UP Assembly Election: उत्तर प्रदेश की सियासत में चुनावी शतरंज की बिसात बिछ चुकी है। बीजेपी (BJP) के वास्तविक चुनावी रणनीतिकार अमित शाह (Amit Shah) के निशाने पर अब यूपी विधानसभा चुनाव (UP Assembly Election) है। लक्ष्य स्पष्ट है—उत्तर प्रदेश में फिर सरकार बनानी है और हर हाल में बनानी है। लेकिन इस बार चुनौती केवल सत्ता बचाने की नहीं, बल्कि उस राजनीतिक जमीन को दोबारा हासिल करने की है, जो 2024 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी के हाथों से खिसकती दिखाई दी थी। उत्तर प्रदेश (Uttar Pradesh) में लगातार तीसरी बार सरकार बनाने का सपना बीजेपी के लिए आसान नहीं है। पार्टी के सामने जातिगत समीकरणों को साधने, क्षेत्रीय नेतृत्व के बीच संतुलन बनाने, संगठन को सक्रिय करने और जनता के बीच बढ़ती नाराजगी दूर करने की चुनौती है। अमित शाह की रणनीति का सबसे अहम हिस्सा इन्हीं कमजोर कड़ियों की पहचान और उनकी मरम्मत है। 30 अक्टूबर को लखनऊ में बीजेपी की राज्य कार्यसमिति की बैठक में अमित शाह ने 2027 के चुनाव की तैयारियों का रोडमैप सामने रखा। पार्टी ने 325 से 350 सीटें जीतने का लक्ष्य रखा है। यह लक्ष्य बताता है कि बीजेपी केवल सरकार बचाने की नहीं, बल्कि फिर से बड़े बहुमत के साथ सत्ता में लौटने की तैयारी कर रही है।
अयोध्या की हार और वाराणसी से उठे सवाल
बीजेपी के लिए उत्तर प्रदेश की चुनावी रणनीति को नए सिरे से तैयार करने की सबसे बड़ी वजह 2024 के लोकसभा चुनाव के नतीजे हैं। जिस राज्य ने 2014 और 2019 में पार्टी को केंद्र की सत्ता तक पहुंचाने में निर्णायक भूमिका निभाई, उसी उत्तर प्रदेश में बीजेपी का राजनीतिक आधार कमजोर पड़ता दिखाई दिया। 2019 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी ने उत्तर प्रदेश की 62 सीटें जीती थीं। लेकिन 2024 में यह संख्या घटकर 33 रह गई। समाजवादी पार्टी ने 37 सीटें जीतकर प्रदेश में सबसे बड़ी पार्टी बनने का गौरव हासिल किया, जबकि कांग्रेस को भी छह सीटें मिल गई, जहां उसके केवल 2 विधायक हैं। सबसे बड़ा राजनीतिक झटका वाराणसी लोकसभा सीट से लगा। ,हां प्रधानमंत्री मोदी कांग्रेस उम्मीदवार से केवल 1,52,513 वोट से ही जीत सके। जबकि 2014 में मोदी 3,71,784 वोट से और 2019 में 4,79,505 वोट से जीते थे। अयोध्या में राम मंदिर निर्माण के बाद बीजेपी को जिस राजनीतिक लाभ की उम्मीद थी, वहां समाजवादी पार्टी के अवधेश प्रसाद ने बीजेपी के लल्लू सिंह को हराकर जीत हासिल की। राम मंदिर की प्रतिष्ठा और हिंदू आस्था के केंद्र अयोध्या में मिली हार ने बीजेपी के सामने एक असहज सवाल खड़ा कर दिया कि क्या धार्मिक मुद्दे और राष्ट्रीय नेतृत्व की लोकप्रियता स्थानीय नाराजगी को पूरी तरह ढक सकते हैं? 2027 में अमित शाह के सामने इसी संदेश को समझकर रणनीति तैयार करने की चुनौती है।

बीजेपी के सामने सबसे बड़ी राजनीतिक चुनौती
उत्तर प्रदेश की राजनीति में जातिगत समीकरण चुनावी जीत का महत्वपूर्ण आधार रहे हैं। बीजेपी ने पिछले चुनावों में सवर्णों, गैर-यादव पिछड़े वर्गों और गैर-जाटव दलितों के व्यापक सामाजिक गठबंधन के सहारे मजबूत राजनीतिक जमीन तैयार की थी। लेकिन 2024 के लोकसभा चुनाव में इस गठबंधन में दरारें दिखाई दीं। समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक यानी पीडीए की रणनीति के माध्यम से सामाजिक प्रतिनिधित्व को चुनावी मुद्दा बनाया। इसका असर गैर-यादव पिछड़े वर्गों और कुछ दलित समुदायों के बीच भी दिखाई दिया। अब अमित शाह के सामने दोहरी चुनौती है। पहली, बीजेपी के पारंपरिक समर्थकों को एकजुट रखना। दूसरी, उन सामाजिक समूहों में पार्टी की स्वीकार्यता बढ़ाना, जहां 2024 में समर्थन कमजोर पड़ा। बीजेपी की नई प्रदेश संगठनात्मक टीम में पिछड़े वर्गों, दलितों और सवर्णों के प्रतिनिधित्व के बीच संतुलन बनाने की कोशिश दिखाई देती है। क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व और संगठन में सामाजिक भागीदारी बढ़ाने पर भी जोर दिया गया है। यह केवल संगठनात्मक नियुक्तियों का मामला नहीं है। इसके पीछे 2027 के चुनाव के लिए सामाजिक गठबंधन को फिर से मजबूत करने की रणनीति है।
कमजोर बूथों पर नजर, संगठन का माइक्रोमैनेजमेंट
अमित शाह की चुनावी रणनीति का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा बूथ प्रबंधन माना जाता है। उत्तर प्रदेश में बीजेपी अब उन विधानसभा क्षेत्रों और बूथों पर विशेष ध्यान देने की तैयारी कर रही है, जहां पार्टी को 2022 के विधानसभा चुनाव और 2024 के लोकसभा चुनाव में अपेक्षित सफलता नहीं मिली। पार्टी की रणनीति के तहत प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी प्रदेश के सभी 18 मंडलीय मुख्यालयों में चुनावी रैलियों के माध्यम से व्यापक जनसंपर्क करेंगे। अमित शाह जिलों और संगठनात्मक इकाइयों पर ध्यान केंद्रित करेंगे, जबकि पार्टी अध्यक्ष नितिन नवीन विधानसभा स्तर पर संगठन और मतदाताओं से संपर्क मजबूत करने की जिम्मेदारी संभालेंगे। यह रणनीति बड़े नेताओं की रैलियों के साथ-साथ स्थानीय स्तर पर संगठन की सक्रियता बढ़ाने पर आधारित है। बीजेपी की तैयारी केवल मंच और भाषण तक सीमित नहीं है। पार्टी कमजोर बूथों की पहचान, कार्यकर्ताओं की जिम्मेदारी तय करने और मतदाताओं से सीधे संपर्क बढ़ाने पर जोर दे रही है। प्रत्येक 50 परिवारों तक संपर्क स्थापित करने, लाभार्थियों की सूची तैयार करने और स्थानीय जातिगत समीकरणों की जानकारी जुटाने की योजना भी सामने आई है। अमित शाह की रणनीति का उद्देश्य स्पष्ट है कि चुनाव के समय केवल बड़े नेताओं की लोकप्रियता पर निर्भर रहने के बजाय हर बूथ पर पार्टी की मौजूदगी मजबूत करना।

योगी और स्थानीय नेतृत्व: संतुलन की परीक्षा
उत्तर प्रदेश में बीजेपी की चुनावी रणनीति का एक महत्वपूर्ण पहलू मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और संगठन के बीच तालमेल है। माना जा रहा है कि वाराणसी में पिछले लोकसभा चुनाव में पीएम मोदी का चुनाव केवल डेढ़ लाख वोटों से ही जीत सके थे, इसका कारण संगठनात्मक कमजोरी ही रही। योगी आदित्यनाथ सरकार की उपलब्धियों को चुनावी अभियान में प्रमुखता देना पार्टी की स्वाभाविक रणनीति होगी। लेकिन स्थानीय नेताओं, विधायकों और कार्यकर्ताओं के बीच नाराजगी दूर करना भी उतना ही महत्वपूर्ण है। बीजेपी के सामने एंटी-इंकम्बेंसी यानी सत्ता विरोधी रुझान की चुनौती है। कई क्षेत्रों में विधायकों के प्रति जनता की नाराजगी और संगठनात्मक कार्यकर्ताओं की थकान को लेकर सवाल उठे हैं। ऐसे में अमित शाह की रणनीति में उम्मीदवारों के चयन, संगठनात्मक जवाबदेही और स्थानीय नेतृत्व की सक्रियता महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। पार्टी के सामने यह भी चुनौती है कि क्षेत्रीय परिस्थितियों के अनुसार चुनावी रणनीति तैयार की जाए। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में किसान राजनीति और सामाजिक गठबंधन का महत्व है, जबकि पूर्वांचल में जातिगत प्रतिनिधित्व, स्थानीय नेतृत्व और संगठन की पकड़ निर्णायक हो सकती है।
बीजेपी के लिए सत्ता और प्रतिष्ठा दोनों की लड़ाई
अमित शाह के सामने उत्तर प्रदेश केवल एक राज्य का चुनाव नहीं है। यूपी की राजनीतिक सफलता राष्ट्रीय राजनीति में बीजेपी की स्थिति को भी प्रभावित करती है। 2024 के लोकसभा चुनाव के बाद उत्तर प्रदेश में बीजेपी के कमजोर प्रदर्शन ने पार्टी के सामाजिक गठबंधन और संगठनात्मक मजबूती पर सवाल उठाए। अब 2027 का विधानसभा चुनाव उन सवालों का जवाब देने का अवसर है। पार्टी के लिए चुनौती केवल जातिगत समीकरणों को साधने या बड़े नेताओं की रैलियां आयोजित करने तक सीमित नहीं है। उसे जनता के बीच स्थानीय मुद्दों, रोजगार, विकास, सामाजिक प्रतिनिधित्व और सरकार के प्रति विश्वास को भी मजबूत करना होगा। अमित शाह की रणनीति में बूथ प्रबंधन, संगठनात्मक अनुशासन, सामाजिक संतुलन और क्षेत्रीय संपर्क का महत्व स्पष्ट दिखाई देता है। लेकिन चुनावी रणनीति का वास्तविक परिणाम इस बात पर निर्भर करेगा कि बीजेपी अपनी कमजोरियों को कितनी प्रभावी ढंग से दूर कर पाती है। राम मंदिर की प्रतिष्ठा के बावजूद अयोध्या में मिली हार ने यह संदेश दिया कि चुनावी राजनीति में प्रतीकात्मक मुद्दों के साथ स्थानीय अपेक्षाओं का महत्व भी कम नहीं होता। 2027 में बीजेपी के सामने सबसे बड़ी परीक्षा यही होगी कि क्या अमित शाह संगठन की कमजोर कड़ियों को दुरुस्त कर, जातिगत समीकरणों को साधकर और स्थानीय नाराजगी दूर करके उत्तर प्रदेश में सत्ता की वापसी सुनिश्चित कर पाएंगे? लउत्तर प्रदेश की चुनावी बिसात पर बीजेपी ने अपनी चालें चलनी शुरू कर दी हैं। लेकिन अंतिम फैसला मतदाताओं के हाथ में होगा। यूपी चुनाव 2027 में अमित शाह का मिशन केवल जीत का लक्ष्य नहीं, बल्कि 2024 के राजनीतिक झटके से उबरकर बीजेपी के सामाजिक और संगठनात्मक आधार को फिर से मजबूत करने की परीक्षा है।
– निरंजन परिहार (लेखक राजनीतिक विश्लेषक है)

