़ दिया। यह फैसला उनकी दूरदर्शिता का सबूत था। एक सुरक्षित करियर, सम्मान, पेंशन, सब छोड़कर वे राजनीति के अनिश्चित आकाश में कूद गए। क्यों? क्योंकि उन्हें लगा कि ‘जय जवान, जय किसान’ का मंत्र सिर्फ नारा नहीं, जमीनी हकीकत बनना चाहिए। 1980 में ‘राजेश पायलट’ के रूप में वे सामने आए। उनकी पहचान सैन्य गौरव और नई राजनीतिक यात्रा दोनों को दर्शाती थी। भरतपुर से लोकसभा चुनाव लड़ा और पूर्व महारानी को हराकर संसद में प्रवेश किया। यह जीत महज एक चुनावी परिणाम नहीं थी। यह एक संदेश था: कि राजनीति में रजवाड़े नहीं, जनता का प्रतिनिधि जीतता है।

जनसंपर्क की राजनीति की, भाषणों और वादों की नहीं
राजेश पायलट ने साबित किया कि एक आम गांव के युवा की प्रतिभा और मेहनत राजपरिवारों की विरासत से कहीं ज्यादा ताकतवर हो सकती है। सन 1984 में वे दौसा से जीते और फिर 1996 और 1999 में भी। दौसा राजस्थान का एक पिछड़ा, अर्ध-ग्रामीण इलाका था, जहां विकास की चमक नहीं, गरीबी और बेरोजगारी की छाया थी। लेकिन राजेश पायलट ने इसी इलाके को अपनी कर्मभूमि बनाया। वे ‘पायलट साहब’ बन गए, जो गांव-गांव घूमते, खेतों में किसानों से बात करते, युवाओं को नौकरी और प्रशिक्षण दिलवाते। उनकी राजनीति जनसंपर्क की राजनीति थी, न कि भाषणों और वादों की। वे नहरें बनवाते, स्कूल खुलवाते, सड़कें बिछवाते; हर काम में जनता की भागीदारी और सशक्तिकरण उनका मंत्र था।
मंत्री रहे, तो हर विभाग में दम दिखाया, जमकर काम किया
राजेश पायलट जब सड़क परिवहन मंत्री बने तो उनका एक ही विजन था और वह यह कि देश के दूरदराज इलाकों को शहरों से जोड़ना। उन्होंने सड़कों के निर्माण और सुधार पर जोर दिया, ताकि किसान अपनी फसलें बाजार तक पहुंचा सकें और ग्रामीण इलाके आर्थिक धारा से जुड़ सकें। यह सिर्फ सीमेंट और डामर का काम नहीं था। यह आम आदमी की आर्थिक आजादी का मार्ग था। हर किलोमीटर सड़क एक नई संभावना, एक नया रोजगार, एक नई उम्मीद लेकर आती थी। टेलीकॉम मंत्री के रूप में राजेश पायलट ने एक क्रांतिकारी कदम उठाया। ग्रामीण इलाकों में टेलीफोन लाइनों का विस्तार। उस दौर में जब मोबाइल फोन दूर की कौड़ी थे, उन्होंने सुनिश्चित किया कि दूरस्थ गांव भी संचार से जुड़ें। एक टेलीफोन सिर्फ बातचीत का माध्यम नहीं, यह आपातकाल में मदद, बाजार की जानकारी, और परिवार से जुड़ाव का जरिया था। राजेश पायलट ने तकनीक को जनसेवा का औजार बनाया। आंतरिक सुरक्षा मंत्री के रूप में राजेश पायलट ने साहसिक निर्णय लिए। चंद्रास्वामी जैसे कथित तांत्रिकों और दलालों को जेल भेजा, जो राजनीतिक गलियारों में अपना प्रभाव जमाए बैठे थे। उन्होंने भ्रष्टाचार के खिलाफ कड़ा रुख अपनाया और सुरक्षा तंत्र को मजबूत किया।

पूर्व सैनिकों और किसानों को एक मंच पर लाने का प्रयास
यह उनका नैतिक साहस था, जो किसी से नहीं डरे, न प्रभावशाली लोगों से, न राजनीतिक दबाव से। उनका मानना था कि सत्ता का उपयोग जनहित के लिए होना चाहिए, न कि निजी फायदे के लिए। 1987 में राजेश पायलट ने ‘जय जवान जय किसान ट्रस्ट’ की स्थापना की। यह ट्रस्ट पूर्व सैनिकों और किसानों को एक मंच पर लाने का प्रयास था, दोनों ही समुदाय जो देश की रीढ़ हैं, लेकिन अक्सर उपेक्षित रहते हैं। पूर्व सैनिकों को पुनर्वास और रोजगार किसानों को आधुनिक कृषि तकनीक का प्रशिक्षण युवाओं को कौशल विकास कार्यक्रम यह सिर्फ राजनीतिक पहल नहीं, सामाजिक सशक्तिकरण का आंदोलन था। राजेश पायलट ने दिखाया कि नेता सिर्फ चुनाव जीतने के लिए नहीं, समाज बदलने के लिए होते हैं।
लोकतांत्रिक मूल्यों में विश्वास, जहां संघर्ष हो, उत्तराधिकार नहीं
सन 1996 में राजेश पायलट ने कांग्रेस अध्यक्ष पद के लिए सीताराम केसरी के खिलाफ चुनाव लड़ा। यह एक साहसिक कदम था। पार्टी के वरिष्ठ नेता के खिलाफ खड़ा होना। वे हार गए, लेकिन इस हार ने उन्हें कमजोर नहीं किया। इसने साबित किया कि राजेश पायलट लोकतांत्रिक मूल्यों में विश्वास रखते हैं, जहां चुनाव होना चाहिए, संघर्ष होना चाहिए, न कि तय किए गए उत्तराधिकार। उनकी हार राजनीति में ईमानदार प्रतिस्पर्धा की जीत थी। उनका जीवन तीन बिंदुओं पर खड़ा है और वह प्रतिभा, मेहनत और जनसेवा हैं। प्रतिभा यानी एक साधारण गांव से वायुसेना तक और फिर संसद तक। यह प्रतिभा की जीत है। मेहनत, जिसका कोई शॉर्टकट नहीं, कोई विरासत नहीं। सिर्फ कड़ी मेहनत और समर्पण। और जनसेवा यानी सत्ता का उपयोग जनहित के लिए, न कि निजी फायदे के लिए। राजेश पायलट की कहानी आज के युवाओं को तीन सबक देती है। सपने देखो, पर मेहनत करो, आकाश छूने के लिए पंख नहीं, प्रतिभा और मेहनत चाहिए। जनता से जुड़ो, सत्ता या सफलता जनता की सेवा से आती है, न कि उनसे दूरी बनाकर। हार से मत डरो, हार सिखाती है, कमजोर नहीं करती। असली नेता वही जो फिर से उठकर खड़ा हो।

