Rajasthan Health: राजस्थान में स्वास्थ्य सेवाओं की हालत इन दिनों केवल आंकड़ों का विषय नहीं, बल्कि जन-आक्रोश और राजनीतिक बहस का केंद्र बन चुकी है। विधानसभा (Rajasthan Assembly) से लेकर गांव की चौपाल तक, हर जगह एक ही सवाल गूंज रहा है कि क्या राजस्थान की चिकित्सा व्यवस्था (Rajasthan Health) सचमुच सही हाथों में है? स्वास्थ्य सेवाओं के खराब हालात पर विधानसभा में सत्ता पक्ष के विधायक रोष प्रदर्शन कर रहे हैं। राजस्थान (Rajasthan) के सुदूर गांवों में आज भी हजारों डॉक्टरों के पद खाली पड़े हैं। प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र और सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र या तो एक डॉक्टर के भरोसे चल रहे हैं या फिर पूरी तरह रामभरोसे। स्थिति यह है कि गर्भवती महिलाओं, बुजुर्गों और गंभीर मरीजों को कई – कई किलोमीटर दूर जिला अस्पतालों या अन्य प्रदेशों में जाना पड़ रहा है। इसे भजनलाल शर्मा (Bhajanlal Sharma) के नेतृत्व वाली की बीजेपी (BJP) सरकार की कमजोरी तथा स्वास्थ्य मंत्री गजेंद्र सिंह खींवसर (Gajendra Singh Khimsar) की बेरुखी कहा जा रहा है। लोग मान रहे हैं कि इससे तो ज्यादा अच्छी पूर्ववर्ती अशोक गहलोत (Ashok Gehlot) की सरकार थी, जो जनता के स्वास्थ्य के मामले में चिंतित थी और जनसहयोगी भी। राजस्थान पर्यटन विकास निगम के पूरेव चेयरमेन धर्मेंद्र राठौड़ कहते हैं कि लोग वर्तमान सरकार को कोसते गहलोत सरकार को याद कर रहे हैं।
स्वास्थ्य सेवाओं पर विधानसभा में गूंजता असंतोष
हाल के विधानसभा सत्र में स्वास्थ्य सेवाओं को लेकर विधायकों का रोष खुलकर सामने आया। राजस्थान विधानसभा में विपक्ष ही नहीं, बल्कि सत्ता पक्ष के कुछ विधायक भी अपने क्षेत्रों की बदहाल चिकित्सा व्यवस्था पर सवाल उठाते दिखे। ग्रामीण अस्पतालों में डॉक्टरों की अनुपस्थिति, उपकरणों की कमी, दवाओं का अभाव और रेफरल सिस्टम की विफलता जैसे मुद्दे अब केवल विपक्ष के आरोप नहीं रहे, बल्कि जमीनी हकीकत बन चुके हैं। विधानसभा में इस मुद्दे पर पूर्व मंत्री और वरिष्ठ विधायक कालीचरण सर्राफ और अनीता भदेल के अंदाज सरकार पर हमलावर दिखे, तो स्वास्थ्य मंत्री गजेंद्र सिंह खींवसर बचान की मुद्रा में। पूर्व मंत्री सराफ ने कहा कि राजस्थान में लगभग 3000 सरकारी अस्पताल हैं, जिनमें से लगभग 2500 छोटे जिलों और दूरदराज के गांवों में स्थित हैं, लेकिन वहां लगभग 75 प्रतिशत स्वास्थ्यकर्मी, डॉक्टर या नर्सिंगकर्मी या पैरामेडिकल स्टाफ जाना ही नहीं चाहते। अनीता भदेल ने डॉक्टरों की कमी पर सरकार से ठोस कदम उठाने की मांग की।

तुलनात्मक स्मृतियों में गहलोत सरकार की याद
आज जब हालात बिगड़ते दिख रहे हैं, तो स्वाभाविक रूप से जनता की स्मृति में पूर्ववर्ती सरकार उभरकर आती है। अशोक गहलोत के नेतृत्व वाली पिछली सरकार को लोग इसलिए याद कर रहे हैं, क्योंकि उसने स्वास्थ्य को राजनीतिक मुद्दा नहीं, सामाजिक जिम्मेदारी माना। चिरंजीवी स्वास्थ्य बीमा योजना, सरकारी अस्पतालों में सुविधाओं का विस्तार, मुफ्त दवाएं और जांच जैसे गहलोत सरकार के कदमों ने आम आदमी को राहत दी थी। जनता का कहना है कि उस दौर में कम से कम यह भरोसा था कि सरकार उनके स्वास्थ्य को लेकर चिंतित और सहयोगी है। विधानसभा में पूर्ववर्ती अशोक गहलोत सरकार द्वारा लागू किए गए ‘राइट टू हेल्थ’ पर चिकित्सा मंत्री गजेंद्र सिंह खींवसर ने जब कहा कि चुनावी फायदे के लिए जाते जाते कांग्रेस सरकार यह बिल लाई थी। तो, पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने तीखा पलटवार करते हुए कहा कि मंत्री का ये बयान न सिर्फ निंदनीय है, बल्कि गरीब लोगों के जख्मों पर नमक छिड़कने के समान है।
नेतृत्व की कमजोरी और नीतिगत शून्यता
मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा के नेतृत्व वाली सरकार पर यह आरोप लगातार लग रहा है कि स्वास्थ्य क्षेत्र उसकी प्राथमिकताओं में नहीं है। राजनीतिक विश्लेषक निरंजन परिहार कहते हैं कि बड़े-बड़े घोषणापत्रों और योजनाओं के बावजूद राजस्थान की वर्तमान सरकार का स्वास्थ्य सेवाओं के मामले में जमीनी स्तर पर कोई असर नजर नहीं आता। परिहार कहते हैं कि नीतियां बन रही हैं, लेकिन उनका क्रियान्वयन ढीला है। राजनीतिक चिंतक अशोक भाटी का कहना है कि सरकारी हालात ने स्वास्थ्य जैसी संवेदनशील सेवा को मंत्रालय की फाइलों और अधिकारियों की बैठकों तक सीमित कर दिया है, यह गंभीर चिंता का विषय है। भाटी कहते हैं कि इसी कारण लोगों को अशोक गहलोत की सरकार के दौरान हेल्थ मामलों में मिले लाभ याद आ रहे हैं।
राठौड़ बोले – स्वास्थ्य मंत्री की विभागीय बेरुखी
स्वास्थ्य विभाग की कमान संभाल रहे गजेंद्र सिंह खींवसर पर भी गंभीर सवाल उठ रहे हैं। विपक्ष का आरोप है कि विभागीय निरीक्षण, फील्ड विज़िट और त्वरित निर्णयों में मंत्री की सक्रियता न के बराबर है। जनता का अनुभव भी कुछ ऐसा ही है कि शिकायतों पर देर से कार्रवाई होती है, अधिकारियों पर सख्ती का अभाव है और डॉक्टरों और स्टाफ की जवाबदेही तय न होना भी सरकार की कमजोरी है। कांग्रेस नेता धर्मेंद्र सिंह राठौड़ का कहना है कि जनभावना के प्रति सरकार की यही बेरुखी स्वास्थ्य सेवाओं को और कमजोर बना रही है। स्वास्थ्य सेवा कोई चुनावी नारा नहीं, बल्कि जनता के जीवन से जुड़ा अधिकार है। राठौड़ कहते हैं कि ऐसे में जनता स्वाभाविक रूप से अशोक गहलोत सरकार के उस दौर को याद करेगी ही कि जब उसे लगा था कि उसकी सेहत सरकार की प्राथमिकता है।

डॉक्टर गांवों में जाना क्यों नहीं चाहते?
डॉक्टरों का गांवों में नौकरी के लिए नहीं जाना सरकार के लिए सबसे चुनौतीपूर्ण है। डॉक्टरों का तर्क है कि ग्रामीण क्षेत्रों में आवास, सुरक्षा और बुनियादी सुविधाओं का अभाव है। स्कूल, शिक्षा और परिवार से जुड़ी समस्याएं हैं। साथ ही काम का अत्यधिक दबाव तो चल जाता है, लेकिन संसाधनों की कमी से वे सेवा करने में समर्थ नहीं हो पाते। लेकिन जनता का सवाल इससे भी तीखा है कि अगर डॉक्टर गांव नहीं जाएंगे, तो गांव के लोग इलाज के लिए कहां जाएंगे? यह असंतुलन बताता है कि सरकार की नीतियों में प्रोत्साहन, मजबूरी और निगरानी, तीनों की कमी है। विधायक सराफ ने कहा है कि नए डॉक्टरों की नियुक्ति हो तो उससे कम से कम 50 लाख का बॉण्ड भरवाया जाए और पहले 5 साल उसकी पोस्टिंग दूरदराज के गांवों में किए जानमे की शर्त का पालन करवाया जाए।
जमीनी हकीकत बनाम सरकारी दावे
वर्तमान सरकार के दावे और जमीनी हकीकत के बीच की खाई दिन-ब-दिन चौड़ी होती जा रही है। जहां एक ओर प्रेस विज्ञप्तियों में सुधार के आंकड़े पेश किए जाते हैं, वहीं दूसरी ओर ग्रामीण राजस्थान में लोग आज भी डॉक्टर की एक झलक के लिए तरस रहे हैं। यह विरोधाभास सरकार की विश्वसनीयता पर भी सवाल खड़े करता है। राजस्थान की स्वास्थ्य सेवाओं की बदहाली केवल एक विभाग की समस्या नहीं, बल्कि शासन की संवेदनशीलता की परीक्षा है। डॉक्टरों के खाली पद, ग्रामीण इलाकों की उपेक्षा, नेतृत्व और मंत्री स्तर पर सक्रियता की कमी, और जनता की बढ़ती निराशा जैसे ये सभी संकेत हैं कि यदि समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो हालात और भयावह हो सकते हैं। सरकार की जनता के स्वास्थ्य को प्राथमिकता नहीं, तो इसीलिए उसके प्रति भरोसा भी नहीं बन रहा।
-आकांक्षा कुमारी
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