Saurabh Dwivedi: लल्लनटॉप… बस नाम ही काफी है। यह नाम शुरू से ही गमछा कांधे पर लिए देहाती शब्दावली वाले सौरभ द्विवेदी (Saurabh Dwivedi) के साथ खड़ा दिखता है, जहां शब्द केवल सूचना का साधन नहीं रहते, बल्कि अनुभवों को स्वरों में और भाषा को भावनाओं में बदलकर पाठक, दर्शक व श्रोता के भीतर उतर जाते हैं। सौरभ द्विवेदी Saurabh Dwivedi की लोकप्रियता का मतलब सिर्फ़ टीवी, टैब, कंप्यूटर, लैपटॉप या मोबाइल की स्क्रीन पर दिखना नहीं, बल्कि यह एक संवेदनशील, सधे हुए और ठेठ देसी अंदाज़ का जादू है, जो देखने वाले को बार-बार लौटकर उनकी बात सुनने, उनको देखने और उनको जीने पर मजबूर करता है। ठेट देसी अंदाज में, कांधे पर हर रोज हर रंग का गमछा लपेटे पत्रकार सौरभ द्विवेदी को देश – दुनिया ने बहुत प्यार दिया और 2026 की शुरूआत में जब ‘द लल्लनटॉप’ (The Lallantop) के मुखिया और ‘इंडिया टुडे’ (India Today) की संपादकी को उन्होंने छोड़ा, तो देश उनके कदमों की आहट तलाशने लगा। सौरभ द्विवेदी के अनोखे और लोकप्रिय अंदाज़, उनकी कस्बाई – देहाती भाषा और देसी शैली, जो उनके साथ रहती है, वही हर साधारण (लल्लन) को ‘टॉप’ (Lallantop) बनाती रही है।

देसी लहजे के फकीर की किसी गजल से सौरभ के शब्द
सौरभ द्विवेदी के नेतृत्व ने हिंदी पत्रकारिता की पारंपरिक और गंभीर भाषाई शैली को बदलकर ‘द लल्लनटॉप’ को देसी और लोकप्रिय बनाया, इसी वजह से टीवी से उखड़ता हुआ युवा वर्ग का उनके दर्शक के रूप में जुड़ा रहा। उन्होंने ‘द लल्लनटॉप’ की भाषाई तासीर और संवाद अदायगी को पत्रकारिता के नए दौर की मुख्य विशेषता के रूप में स्थापित किया है। भाषायी पकड़ की बात करें तो सौरभ की भाषा एक दर्पण की तरह है, सरल, स्पष्ट और तह दर तह परतों में समृद्ध। वे जटिल विचारों को भी उस सहजता से पेश करते हैं कि सुननेवाला सोचता ही रह जाए कि वह भी उसी भाषा का लंबे समय से हिस्सा रहा है, मगर सौरभ कुछ और है। न कोई दिखावा नहीं, न ही साहित्यिक भारीपन; फिर भी हर वाक्य में ठोस अर्थ, ताज़गी और एक खास टोन का निखरता हुआ आनंद मिलता है। उनकी सबसे बड़ी ताकत है जटिल विषयों को भी ‘ठेठ देसी’ बोली के जरिए जनमानस में परोस देना, ताकि हर वर्ग का दर्शक, पाठक या श्रोता उसे सीधे समझ सके और उसे अपनाकर अपने विचारों में बदल सके। सबसे महत्वपूर्ण यह है कि सौरभ द्विवेदी वह पत्रकार हैं, जो किसी से बात करते हैं, तो दिल खोलकर बात करते हैं। उनकी भावनात्मक अभिव्यक्ति में ईमानदारी, स्पष्टता और पारदर्शिता भी है। इसीलिए, वे कठोर सच कहने में संकोच नहीं करते, और बोलते हैं तो बचाव के साये के बिना बेलाग। यही खुलापन उनकी छवि को विश्वसनीय बनाता है, लोग उन्हें वही कहते देखते हैं, जो वे मानते हैं, और उनका यही सामर्थ्य लोगों से एक निजी संबंध जैसा कुछ खास पैदा कर देता है, जो आसानी से छूटता नहीं और टूटता भी नहीं।
दिल से निकलकर सीधे दिल में उतरते हैं उनके बोल
भारतीय पत्रकारिता में जिस तरह से प्रभाष जोशी ने ठेठ देसी शब्दावली को संजोकर ‘जनसत्ता’ को देश का सबसे तीखे तेवर वाला अखबार बनाया था, उसी तर्ज पर सौरभ द्विवेदी ने ‘द लल्लनटॉप’ को कस्बाई और देहाती पुट देकर शुद्ध हिंदी के बजाय नई शब्दावली के गहरे प्रभाव से सराबोर किया। सौरभ ने ही पत्रकारिता में ‘भकाभक’, ‘रेला’, ‘भौकाल’, ‘भसड़’, ‘ठोका’, ‘ठुकाई’, ‘रगड़ाई’, ‘खंगालना’, ‘किस्सागोई’, ‘लल्लनटॉप’ और ‘बवाल’ जैसे शब्दों का खुलकर प्रयोग किया, और किताबी हिंदी के बजाय उस भाषा का प्रयोग किया जो आम आदमी सड़क या चाय की दुकान पर बोलता है। देसी अंदाज़ सौरभ द्विवेदी की संवाद अदायगी की आत्मा है। वे शहरी-शैली के उभार और ग्रामीण-सादगी के मेल को सहजता से बोध कराते हैं। कभी मुहावरे का चरपरा नमकीन, कभी लोकोक्तियों का तेज तड़का, तो कभी लोकभाषा का नम्र लहजा। उनके अंदाज़ न तो पाखण्डी है और न ही बनावटी; वह एक ऐसी भाषा लिए सबके बीच उपस्थित होते हैं, जो सीधे दिल से निकल कर दिल में उतरती है। शब्द-सौंदर्य के प्रति सौरभ की संवेदना का अलग ही स्तर है। शब्दों को वे बस बोलते नहीं जाते बल्कि संवारते जाते हैं। कहीं से भी शुरू करके कहीं भी खत्म करने का उनका अंदाज निराला है, तो सही जगह पर विराम, सही जगह पर चिंगारी, सही वक्त पर च्यूंटी और सही जगह पर चुप्पी। सौरभ की भाषा के इसी लालित्य और प्रवाह का सौंदर्य, उनके दर्शक, पाठक और श्रोता को भीतर तक प्रभावित कर देता है। इसीलिए न्यूज टेलीविजन पर 15 मिनट के छोटे से इंटरव्यू भी देखने से परहेज करने वाला दर्शक सौरभ के किए हुए डेढ़ घंटे के इंटरव्यू भी देखने में दिलचस्पी रखता है।

सौरभ की हर भावाभिव्यक्ति में भरोसे का पुट
किसी भी विषय, व्यक्ति और वस्तुस्थिति के बारे में सबसे पहले गहन अध्ययन और अन्वेषण सौरभ द्विवेदी की मुखरित पत्रकारिता का मुख्य आधार हैं। सतही पैनापन और हर किसी पर हावी होने की कोशिश उनके स्वभाव का हिस्सा नहीं है। वे किसी मुद्दे को पेश करते हैं तो उसके ऐतिहासिक, सामाजिक और नीतिगत आयामों को सबसे पहले खंगालते हैं। तथ्यों की तह में उतरना, फिर किसी की जिंदगी को दस्तावेज़ की तरह पढ़ने में जमीनी जुड़ाव से मिलाकर निष्कर्षों की संवेदनशीलता को बेबाकी के साथ कहना सौरभ की आदत का हिस्सा रहा है, और यही उनकी असली जिंदगी का किस्सा भी है। व्यावहारिक वेदनाओं का आधार और सामाजिक संवेदनाओं का सार, जब सौरभ द्विवेदी की बोली में उतरता है, तो वह सूखा नहीं रहता; वह संघर्ष से सराबोर, भावनाओं को भीषण ज्वार और दर्द के दहकते दावानल सा, मगर आशा और उम्मीद से भरपूर भी होता है। इसलिए उनके लेखन में, उनकी बातचीत में और उनकी भावाभिव्यक्ति में भरोसे का पुट भी साफ प्रतीत होता है और पाठक, दर्शक व श्रोता से सीधा सम्पर्क भी। उनकी पत्रकारिता में शब्दों का संगीत, तथ्यों का वज़न और मनुष्यता का स्पर्श, तीनों एक साथ चलते हैं। यही वजह है कि आज सौरभ द्विवेदी केवल एक नाम नहीं, बल्कि देश की भरोसेमंद आवाज़ बन चुके हैं, जो आसान तो कतई नहीं था।
-निरंजन परिहार (लेखक राजनीतिक विश्लेषक और वरिष्ठ पत्रकार हैं)
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