Aravali: जैन धर्म के ऐतिहासिक तीर्थ स्थलों पर संकट आ सकता है। अरावली (Aravali) में खनन शुरू हुआ, तो कई जैन मंदिरों की अस्तित्व ही खतरे में संभव है। विशेष रूप से अरावली पर्वतमाला में, राजस्थान में जहां नारेली तीर्थ, राणकपुर, राता महावीरजी, मुछाला महावीरजी, बामणवाड़जी, पावापुरी, जीरावला और भैरूतारक धाम जैसे तीर्थ स्थल हैं, तो गुजरात में तारंगाजी, पालीताणा और जूनागढ़ जैसे अन्य ऐतिहासिक तीर्थ भी शामिल हैं। ये सभी जैन तीर्थ अरावली की गोद में बसे हैं। अरावली की पहाड़ियों के बारे में सरकार की नई परिभाषा से न केवल मारवाड़ और गोड़वाड़ क्षेत्र के प्राचीन जैन तीर्थों के लिए खतरनाक साबित हो सकता है, बल्कि समस्त राजस्थान, गुजरात, हरियाणा एवं दिल्ली क्षेत्र के जैन तीर्थों के लिए भी खतरनाक साबित होगा। जैन समाज में इसीलिए अरावली बचाओ (Save Aravali) अभियान को लेकर नई जागृति आ रही है।

ज्यादातर तीर्थ छोटी छोटी पहाड़ियों में स्थित
गोड़वाड़ क्षेत्र, जैन धर्म का प्रमुख केंद्र है, ज्यादातर मंदिर छोटी छोटी पहाड़ियों से घिरे हैं। सिरोही और पाली जिलों के तीर्थ जैन आगमों और इतिहास से जुड़े हैं। उदाहरणस्वरूप, राणकपुर का प्रसिद्ध जैन मंदिर चौबीस तीर्थंकर भगवान आदिनाथ को समर्पित है, जिसकी वास्तुकला विश्वविख्यात है। यह मंदिर अरावली की पहाड़ियों के बीच स्थित है, जहां चारों ओर हरी-भरी वादियां और छोटी-छोटी पहाड़ियां हैं। इसी प्रकार, राता महावीरजी भगवान मुछाला महावीरजी, पावापुरी, बामणवाड़जी और भैरूतारक धाम का भी अपना धार्मिक महत्व है। जीरावला में तो स्वयं भगवान महावीर पधारे थे। जीरावला तो तीन तरफ से छोटी – छोटी पहाड़ियों से ही घिरा तीर्थ है, और जयपुर का चूलगिरी जैन मंदिर भी अपनी ऐतिहासिकता के लिए प्रसिद्ध है। इन तीर्थस्थलों पर लाखों श्रद्धालु प्रतिवर्ष आते हैं, और इनकी रक्षा अरावली की अखंडता से जुड़ी हुई है। सरकार के नए फैसले से अरावली में खनन प्रक्रिया शुरू होने से मिट्टी उड़ेगी और वायु विकार से सांस से संबंधित बीमारियां भी बढ़ेंगी।
खनन विस्फोटों से मंदिरों को सीधा नुकसान होगा
जैन तीर्थों पर खतरे की यह घंटी अरावली पर्वतमाला को लेकर केंद्र सरकार का हालिया कदम से बज रही है। सरकार का यह फैसला पर्यावरण और धार्मिक विरासत दोनों के लिए खतरनाक है। केंद्र सरकार ने हाई कोर्ट में स्पष्ट किया है कि केवल 100 मीटर से ऊंची पहाड़ियां ही ‘अरावली’ की श्रेणी में आएंगी और इससे कम ऊंचाई वाली पहाड़ियों पर खनन, निर्माण और अन्य विकास गतिविधियां आसानी से हो सकेंगी। लेकिन खनन के दौरान किए जाने वाले भारी विस्फोटों से उत्पन्न कंपन मंदिरों की नींव को कमजोर कर सकते हैं, जिससे दीवारों में दरारें पड़ सकती हैं। खनन से उड़ने वाली धूल और रासायनिक कणों से मंदिरों में पत्थरों पर की गई नक्काशी को नुकसान पहुंचेगा, जिससे प्राचीन कलाकृतियों की चमक फीकी पड़ जाती है। अरावली पर्वतमाला को लेकर केंद्र सरकार के ताजा कदम से इन जैन धर्म स्थलों की शांति और प्राकृतिक सौंदर्य व ऐतिहासिक महत्व पर खनन का असर पड़ना निश्चित है।

खनन से पहाड़ी जमीन धंसने का खतरा संभव
अरावली पर सरकार के इस कदम से 100 मीटर से नीचे की पहाड़ियों पर अब खनन को वैधता मिल जाएगी। गोड़वाड़ में पहले से ही अरावली का दोहन हो रहा है, जिससे धूल, प्रदूषण और भूस्खलन जैसी समस्याएं बढ़ी हैं। गोड़वाड़ का जलस्तर भी नीचे चला गया है। नए कदम से राणकपुर, राता महावीरजी, मुछाला महावीरजी, बामणवाड़जी, जीरावला और भैरूतारक धाम जैसे तीर्थों के आसपास भी खनन गतिविधियों के बढ़ने से वायु प्रदूषण बढ़ेगा, जल स्रोत सूख जाएंगे और मंदिरों की संरचना पर खतरा मंडराएगा, यह निश्चित है। गहरे खनन के कारण क्षेत्र का जल स्तर गिर जाता है, जिससे पहाड़ी जमीन धंसने के खतरे भी बढ़ जाते हैं और मंदिरों के ढांचे अस्थिर हो सकते हैं। जैन तीर्थों की पवित्रता अहिंसा के सिद्धांत पर टिकी है, लेकिन अरावली पहाड़ियों में खनन गतिविधियों के बढ़ने से हर पल लाखों जीवों की भी हत्या होगी।
जैन समाज जागे, क्योंकि कई तीर्थ प्रभावित होंगे
गुजरात के जूनागढ़, पालीताणा, तारंगा, दिल्ली के तुगलकाबाद क्षेत्र और अन्य जैन स्थल भी प्रभावित होंगे। जैन समुदाय ने इसका विरोध शुरू कर दिया है। जैन संगठनों ने सरकार से अपील की है कि अरावली की पूरी श्रृंखला को संरक्षित किया जाए। क्योंकि अरावली क्षेत्र को 100 मीटर से नीचे की पहाड़ियों में बांटे जाने का देशव्यापी प्रभाव भी बहुत गंभीर है। विशेषज्ञ सुझाते हैं कि ड्रोन मैपिंग और जीआईएस तकनीक से सटीक ऊंचाई मापी जाए, न कि मनमानी परिभाषा थोपी जाए। मारवाड़ और गोड़वाड़ के ही नहीं देश भर में अरावली का असपास बसे स्थानीय निवासी भी चिंतित हैं, क्योंकि पर्यटन पर असर पड़ेगा। देश भर के जैन समाज को अरावली की पूरी श्रृंखला को संरक्षित करने को एकजुट होना होगा। वरना, गोड़वाड़ के ये ऐतिहासिक जैन तीर्थ इतिहास के पन्नों में सिमट जाएंगे। सरकार को केवल 100 मीटर से बड़ी पहाड़ियों को ही अरावली मानने के कदम पर पुनर्विचार करना चाहिए, ताकि जैन धर्म की विरासत बची रहे। जैन समुदाय और पर्यावरण प्रेमियों को भी एकजुट होकर अरावली के संरक्षण हेतु आंदोलन चलाना होगा।
– सिद्धराज लोढ़ा (लेखक ‘शताब्दी गौरव’ के संपादक हैं)
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