Vishwanath Sachdev: शब्दों के संसार में विश्वनाथ सचदेव का होना, मुंबई (Mumbai) में हिंदी की दुनिया के लिए एक अप्रतिम घटना है। अप्रतिम इसलिए, क्योंकि वे इस शहर के अंतिम महान संपादक हैं। पर, शायद महान नहीं, उन्हें एक संपूर्ण मनुष्य कहना ठीक रहेगा। क्योंकि महान होने पर, तो कोई भी मनुष्य नहीं रह जाता, और विश्वनाथ सचदेव (Vishwanath Sachdev) मनुष्य हैं, यही हमारे लिए पर्याप्त है। इससे भी ज्य़ादा पर्याप्त यह है कि मुंबई में, संपादक (Editor) नाम की संस्था को संपूर्ण बनाने में उनका योगदान, औरों के मुकाबले अत्यधिक सराहनीय और सम्माननीय रहा है। पत्रकारिता में विश्वनाथ सचदेव इतने पक्के रहे हैं कि आर्थिक राजधानी की धुर आर्थिक ताकतें भी उनके ईमान का मोल लगाने का कभी सोच तक नहीं सकीं और अच्छा हुआ कि मीडिया के बाजारवाद की चपेट में आने के, बदनाम दौर के शुरू होने से पहले ही उन्होंने कलुषित पत्रकारीय संसार से आजादी पा ली। नवभारत टाइम्स (Navbharat Times) में दुनिया ने देखा कि समाचारों की संवेदनशीलता, तथ्य तलाशने की ताकत, विचारों की व्यापकता और प्रस्तुति के प्राविण्य सहित शब्दों को संवारने की जादूगरी विश्वनाथ जी में अपार और अदम्य है। संसार के किसी भी अच्छे संपादक में, इतने ज्यादा तत्वों का होना आश्चर्य माना जाता है, ऊपर से उनमें रचनात्मकता, धैर्य, और भाषाई काव्य शैली की क्षमता भी अद्भुत है। वे बतियाते हैं, तो जैसे स्नेह के मोती संवरते हैं, लेखनी में लालित्य लहराता है, और उनके भाषणों में कविता सा बहाव बहता है।

हिंदी शब्दजीवियों की दुनिया के आधार स्तंभ
एक व्यक्ति, एक ही जनम में आखिर क्या – क्या हो सकता है, विश्वनाथ सचदेव इसकी व्यापक व्याख्या है। वे लेखक हैं, पत्रकार हैं, साहित्यकार हैं, स्तंभकार हैं, कवि भी हैं और इन सबके पार, मनुष्य होने के तौर पर असाधारण आदरणीय और विनम्र – विरल व्यक्तित्व भी। पता नहीं, किसी को यह पचे ना पचे, लेकिन विश्वनाथ सचदेव को मुंबई के हिंदी शब्दजीवियों की दुनिया का आधार स्तंभ कहा जा सकता है, क्योंकि भाषा के तौर पर हिंदी के लिए पराए कहे जाने वाले शहर मुंबई में, हिंदी को स्थापित करने में उनकी अग्रणी भूमिका रही है। बीकानेर से उन्होंने 1962 में, साहित्यिक पत्रिका ‘वातायन’ के संपादन से पत्रकारिता शुरु की, और देश की प्रतिष्ठित साहित्यिक पत्रिका ‘नवनीत’ के सन 2005 से वे अनवरत संपादक हैं। वे सन 1967 में, 25 साल की उम्र में, टाइम्स ऑफ इंडिया ग्रुप से जुड़े और सन 1990 में अपनी पत्रकारिता जब ‘नवभारत टाइम्स’ जयपुर में शुरू हुई, उससे भी बहुत पहले विश्वनाथ सचदेव 1987 मुंबई में ‘नवभारत टाइम्स’ के संपादक थे और 2003 तक लगातार संपादक रहे। इस बीच 1991 से 1995 तक ‘धर्मयुग’ का संपादन भी उन्होंने किया।
सचदेव के शब्द संवेदना से सजा अनुभव
बरसों बरस अपने जैसे लाखों लोग विश्वनाथ सचदेव का लिखा पढ़ते रहे हैं। मगर, आज अपन उन पर लिखते हुए यह कह सकते हैं कि उनकी लेखन शैली एक मानक है और उनके लिखे में महज रचनात्मकता नहीं, बल्कि लय, प्रवाह और स्थिरता के साथ जीवन का स्पंदन भी होता है। वे जानते हैं कि भाषा तभी असर करती है, जब वह दिल से निकले और सीधे दिलों में बस जाए। इसीलिए उनके लेखन में जटिलता नहीं, सहजता होती है, और वह भी इतनी गहरी कि पाठक के मन में स्थायी रूप से बस जाती है। उनकी लेखनी का सबसे बड़ा स्वभाव है भावनात्मक संतुलन। विश्वनाथ सचदेव न अतिश्योक्ति में बहते हैं, न शब्दों को सजावटी बनाते हैं और न ही उनसे अपना जुड़ाव दूर रखते हैं। उनके लिखे की हर पंक्ति में अर्थ का एक सहज प्रवाह है, जो भाषा को कला का रूप दे देता है और उसमें मानवीय भावनाएं सहजता से बहती दिखती हैं। उनका लेखन यह सिखाता है कि सरल भाषा ही सबसे प्रभावशाली होती है, बशर्ते उसमें भावनाओं की सच्चाई, तथ्यों की ताकत और मानवीय मर्यादा भी हो। विश्वनाथजी के लिखे को पढ़कर कहा जा सकता है कि शब्द जब संवेदना से मिलते हैं, तो वे लेखन नहीं, अनुभव का रूप धर लेते हैं।

अंग्रेजी में प्राविण्य फिर भी हिंदी में शिखर पर
तब के हिंदुस्तान और आज के पाकिस्तान के साहीवाल में, 2 फरवरी, 1942 को सोमवार के दिन जन्मे विश्वनाथ सचदेव का परिवार विभाजन में भारत आया। सन 1942 से लेकर, आज 30 नवंबर 2025 तक के 83 साल और 10 महीनों के, अब तक के कुल 30,617 दिनों के अपने जीवनकाल में विश्वनाथ सचदेव ने, स्वयं को जिस तरह से गढ़ा, वैसा आम तौर पर कोई गढ़ नहीं पाता। बालपन के उनके मित्रों से जाना कि पिता सिरोही में सरकारी सेवा में रहे, तो विश्वनाथ जी सिरोही में पढ़े और पले – बढ़े, व समझदार भी सिरोही में ही हुए। वही सिरोही, जहां से निकलकर संगीतकार श्रवण राठौर, गायक रूप कुमार राठौर, पार्श्व गायक विनोद राठौर, कवि – कलाकार शैलेष लोढ़ा, फिल्म निर्देशक डॉ चंद्रप्रकाश द्विवेदी और संगीतकार संजीव – दर्शन और चुनावी रणनीतिकार के रूप में अपन स्वयं निरंजन परिहार जैसे लोग अपने कृतित्व से देश भर में प्रसिद्ध हो गए। राजस्थान विश्वविद्यालय से उन्होंने अंग्रेजी में एमए किया और नागपुर विश्वविद्यालय से पत्रकारिता में डिग्री। अंग्रेजों के जमाने में जन्मे और अंग्रेजी में ही एमए करने वाले विश्वनाथ सचदेव की तरह अंग्रेजी से नाता तोड़कर, हिंदी में साहित्य, लेखन, कविता और संपादकी के शिखर पर पहुंचने की दूसरी मिसालें देश में बहुत कम हैं।
संपादक कई आए और गए, पर उन जैसा कोई नहीं
होने को तो विश्वनाथ सचदेव भी, आपकी और हमारी तरह, रंगों की रंगबिरंगी रंगीनियों वाले रंगीले फैशन की राजधानी मुंबई में ही हैं, लेकिन एकरंगे विश्वनाथ जी रंगों के मामले में अक्सर अजूबा लगते हैं। क्योंकि हर रोज हल्के खाकी रंग की पेंट और सफेद शर्ट उनके जीवन का अभिन्न हिस्सा है। बहुत कम लोग होंगे, जिनको किसी और रंग के कपड़ों में विश्वनाथजी के दर्शन की उपलब्धि हासिल हुई होगी। अपना सौभाग्य रहा कि मुंबई में, पहले प्रिंट में 10 साल फिर टीवी में 10 साल, अर्थात लगभग दो दशक के दौरान उनका स्नेहिल आशीर्वाद मिलता रहा। विश्वनाथ जी के लेख संग्रह ‘तटस्थता के विरुद्ध’ और ‘सवालों के घेरे’ के अलावा ‘मैं गवाही देता हूं’, ‘मैं जो हूं’, व ‘बुढ़िया, सूत और सपने’ जैसे कविता संग्रह काफी प्रसिद्ध रहे। लेखन, साहित्य व पत्रकारिता के क्षेत्र में उनको कई सम्मान, पुरस्कार और अवॉर्ड भी मिले। लेकिन इस संसार में उनके होने की सार्थकता सिर्फ इस बात से है कि उनके साथ और उनके बाद भी, संपादक तो मुंबई में कई आए और गए, मगर, लाखों शब्दजीवियों के श्रद्धापुरुष के रूप में उनकी बराबरी का सम्मान कोई और नहीं पा सका। विश्वनाथ जी के व्यक्तित्व की विराटता का वास्तव और उनके सचदेव होने की यही सच्चाई है!
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निरंजन परिहार
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