Rajasthan: राजनीति हमेशा से ही खेमेबाजी, जातिगत समीकरणों और नेतृत्व की होड़ से भरी रहती है। इसीलिए, किसी भी बड़े नेता से किसी की मुलाकात के मायने भी तेजी से तलाशे जाते रहे हैं। यही कारण है कि जयपुर में पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत (Congress) के आवास पर 28 नवंबर 2025 को हुई एक साधारण सी लगने वाली मुलाकात ने राजनीतिक गलियारों में हलचल मचा दी। कांग्रेस (Congress) के युवा नेता और हिण्डोली के विधायक अशोक चांदना (Ashok Chandna) ने सिविल लाइंस स्थित गहलोत के निवास पर जाकर उनसे लंबी चर्चा की, जो सोशल मीडिया और न्यूज चैनलों पर तुरंत छा गई। यह मुलाकात महज औपचारि शिष्टाचार भेंट नहीं, बल्कि राजस्थान कांग्रेस के अगले प्रदेश अध्यक्ष पद को लेकर एक संकेत मानी जा रही है। क्योंकि वर्तमान प्रदेश अध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा को साढ़े पांच साल पूरे हो चुके हैं, और उनकी विदाई की अटकलें तेज हैं। ऐसे में चांदना जैसे मेहनती और जुझारू नेता का उभरना न केवल गहलोत खेमे की रणनीति का हिस्सा लगता है, बल्कि यह गुटबाजी के जटिल जाल में कांग्रेस में एक नया मोड़ भी जोड़ता है। खासकर जब सचिन पायलट जैसे गुर्जर नेता का प्रभाव राज्य की राजनीति में हावी है, तो दूसरे गुर्जर नेता चांदना की गहलोत से नजदीकी कई सियासी सवाल खड़े कर रही है।
विवादों से दूर मगर पार्टी के प्रति समर्पित चांदना
अशोक चांदना गुर्जर समुदाय से ताल्लुक रखते हैं, जो राजस्थान की राजनीति में निर्णायक भूमिका निभाता है। मात्र 40 वर्ष की आयु के चांदना जुझारू और परिणाम देने वाले नेता के रूप में पहचाने जाते हैं। गहलोत खेमे के प्रबल समर्थक होने के नाते चांदना का राजनीतिक सफर हमेशा से ही पूर्व मुख्यमंत्री की छत्रछाया में फला-फूला है। राजस्थान की राजनीति के जानकार निरंजन परिहार कहते हैं कि अशोक चांदना की सबसे बड़ी खासियत यह है कि वे विवादों से दूर रहते हैं और पार्टी के प्रति पूर्ण समर्पण दिखाते हैं। हाल ही में अंता उपचुनाव में उनकी भूमिका इसका जीता-जागता प्रमाण है। चांदना ने वहां बूथ स्तर पर जनसंपर्क अभियान चलाया, ग्रामीण सभाओं का आयोजन किया और युवा कार्यकर्ताओं को एकजुट किया, जिससे कांग्रेस ने शानदार जीत हासिल की। परिहार कहते हैं कि चांदना की गुर्जर पहचान उन्हें मीणा और अन्य समाजों के साथ जोड़ने में मदद करती है, लेकिन पायलट का विरोध उन्हें आसानी से पद दिलाने नहीं देगा।

पायलट – चांदना दोनों गुर्जर, मगर दोनों अलग
पूर्व मंत्री अशोक चांदना की गहलोत से नजदीकी तो जगजाहिर है, लेकिन राजनीतिक रूप से सबसे संवेदनशील मुद्दा यह है कि अपने ही गुर्जर समाज से होने के बावजूद सचिन पायलट से उनका मन थोड़ा कम मिलता है। वरिष्ठ पत्रकार संदीप सोनवलकर कहते हैं कि राजस्थान में तो क्या देश भर में कांग्रेस में किसी भी गुर्जर नेता के राजनीतिक विकास में सचिन पायलट को सबसे बड़ा अवरोध माना जाता रहा है। फिर, सन 2020 के पायलट विद्रोह के दौरान तो चांदना ने गहलोत का खुलकर साथ दिया, जिससे दोनों गुटों के बीच खाई भी और गहरी हो गई। जातिगत जनाधार देखें, तो गुर्जर समाज में पायलट का प्रभुत्व है, जो चांदना जैसे युवा चेहरे के पार्टी में उभरने से बंट सकता है। राजनीति के जानकार मानते हैं कि गहलोत खेमा अशोक चांदना को आगे बढ़ाकर पायलट के प्रभाव को संतुलित करने की कोशिश कर सकता है। हालांकि, पायलट समर्थक इसे एक और गुटबाजी का बीज मानते हैं और चेतावनी देते हैं कि इससे कांग्रेस को 2028 में नुकसान हो सकता है। लेकिन वे यह नहीं कहते हि पायलट ने जो गुटबाजी की है, उसको कम करने के लिए यही एक उपाय है।
चांदना की ताकत और पार्टी के प्रति समर्पण
राजस्थान की राजनीति में अशोक चांदना को ‘रिजल्ट ओरिएंटेड’ नेता के रूप में जाना जाता है। वरिष्ठ पत्रकार त्रिभुवन कहते हैं कि संघर्षशील नेताओं में सबसे बेहतर नाम को देखें तो अशोक चांदना को देखें, जिन्होंने यूथ कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष का चुनाव लड़ा और वे हार गए। लेकिन हार नहीं मानी और विधायक भी बने और मंत्री भी। चांदना 2018 से हिण्डोली से विधायक हैं, और 2023 में 45,000 से अधिक वोटों से जीते हैं। उनकी असली ताकत संगठन निर्माण में है। राजस्थान युवक कांग्रेस के अध्यक्ष के वर्तमान सांसद नीरज डांगी ने एक बड़ी युवा टीम बनाई थी, लेकिन बाद के दिनों में अध्यक्ष बने चांदना ने सांसद डांगी के नक्शेकदम पर चलते हुए सैकड़ों कार्यकर्ताओं को नेता के रूप में ढाला। आज वे ही नेता जिलों में कांग्रेस का मजबूत सहारा बने हुए हैं। चांदना की यह सक्रियता उन्हें अन्य युवा नेताओं से अलग करती है। यही छवि उन्हें प्रदेश अध्यक्ष के रूप में एक मजबूत दावेदार बनाती है, खासकर जब पार्टी को युवा चेहरा चाहिए।

इस सबके बीच अब क्या करेंगे गोविंद डोटासरा
उधर, गोविंद सिंह डोटासरा सन 2020 में पायलट के विद्रोह के संकटकाल में तत्कालीन मुख्यमंत्री गहलोत की सिफारिश पर प्रदेश अध्यक्ष बने थे। राज्यमंत्री पद से प्रदेश अध्यक्ष बने डोटासरा पर अब साढ़े पांच साल बाद विदाई की घंटियां बज रही हैं। डोटासरा ने संकट के समय पार्टी को एकजुट रखा, लेकिन अब वे खुद अपनी ताकत दिखाने की कोशिश में लगे हैं। हाल ही में नए जिलाध्यक्षों की सूची में यह साफ झलक रहा है कि वे अपना अलग गुट बना रहे हैं। उदाहरण स्वरूप, कई जिलों में उनके करीबी कमजोर नेताओं को भी ज्यादा तरजीह मिली, जिससे गहलोत और पायलट खेमों के लोग कम जिलाध्यक्ष बन सके। अब डोटासरा, पायलट के विरोध में तो हैं ही, गहलोत के खिलाफ भी माहौल बनाकर खुद को बड़ा नेता साबित करने की फिराक में है। राजनीतिक विश्लेषक निरंजन परिहार मानते हैं कि पायलट ने पहले ही कांग्रेस में गुटबाजी की खाई गहरी कर दी है, जिससे कांग्रेस को 2023 चुनावों में भारी नुकसान हुआ। और अब, डोटासरा अगर अपना अलग गुट बनाते हैं, तो यह कांग्रेस के लिए और मुश्किल होगा। वरिष्ठ पत्रकार संदीप सोनवलकर कहते हैं कि ऐसे हालात में चांदना जैसे नेता का उभरना डोटासरा के लिए एक नई चुनौती है, क्योंकि चांदना संगठनात्मक रूप से काफी क्षमतावान हैं।

गहलोत ही ‘चाणक्य’, उनकी इच्छा निर्णायक
राजस्थान कांग्रेस में अशोक गहलोत का प्रभाव आज भी सर्वोपरि है। प्रदेश में उनके रहते किसी अन्य नेता को उनकी बराबरी करना मुश्किल है। तीन बार मुख्यमंत्री रह चुके गहलोत की राय के बिना संगठन के फैसले अधूरे हैं। प्रदेश अध्यक्ष के चयन में गहलोत की इच्छा निर्णायक होगी, यह तय है। राजनीतिक विश्लेषक निरंजन परिहार कहते हैं कि कोई भी दो नेता बिना मतलब तो कभी भी नहीं मिलते। ऐसे में, चांदना के गहलोत से मिलने के मायने ये भी है कि यह भले ही व्यक्तिगत चर्चा थी, लेकिन भविष्य की रणनीति पर मंथन भी था। वरिष्ठ पत्रकार हरिसिंह राजपुरोहित कहते हैं कि गहलोत जानते हैं कि 2028 चुनावों में गुटबाजी से बचना जरूरी है, लेकिन पायलट के कद को संतुलित करने के लिए चांदना जैसे युवा गुर्जर चेहरे की ताकत के उपयोग की भी सख्त जरूरत है। हालांकि पायलट समर्थक इसे साजिश बताते हैं और चेताते हैं कि इससे समाज में फूट पड़ेगी। लेकिन वरिष्ठ पत्रकार त्रिभुवन कहते हैं कि कांग्रेस को ऐसे हालातों से निपटने के लिए सबसे पहले अपने घर के भीतर बहुत कुछ ठीक करना होगा।
चांदना ही कांग्रेस में डोटासरा का मजबूत विकल्प
भले ही अशोक चांदना और अशोक गहलोत की यह मुलाकात सार्थ ना भी हो, तो भी राजस्थान कांग्रेस के लिए विषय एक टर्निंग पॉइंट साबित हो सकता है। चांदना की मेहनत, समर्पण और युवा ऊर्जा उन्हें वर्तमान प्रदेश अध्यक्ष डोटासरा का मजबूत विकल्प बनाती है, लेकिन पायलट का विरोध और जातिगत समीकरण इसे जटिल बनाते हैं। अगर चांदना आगे बढ़ते हैं, तो कांग्रेस का यह कदम यह पायलट की गुटबाजी को नया संतुलन देगा, और पार्टी में नए समीकरणों के संदेश भी। बहरहाल, डोटासरा की विदाई के बाद जो भी चेहरा उभरे, वह 2028 के विधानसभा चुनाव की सफलता की कुंजी होगा। फिलहाल, अशोक चांदना की अशोक गहलोत से यह मुलाकात राजनीतिक अटकलों का केंद्र बनी हुई है, और राजस्थान की जनता इंतजार कर रही है कि कांग्रेस का अगला अध्याय कैसा होगा।
-राकेश दुबे (वरिष्ठ पत्रकार)
इसे भी पढ़िएः Rajasthan Congress: बहुत कुछ ठीक करना होगा कांग्रेस को अपने घर में
ये भे देखेंः Rajasthan Congress: नए जिलाध्यक्षों पर सवाल, बवाल और कांग्रेस का हाल

