Amitabh Bachchan: राजनीति कैसी होती है, यह समझना मुश्किल है। उसकी असलियत को समझना तो और भी मुश्किल। मगर, जो समझ भी जाए, तो वह अक्सर टूट ही जाता है। अमिताभ बच्चन (Amitabh Bachchan) ने राजनीति की असलियत को बहुत करीब से देखा। इतना करीब से, जितना कोई कलाकार शायद ही देख पाया है। वे अभिनेता हैं। सदी के महानायक। लेकिन एक समय ऐसा आया, जब अभिनय से ज़्यादा देश उन्हें बुला रहा था। राजीव गांधी (Rajiv Gandhi) और अमिताभ बच्चन मित्र ही थे। ऐसे मित्र कि 13 जनवरी 1968 की कड़ाके की सर्द सुबह में पालम एयरपोर्ट पर राजीव की मंगेतर के रूप में जब सोनिया गांधी (Sonia Gandhi) पहली बार भारत पहुंची तो उनको लेने वे ही पहुंचे थे। अमिताभ के पिता हरिवंश राय बच्चन जवाहरलाल नेहरू के करीबी थे और मां तेजी बच्चन इंदिरा गांधी की। वास्ता परिवार का था। दोनों में विश्वास का रिश्ता था। साथ चलने का भरोसा था। वह साल 1984 का था। इंदिरा गांधी की हत्या हो गई। राजीव गांधी ने कहा, तो दोस्ती निभाने, अमिताभ राजनीति (Politics) में उतरे, कांग्रेस (Congress) से लोकसभा चुनाव लड़े।
संबंधों में स्नेह, मगर सांसों में साज़िश
अमिताभ बच्चन 2 लाख वोट से जीते। इलाहाबाद की धरती से सांसद बने। वही इलाहाबाद, जहां उन्होंने जन्म लिया था, जहां से उनका आत्मविश्वास उपजा था और भविष्य की संभावनाएं भी। सामने सदा लोगों की भीड़ थी। उम्मीदें थीं तालियां थीं और हर वक्त हजारों हिलते हाथों का अक्स भी। लेकिन राजनीति सिर्फ़ भीड़ से नहीं चलती। यहां संबंधों में स्नेह टपकता है, मगर सांसों में साज़िशें सजती हैं। आवाजें मौन होती हैं, मगर चुप्पियां बोलती हैं। अमिताभ बच्चन तब भी अभिनय के शिखर पर थे, और सांसद के तौर पर चर्चित भी। वे 1984 में चुनाव जीते, मगर, साल 1988 में आया राजनीति का एक बेरहम दौर। खेल खतरनाक था। प्रधानमंत्री राजीव गांधी पर बोफोर्स तोप में घोटाले के आरोप लगे। अमिताभ का भी नाम उछाला गया। सवाल खड़े हुए।

राजनीति में रिश्ते नहीं निभाए जाते
बच्चन चौंक गए। वे राजनीति में नए थे। मगर, राजनीति पुरानी थी और कठोर भी। उन्होंने लोकसभा से इस्तीफ़ा दे दिया। कोई लंबा भाषण नहीं। कोई सफ़ाई नहीं। बस साफ दिल का एक फैसला। राजनीति से पीछे हटने का, संसद के गलियारों को आखरी सलाम का। कुछ लोग कहते हैं, अमिताभ डर गए थे। कई कहते हैं, वे टूट गए थे। लेकिन सच यह है कि उन्होंने साहसिक मन से राजनीति के सत्य को उस दिन गहरे से समझ लिया था। वे जान गए कि यह वह जगह नहीं, जहां रिश्ते निभाए जाते हैं। यह वह जगह है, जहां ज़रूरतें निभाई जाती हैं। उनहें समझ में आ गया था कि राजनीति में रिश्ते केवल राज करने की रणनीति को अंजाम पर पहुंचाने के लिए ही बनते हैं और बिखरते भी हैं।

गांधी परिवार से नाता टूटा नहीं बिखरा
संसद से निकले, तो बच्चन ने फिर अभिनय को चुना। पूरी ताकत से, दुगनी हिम्मत से। लेकिन एक टीस रह गई, मन के भीतर। दिल के कोने में। गांधी परिवार से नाता टूटा। धीरे-धीरे, बिना किसी शोर के। अमिताभ बच्चन ने कभी कोई आरोप नहीं लगाए। कभी सार्वजनिक शिकायत नहीं की। कभी किसी भी मंच से कुछ नहीं कहा। मगर, बच्चन परिवार के बारे में राहुल गांधी की बयानबाजी के कारण जब बहुत दबाव बना, तो बस एक वाक्य बोले – ‘वे राजा हैं और हम प्रजा, यह तो उन पर निर्भर करता है कि वे किससे संबंध रखें और किससे नहीं।‘ बस, इसी एक वाक्य में उनका पूरा राजनीतिक अनुभव छुपा था। पूरा दर्द और पूरी समझ। और यह भी कि राजा और प्रजा के बीच संवाद नहीं होते, आदेश होते हैं। राजा बदलते हैं। प्रजा रहती है। अमिताभ बच्चन ने यह स्वीकार कर लिया और आगे बढ़ गए। राजनीति में वे दोबारा नहीं गए। कभी नहीं। उन्होंने जान लिया था कि यहां ईमानदारी कमज़ोरी बन जाती है और सादगी अपराध समझी जाती है। उन्होंने देखा था कि दोस्ती सत्ता के सामने बहुत छोटी होती है। और सच, तो सत्ता से और भी छोटा।
राजनीति में कला नहीं कलाबाजियां होती हैं
अमिताभ बच्चन जानते हैं, कि राजनीति में जाना आसान है। लेकिन साफ़ निकल आना बहुत मुश्किल। शायद इसीलिए उन्होंने दोबारा कदम नहीं रखा। क्योंकि वे महान अभिनेता हैं। लेकिन राजनीति में वे केवल एक आम इंसान थे। और राजनीति आम इंसानों के लिए नहीं बनी होती। उनके लिए राजनीति एक अध्याय थी। अभिनय उनका धर्म था और कला उनका जीवन। कला में केवल कला होती है। मगर राजनीति में कला नहीं कलाबाजियां होती हैं, जीवन नहीं। जीवन के लिए उन्होंने फिर मंच सजाया। पर्दे पर लौटे। लोगों के दिलों में लौटे। आज भी जब उनसे राजनीति पर सवाल होता है, वे मुस्कुरा देते हैं, बात बदल देते हैं। क्योंकि कुछ अनुभव शब्दों में भी कभी दोहराए नहीं जाते। बस याद रखे जाते हैं।
निरंजन परिहार (राजनीतिक विश्लेषक)
इसे भी पढ़ेः Vivek Oberoi: बॉलीवुड का हीरो बिजनेस में भी टॉप पर, दुबई रियल एस्टेट में विवेक ओबरॉय का बड़ा नाम
यह भी देखेंः Mallika Sherawat: बिस्तर गरम करने के ऑफर ठुकराए, तो बॉलीवुड में मुश्किलें आईं मल्लिका शेरावत को

