Aravali: सुप्रीम कोर्ट से फैसले से अरावली बचाओ (Save Aravali) अभियान की जीत हुई। सरकार की सलाह पर पहले सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने अरावली (Aravali) की 100 मीटर तक उंचाई की पहाड़ियों को अरावली पर्वतश्रंखला का हिस्सा न मानने का फैसला दिया था। इस मामले पर सरकार के विरोध में शुरू हुए तेज आंदोलन के बाद सुप्रीम कोर्ट द्वारा अपने ही आदेश पर रोक लगा दी गई है। इस निर्णय को अरावली बचाओ आंदोलन की एक बड़ी जीत के रूप में देखा जा रहा है, क्योंकि इससे अरावली के संरक्षण के लिए और समय मिल गया है। माना कि अरावली पर सुप्रीम कोर्ट ने स्टे देकर जनता की चिंताओं को गंभीरता से लिया है। लेकिन संघर्ष अभी समाप्त नहीं हुआ है, क्योंकि यह सत्य अभी सार्वजनिक होना बाकी है कि सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में, अरावली की 100 मीटर की पहाड़ियों को अरावली का हिस्सा ही न मानने की सिफारिश किस मंशा से की थी?
अपने ही फैसले पर स्टे दिया सुप्रीम कोर्ट ने
सुप्रीम कोर्ट ने 29 दिसंबर 2025 को अरावली पहाड़ियों से जुड़े एक अहम फ़ैसले में 20 नवंबर के अपने पिछले आदेश पर रोक लगा दी। इस पिछले आदेश में कोर्ट ने केंद्र सरकार द्वारा पेश की गई 100 मीटर ऊंचाई के आधार पर अरावली पर्वतमाला की नई परिभाषा को स्वीकार किया था। लेकिन 29 दिसंबर को तीन जजों की बेंच ने इस नई परिभाषा पर सीधे कार्रवाई करने से पहले गहन समीक्षा की जरूरत बताई। कोर्ट ने यह भी कहा कि 100 मीटर नियम का व्यापक प्रभाव समझे बिना उसे लागू नहीं किया जा सकता है। इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र और राज्य सरकारों को कहा कि एक उच्चस्तरीय विशेषज्ञ समिति का गठन किया जाए, जो परिभाषा, ऊंचाई के मानदंड और खनन की संभावित अनुकूलता पर अध्ययन करे। इस मामले की अगली सुनवाई 21 जनवरी 2026 के लिए तय की गई है।

रोक लगाने को प्रमुख लोग कैसे देखते हैं?
विशेषज्ञों का कहना था कि सरकार और सुप्रीम कोर्ट के उस कदम से 100 मीटर से कम ऊंचाईवाली महत्वपूर्ण पहाड़ियां संरक्षण से बाहर हो सकती थीं, जिससे खनन और पर्यावरणीय क्षरण बढ़ सकता था। पर्यावरण प्रेमियों और आन्दोलनकारियों ने इसे आरंभ से ही अरावली के अस्तित्व के लिए खतरा बताया। कई विशेषज्ञों ने कहा कि अगर 100 मीटर मानदंड लागू होता तो पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील ज़मीनें अलग हो जाएंगी और उन्हें खनन और अवैध गतिविधियों के लिए खोल दिया जाएगा। 29 दिसंबर के फैसले पर प्रमुख पर्यावरणवादी और आंदोलन से जुड़े लोग इसे एक बड़ी जीत और न्याय का प्रतीक मानते हैं। उनका मानना है कि इस फैसले से यह संदेश गया है कि संरक्षण को केवल तकनीकी परिभाषा के आधार पर कमजोर नहीं किया जा सकता। कई ने कहा कि अदालत ने जनता की आवाज़ और वैज्ञानिक चिंताओं को सही ढंग से समझा है।
अरावली बचाओ अभियान की जरूरत ही क्यों पड़ी?
अरावली पर्वतमाला भारत की सबसे प्राचीन पर्वतमालाओं में से एक है जो गुजरात से दिल्ली तक लगभग 690 किमी में फैली हुई है और यह उत्तर-पश्चिम भारत के पारिस्थितिक संतुलन के लिए महत्त्वपूर्ण है। यह भूजल रिचार्ज, धूल के तूफानों को रोकने, जैव विविधता और स्थानीय जलवायु को संतुलित रखने में अहम भूमिका निभाती है। केंद्र सरकार के पर्यावरण मंत्रालय द्वारा सुप्रीम कोर्ट में पेश की गई 100 मीटर की नई परिभाषा ने पूरी अरावली को ही खतरे में डाल दिया, क्योंकि इसके तहत कम ऊंचाई वाली लगभग 90% पहाड़ियों को अरावली के दायरे से बाहर किया जा सकता था। जिससे वे इलाक़े खनन और निर्माण के लिए खोले जा सकते थे। इस फैसले के विरोध में राजस्थान, हरियाणा, गुजरात और दिल्ली में अरावली बचाओ अभियान शुरू हुआ। राजस्थान में स्तर पर, इस मुद्दे को उठाया गया, इस व्यापक समर्थन ने जनआंदोलन का रूप धर लिया और आखिरकार सुप्रीम कोर्ट को अपने ही फैसले को रोकना पड़ा।
अरावली पर सुप्रीम कोर्ट की रोक पर गहलोत बोले
राजस्थान के पूर्व मुख्यमंत्री और वरिष्ठ कांग्रेस नेता अशोक गहलोत सहित पार्टी नेताओं ने इस फैसले को जनता की आवाज़ की जीत और पर्यावरण संरक्षण की दिशा में सही कदम के रूप में देखा। गहलोत ने आम तौर पर इस मुद्दे पर कहा कि अरावली रेंज को कमजोर करने वाली परिभाषा पर्यावरण और स्थानीय जीवन के लिए जोखिम भरी थी। उन्होंने अदालत द्वारा अपने ही फैसले को रोकने को लोगों की संवेदनशीलता को सम्मान देने वाला फैसला बताते हुए कहा कि वर्तमान पर्यावरणीय परिस्थितियों को देखते हुए यह बेहद आवश्यक है कि अरावली को लेकर अगली शताब्दी तक की स्थिति को सोचकर काम किया जाए। गहलोत ने इस मुहिम में जुड़े सभी लोगों के प्रति आभार व्यक्त किया है। उन्होंने कहा कि भारत सरकार के पर्यावरण मंत्री को भी अब पर्यावरण के हित में काम करने की सोच रखनी चाहिए। सरिस्का सहित पूरे अरावली में खनन बढ़ाने की सोच भविष्य के लिए ख़तरनाक है। गहलोत मानते हैं कि पर्यावरण संरक्षण पर जनता की चिंताओं को गंभीरता से लेना चाहिए।

अरावली पर सरकार का अगला कदम क्या होगा?
सुप्रीम कोर्ट के 29 दिसंबर के फैसले के बाद केंद्र सरकार और संबंधित राज्यों को लंबे समय से उठ रहे विवाद का समाधान ढूंढना होगा। सुप्रीम कोर्ट ने विशेषज्ञ समिति गठित करने की बात कही है, जिसका मुख्य काम होगा कि अरावली की वास्तविक परिभाषा, ऊंचाई मानदंड और संरक्षण खतरे पर वैज्ञानिक मूल्यांकन किया जाए। सरकार अब अदालत के निर्देश के अनुसार नए नियमों को लागू करने से पहले वैज्ञानिक जांच और विशेषज्ञ रिपोर्ट तैयार करने पर ध्यान केंद्रित करेगी। पर्यावरण मंत्री ने संकेत दिए हैं कि कोई भी नया खनन पट्टा तब तक नहीं दिया जाएगा जब तक एक व्यापक और स्थायी प्रबंधन योजना तैयार नहीं हो जाती। अवैध खनन पर सरकार की रुख भी और अधिक कड़ी होने की उम्मीद है। हाल के समय में जैसे कुछ सरकारी निर्देशों में पूरे अरावली क्षेत्र में नई खनन लीज़ नहीं दी जाएगी जैसी बातें सामने आई हैं, यह संकेत है कि खनन पर नियंत्रण और पर्यावरण संरक्षण प्राथमिकता बनेगा।
यह जीत नहीं, जिम्मेदारी की शुरुआत
अरावली बचाओ अभियान की सफलता लोकतंत्र, पर्यावरण चेतना और जनसहभागिता की प्रभावी मिसाल बन गई है। अदालत का फैसला यह भरोसा देता है कि कानून व्यवस्था पर्यावरणीय संवेदनशीलता को समझती है। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि संघर्ष समाप्त हो गया, बल्कि इसका मतलब है कि अब संघर्ष ठोस नीति, वैज्ञानिकता और पारदर्शिता की मांग करेगा। अरावली सिर्फ राजस्थान की नहीं, यह उत्तर भारत की प्रकृति की रीढ़ है। जनता की एकजुटता से सुप्रीम कोर्ट ने समझा कि अगर अरावली बची रहेगी, तो ही रेगिस्तान की रेत शहरों तक नहीं पसरेगी, उत्तर भारत की हवाओं सहित जल का भविष्य सुरक्षित रहेगा और जनजीवन निखरेगा। इसी वजह से, अरावली पर यह फैसला आने वाले समय में देश की अन्य पर्यावरणीय लड़ाइयों के लिए भी दिशा तय कर सकता है। लेकिन यह सवाल अभी जिंदा है कि आखिर सौ मीटर से ऊंची पहाड़ियों को ही अरावली मनवाने के पीछे सरकार की मंशा क्या थी?
– निरंजन परिहार (लेखक राजनीतिक विश्लेषक हैं)

