Jagan Gurjar: राजस्थान अपनी समृद्ध संस्कृति, ऐतिहासिक विरासत और सामाजिक विविधता के लिए जाना जाता है। लेकिन इसी समाज की एक ऐसी सच्चाई भी है, जिस पर गंभीर चर्चा की आवश्यकता है – जातिवाद (Casteism) और अपराधियों (Criminals) का महिमामंडन। पिछले कुछ वर्षों में राजस्थान (Rajasthan) में कई ऐसी घटनाएं सामने आई हैं, जहां कुख्यात अपराधियों को उनकी जातीय पहचान के आधार पर नायक (Hero) बनाने की कोशिश की गई। हाल ही में जेल के भीतर कुख्यात अपराधी जगन गुर्जर (Jagan Gurjar) की हत्या उसके साथी कैदी विष्णु जाट द्वारा किए जाने के बाद सोशल मीडिया पर जिस तरह की प्रतिक्रियाएं देखने को मिलीं, उन्होंने एक बार फिर इस मानसिकता को उजागर किया। एक ओर कुछ लोग जगन गुर्जर को “महान” साबित करने में जुट गए, तो दूसरी ओर कुछ लोग विष्णु जाट को “बहादुर” बताने लगे। चर्चा अपराध (Crime) या कानून की नहीं, बल्कि जातीय (Caste) समर्थन की होने लगी। यह कोई पहली घटना नहीं है। इससे पहले कुख्यात अपराधी आनंदपाल सिंह (Anandpal Singh) के एनकाउंटर के समय भी समाज का एक वर्ग उसे नायक की तरह प्रस्तुत कर रहा था, जबकि दूसरी ओर उसके विरोध में भी जातीय आधार पर लामबंदी देखने को मिली। समय बदलता है, चेहरे बदलते हैं, लेकिन अपराधी (Criminal) को जातीय चश्मे से देखने की प्रवृत्ति बनी रहती है।
जब अपराधी की पहचान उसके अपराध से बड़ी हो जाती है
किसी भी लोकतांत्रिक समाज में किसी व्यक्ति की पहचान उसके कर्मों से होनी चाहिए, न कि उसकी जाति से। लेकिन राजस्थान में कई बार स्थिति इसके उलट दिखाई देती है। यदि कोई अपराधी किसी प्रभावशाली जाति से जुड़ा हो, तो उसके समर्थकों का एक वर्ग उसके अपराधों को नजरअंदाज कर उसे समाज का गौरव बताने लगता है। सोशल मीडिया पर ऐसे अपराधियों की तस्वीरों के साथ वीडियो, पोस्टर, गाने और भावनात्मक संदेश साझा किए जाते हैं। उन्हें “शेर”, “रॉबिन हुड”, “समाज का बेटा” या “सम्मान का प्रतीक” जैसी उपाधियां दी जाती हैं। इस प्रक्रिया में हत्या, डकैती, रंगदारी, अपहरण और अन्य गंभीर अपराध पीछे छूट जाते हैं। सबसे चिंताजनक बात यह है कि इस प्रकार का महिमामंडन युवाओं के बीच गलत संदेश देता है। जब अपराधी को सम्मान मिलने लगता है, तो कानून के प्रति विश्वास कमजोर होता है और हिंसा को वैधता मिलने लगती है। उधर जेल में हत्या किए जाने पर तंज कसते हुए राजस्थान के वरिष्ठ पत्रकार त्रिभुवन ने ‘एक्स’ पर लिखा – ‘जेल ऐसी सुरक्षित जगह है, जहाँ डाकू भी मारा जा सकता है!’

राजस्थान की राजनीति में जातीय समीकरण क्यों हैं मजबूत?
राजस्थान की राजनीति लंबे समय से जातीय समीकरणों पर आधारित रही है। चुनावों में टिकट वितरण, चुनावी रणनीति, मंत्री पदों का संतुलन और मतदान का गणित—इन सभी में जातीय समीकरण महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। राजनीतिक विश्लेषक निरंजन पिरहार कहते हैं कि जब राजनीतिक दल लगातार जातीय पहचान को चुनावी हथियार बनाते हैं, तो समाज भी हर बड़े मुद्दे को उसी नजरिए से देखने लगता है। परिणामस्वरूप किसी अपराधी के समर्थन या विरोध का आधार उसके अपराध नहीं, बल्कि उसकी जातीय पहचान बन जाती है। परिहार कहते हैं कि इसी का परिणाम यह हुआ कि समाज में जातीय पहचान केवल सामाजिक परिचय नहीं रही, बल्कि राजनीतिक शक्ति और सामूहिक अस्मिता का माध्यम बन गई। यही कारण है कि किसी एक घटना पर अलग – अलग जातीय समूह बिल्कुल विपरीत प्रतिक्रियाएं देते हैं। एक पक्ष जिस व्यक्ति को अपराधी मानता है, दूसरा उसे जातीय गौरव का प्रतीक बनाने की कोशिश करता है।
सोशल मीडिया के भावनात्मक संदेशों ने बढ़ाई समस्या
डिजिटल दौर में सोशल मीडिया ने इस प्रवृत्ति को और अधिक तेज कर दिया है। अब किसी भी घटना के कुछ घंटों के भीतर फेसबुक, इंस्टाग्राम, यूट्यूब और अन्य प्लेटफॉर्म पर जातीय समर्थन और विरोध के अभियान शुरू हो जाते हैं। भावनात्मक पोस्ट, एडिट किए गए वीडियो और भड़काऊ संदेश समाज में ध्रुवीकरण बढ़ाते हैं। तथ्य, न्यायिक प्रक्रिया और पीड़ितों की पीड़ा इन अभियानों में अक्सर पीछे छूट जाती है। इससे समाज में तनाव बढ़ता है और कानून व्यवस्था के प्रति लोगों का भरोसा कमजोर पड़ता है। वीडियो, पोस्टर, गीत और भावनात्मक संदेशों के माध्यम से अपराधियों की ऐसी छवि गढ़ी जाती है, मानो वे समाज सुधारक या वीर योद्धा रहे हों। तथ्य, न्यायिक प्रक्रिया और पीड़ितों की पीड़ा इन अभियानों में लगभग गायब हो जाती है। एल्गोरिद्म आधारित डिजिटल दुनिया ऐसी सामग्री को तेजी से फैलाती है, जिससे समाज में ध्रुवीकरण और बढ़ता है।

अपराध का समर्थन नहीं, कानून का सम्मान होना चाहिए
यह समझना आवश्यक है कि किसी भी जाति के अधिकांश लोग कानून का सम्मान करते हैं और अपराध का समर्थन नहीं करते। लेकिन सोशल मीडिया पर सक्रिय कुछ समूह पूरे समाज की छवि को प्रभावित कर देते हैं। किसी भी अपराधी को केवल इसलिए नायक नहीं बनाया जा सकता क्योंकि वह किसी विशेष जाति से संबंधित है। उसी प्रकार किसी अपराधी के खिलाफ कानूनी कार्रवाई को किसी जाति का अपमान बताना भी लोकतांत्रिक मूल्यों के विरुद्ध है। यदि समाज वास्तव में आगे बढ़ना चाहता है, तो व्यक्ति का मूल्यांकन उसकी जाति नहीं, बल्कि उसके कार्यों के आधार पर होना चाहिए। हत्या, डकैती, रंगदारी या अन्य गंभीर अपराध किसी भी परिस्थिति में सम्मान का विषय नहीं बन सकते। इससे संबंधित जातियों की छवि भी अनावश्यक रूप से प्रभावित होती है और सामाजिक अविश्वास बढ़ता है। राजस्थान के वरिष्ठ पत्रकार अरविंद चोटिया का कहना है कि जेल तो हाई सिक्योरिटी वाली ही थी। लेकिन साथी कैदी से भी कोई सिक्योरिटी की जरूरत पड़ती है क्या? उन्होंने सोशल मीडिया पर लिखा कि मामला बेहद गंभीर और चौंकाने वाला है। जेल प्रशासन के सामने इस तरह तो चुनौतियां बढ़ती ही जाएंगी।
अपराधी की पहचान अपराध होता हैं, उसकी जाति नहीं
राजस्थान जैसे सामाजिक रूप से संवेदनशील राज्य में आवश्यकता इस बात की है कि अपराध और जाति को अलगअलग रखा जाए। कानून का शासन तभी मजबूत होगा, जब अपराधी की पहचान उसकी जाति नहीं, बल्कि उसके अपराध होंगे। समाज को यह स्वीकार करना होगा कि अपराधी किसी जाति का प्रतिनिधि नहीं होता और किसी जाति का सम्मान किसी अपराधी के समर्थन से नहीं बढ़ता। वास्तविक सामाजिक गौरव कानून के सम्मान, न्याय और सामाजिक सद्भाव में है, न कि अपराधियों के महिमामंडन में। जातीय भावनाओं से ऊपर उठकर यदि समाज अपराध को केवल अपराध के रूप में देखना सीख जाए, तो यही राजस्थान के बेहतर भविष्य की सबसे बड़ी शुरुआत होगी। लेकिन जब तक समाज जातीय पहचान से ऊपर उठकर अपराध को केवल अपराध के रूप में देखना नहीं सीखेगा, तब तक ऐसी घटनाएं केवल कानून-व्यवस्था की चुनौती नहीं, बल्कि सामाजिक चेतना की परीक्षा बनी रहेंगी।
– आकांक्षा कुमारी
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