Ashok Gehlot: यह तस्वीर केवल एक नेता की शुरुआती सक्रियता का दृश्य नहीं है। उस दौर की छात्र राजनीति, संगठनात्मक ऊर्जा और सड़कों पर आकार लेती वैचारिक प्रतिबद्धताओं का भी जीवंत दस्तावेज़ है। काँग्रेस (Congress) के वरिष्ठ और नभस्पर्शी नेता अशोक गहलोत (Ashok Gehlot) का यह एनएसयूआई-कालीन (NSUI) दृश्य हमें याद दिलाता है कि बड़े राजनीतिक व्यक्तित्व अचानक नहीं बनते; वे जुलूसों, नारों, रातों की मशालों, साथियों की भीड़, संगठन के अनुशासन और लंबी प्रतीक्षा से बनते हैं। यही कारण है कि इस एक तस्वीर में केवल गहलोत नहीं, एक पूरा राजनीतिक युग बोलता हुआ दिखाई देता है।
तस्वीर में जो हैं, कोई आगे बढ़ा, कोई गुमनाम
ऐसी तस्वीरों की सबसे बड़ी विशेषता यह होती है कि वे इतिहास को एक व्यक्ति से उठाकर सामूहिकता की ओर ले जाती हैं। गहलोत के एक तरफ़ एक कार्यकर्ता दिखता है और दूसरी तरफ़ तीन युवा चेहरे। तस्वीर को देखने वाला सहज ही पूछता है: ये कौन लोग थे? उस समय उनकी भूमिका क्या रही होगी? क्या वे भी आगे चलकर राजनीति, संगठन, समाजसेवा, प्रशासन या किसी अन्य सार्वजनिक जीवन में सक्रिय रहे? या फिर वे उन अनगिनत कार्यकर्ताओं में शामिल हो गए, जिनकी मेहनत ने नेताओं को ऊँचाई दी, पर जिनके नाम समय की धूल में धुँधले पड़ गए?

गुमनाम कंधों की भी कहानी है सियासत
यहीं इस तस्वीर का असली अर्थ खुलता है। राजनीति केवल शीर्ष नेतृत्व की कथा नहीं होती; वह उन गुमनाम कंधों की भी कहानी होती है, जो झंडा उठाते हैं, मशाल थामते हैं, नारे लगाते हैं, भीड़ संगठित करते हैं और किसी आंदोलन को आकार देते हैं। संभव है कि इन युवकों में से कुछ ने आगे लंबी राजनीतिक यात्रा की हो, संभव यह भी है कि वे सक्रिय राजनीति से दूर चले गए हों। पर इस क्षण में वे सब इतिहास के बराबर के हिस्सेदार हैं। बिना प्रामाणिक अभिलेख, पुराने साथियों की गवाही या संगठनात्मक रिकॉर्ड देखे इस तस्वीर में दिख रहे अन्य व्यक्तियों की पहचान निश्चित रूप से कहना ठीक नहीं होगा; लेकिन इतना अवश्य कहा जा सकता है कि उनकी उपस्थिति इस फ्रेम को अधिक मानवीय, अधिक लोकतांत्रिक और अधिक ऐतिहासिक बनाती है।
इस उम्र में भी गहलोत सक्रिय शानदार
दरअसल, यह फोटो एक विनम्र स्मरण भी है कि सार्वजनिक जीवन में किसी भी बड़े नेता की यात्रा अकेले नहीं होती। उसके पीछे समय, विचार, संघर्ष और साथी होते हैं। इसलिए यह तस्वीर अशोक गहलोत के राजनीतिक आरोहण का आरंभिक संकेत भर नहीं, उस पूरी पीढ़ी को सलाम है, जिसने अपने-अपने हिस्से की रोशनी से एक बड़े राजनीतिक नाम के चारों ओर इतिहास का यह उजास रचा। और आज भी जब अशोक गहलोत से प्रतिपक्षी ही नहीं, अपनी ही पार्टी के ढेरों नेतृत्वशील लोग भयंकर क्षुब्ध रहते हैं, अपना क्षोभ अनाम ट्विटर हैंडल से प्रकट करते हैं और अगले ही किसी दिन के आगोश में विनम्र भाव से उनके साथ फ़ोटो खिंचवाते हुए दिखते हैं ) तो इसकी एक बड़ी वजह पचहत्तर साल के आँकड़े से कुछ ही दिन दूर होने पर भी उनकी भयंकर सक्रियता है। यह सक्रियता ही उन्हें उच्च नेतृत्व के अप्रासंगिक किए जाने के दौर में भी प्रासंगिक बनाए रखती है। न कोई उन जितना सक्रिय हो और न ही कोई उनका राजनीतिक स्थान भरे!

जिनकी पहचान ही बन गई इतिहास
दरअसल, अशोक गहलोत सियासी राहों में इतनी धूल उड़ा देते हैं कि सियासत के शीर्ष पर पहुँचने के मन, स्वप्न और दिवास्वप्न देखने वाले लोगों को रास्ता नज़र तो आए लेकिन अगर ग़ुबार छटे तो! मुझे लगता है, वो चार लोग भी इसी ग़ुबार में सबसे पहले खोने वाले लोगों में रहे हैं और उनकी पहचान ऐतिहासिक है! इस ग़ुबार में खोने वाले नए नाम कौनसे हैं? सूची बनाकर रखनी चाहिए कि इस बार ग़ुबार उड़ाने वाला तूफ़ान शांत होकर बैठ जाएगा। क्या कोई काली घटा उमड़ेगी, जो बरस कर इस तूफ़ान को थाम दे?
– त्रिभुवन (राजस्थान के वरिष्ठ पत्रकार)
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