Aravali: सुप्रीम कोर्ट के विवादास्पद फैसले से अरावली पर्वतमाला के पर्यावरण संरक्षण पर जब सवाल उठने लगे, तब इस बहस के केंद्र में जो एक नाम सबसे स्पष्ट होकर उभरा, वह नाम था – अशोक गहलोत। राजस्थान (Rajasthan) के पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत (Ashok Gehlot) को, सत्ता में न होने के बावजूद, जिस स्तर पर आंदोलन के नेतृत्व का श्रेय मिला, उसने न सिर्फ राजनीतिक विमर्श को मोड़ दिया है बल्कि यह भी साबित किया है कि सच्चा नेतृत्व कुर्सी पर आसीन होने से नहीं, बल्कि जनता के दिलों में बसने से होता है। सुप्रीम कोर्ट द्वारा अपने ही आदेश पर स्टे लगाना ‘अरावली बचाओ आंदोलन’ (Save Aravali) की सबसे बड़ी उपलब्धि है, जिसकी जन-विजय ने गहलोत को असली जननायक के रूप में फिर से रेखांकित किया है।
गहलोत के विरोध में उतरे नेताओं के चेहरे उतरे
राजनीति में गहलोत को अक्सर ‘जादूगर’ कहा जाता है, पर यह जादू राजनीतिक कलाबाजियों का नहीं, बल्कि साधारण भाषा में जटिल मुद्दों को समझने और जनता को समझाने की गहलोत की क्षमता का है। अरावली विवाद में भी पूर्व मुख्यमंत्री गहलोत का यही हुनर प्रकट हुआ। उन्होंने सोशल मीडिया, मुलाकातों, और संगठित आंदोलनों से जुड़े लोगों के जरिए लगातार अपनी बात रखी। दिलचस्प था कि बीजेपी के नेताओं और मौजूदा सरकार द्वारा गहलोत को कटघरे में खड़ा करने की कोशिशों के बावजूद, जनता का विश्वास गहलोत पर अधिक गहरा दिखा। सुप्रीम कोर्ट का फैसला आते ही पूर्व मुख्यमंत्री गहलोत ने इसके विरोध स्वरूप सबसे पहले अपने सोशल मीडिया हैंडल्स की डीपी (डिस्प्ले पिक्चर) बदली, तो लोगों ने भी इसे गंभीरता से लेते हुए डीपी बदलना शुरू किया। हालांकि राजस्थान के मुख्यमंत्री सहित कई मंत्रियों और बीजेपी नेताओं ने गहलोत के डीपी बदलने का मजाक उड़ाया। लेकिन पूर्व मुख्यमंत्री गहलोत ने बेहद सावधानी से इस आंदोलन का राजनीतिकरण नहीं होने दिया और अरावली के मूल मक्सद को बचाए रखा। इसीलिए ‘अरावली बचाओ आंदोलन’ को भारी जनसमर्थन मिला। फिर तो, राजस्थान में जिस तेजी के साथ एक व्यापक जन आंदोलन खड़ा हुआ, वैसा तीव्र आंदोलन जनता ने इससे पहले कभी नहीं देखा। सरकार और बीजेपी के नेताओं ने उन्हें अरावली को लेकर डर फैलाने वाला राजनेता तक कह डाला, लेकिन जनता की प्रतिक्रिया इसके उलट थी। विरोध-प्रदर्शनों से लेकर छात्रों और युवाओं की भागीदारी से साबित हुआ कि यह सिर्फ कांग्रेस का नहीं, जनता का आंदोलन बन चुका था। इसीलिए, अरावली मुद्दे पर गहलोत के विरोध में उतरे नेताओं के चेहरे अब उतरे हुए हैं।

गहलोत बोले – मुद्दा पहाड़ियों का नहीं, पीढ़ियों के जीवन का
‘अरावली बचाओ आंदोलन’ में गहलोत की भूमिका की सबसे उल्लेखनीय विशेषता रही उनकी समावेशी रणनीति। उन्होंने आंदोलन को राजनीतिक मोर्चेबंदी के बजाय सामाजिक भागीदारी से जोड़ा। छात्र संगठन, नागरिक समूह, पर्यावरण कार्यकर्ता, किसान और ग्रीणों के साथ साथ शहरी समाज भी, सब इस आंदोलन की कड़ी बने। इससे न सिर्फ सरकार पर दबाव बढ़ा बल्कि सुप्रीम कोर्ट तक यह संदेश भी स्पष्ट गया कि अरावली संरक्षण का संघर्ष स्थानीय आवश्यकताओं और राष्ट्रीय पर्यावरणीय संतुलन दोनों से जुड़ा है, और ‘अरावली बचाओ आंदोलन’ को इसीलिए ताकत मिली। अंततः, सुप्रीम कोर्ट ने अपने ही फैसले पर स्टे देते हुए पुनर्विचार की राह चुनी। यह निर्णय सीधे-सीधे उन भावनाओं की जीत था जो गहलोत के नेतृत्व में सड़कों पर और जनमत में दिखाई दे रही थीं। सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार की सिफारिशें मानकर 20 नवंबर 2025 को अरावली पर अपने फैसले में, पर्वतमाला की 100 मीटर से छोटी सभी पहाड़ियों को पर्वतश्रंखला मानने से इंकार कर दिया था। यह अरावली की नई परिभाषा थी, जो ‘अरावली बचाओ आंदोलन’ की आत्मा बनी। विशेषज्ञों के अनुसार सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से अरावली का लगभग 90 फीसदी हिस्सा संरक्षण के दायरे से बाहर जा सकता था, और खनन व निर्माण गतिविधियों के अवसर बढ़ जाते। पूर्व मुख्यमंत्री गहलोत ने इसे भविष्य की पर्यावरणीय त्रासदी बताते हुए खुलकर आवाज उठाई। उन्होंने जनता को यह समझाया कि यह मुद्दा महज़ पहाड़ों का नहीं, हवा, पानी, भूजल और आने वाली पीढ़ियों के जीवन का है। और यही वह बिंदु था जिसने आंदोलन को एक संवेदनशील और जनहित का आधार दिया।

‘अरावली बचाओ आंदोलन’ में जीत गहलोत के करिश्मे की
समीक्षात्मक दृष्टि से देखें तो यह जीत केवल एक अदालत के आदेश का पलट जाना नहीं, बल्कि गहलोत के साफ सुथरे नेतृत्व बनाम सत्ता की बहस का भी निष्कर्ष है। सत्ता के पास साधन होते हैं, संसाधन होते हैं, पर नेतृत्व के पास जन-विश्वास होता है। गहलोत के ‘अरावली बचाओ आंदोलन’ के नेतृत्व ने बिना सत्ता के भी, सिर्फ मुद्दे की नैतिकता के आधार पर यह विश्वास पाया। यह जीत गहलोत की राजनीति के नए आयामों का असर है और राजस्थान में उनके जनाधार का प्रमाण भी। ‘अरावली बचाओ आंदोलन’ गहलोत के करिश्मे का, गहलोत की जादूगरी के वास्तविक अर्थ का और उनकी जन नेता के रूप में बनी हुई छवि तथा नेतृत्व क्षमता की परख का क्षण था – और वे इसमें संपूर्ण सफल रहे हैं। यह जीत केवल पर्यावरण या राजनीति की नहीं, बल्कि जनविश्वास और लोकतांत्रिक संघर्ष की भी जीत रही। अरावली की चोटियों पर फिलहाल राहत भरी हवा है, और यह हवा गहलोत के नेतृत्व की सफलता की दिशा में बहती दिखाई देती है।
-निरंजन परिहार (लेखक राजनीतिक विश्लेषक हैं)
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