Dhaai Chal: सियासत अब सिर्फ सत्ता के गलियारों में नहीं, घरों के भीतर, रिश्तों के बीच और जिंदगी के रोजमर्रा के व्यवहार में भी अपनी बिसात बिछा चुकी है। सच की जगह जब सियासत (Politics) संवरने लगे और हर घटना के पीछे किसी न किसी राजनीतिक मंशा की तलाश होने लगे, तब जिंदगी के किस्से और उनके हिस्से तक राजनीति के रंग में रंग जाते हैं। ऐसे वक्त में नवीन चौधरी का उपन्यास ‘ढाई चाल’ (Dhai Chaal) सिर्फ एक कहानी नहीं, हमारे आसपास घट रही जिंदगी का ऐसा आईना है, जिसमें सत्ता, समाज, महत्वाकांक्षा और रिश्तों की उलझी हुई तस्वीर दिखाई देती है। हर तरफ जब सियासत का सामान सजता नजर आए, जब किसी घटना की सच्चाई से ज्यादा उसकी राजनीतिक व्याख्या महत्वपूर्ण हो जाए, जब अच्छे-बुरे का फैसला भी सत्ता और सुविधा के तराजू पर तुलने लगे, तब किसी कहानी में जिंदगी के हिस्सों को पिरोना आसान नहीं रह जाता। लेकिन मुश्किल काम करना नवीन चौधरी (Naveen Choudhary) की लेखकीय फितरत में शामिल है। इसीलिए ‘ढाई चाल’ अब जियोहॉटस्टार (JioHotstar) पर छा रही हैं।
पहले आया उपन्यास, और अब वेब सीरीज
करीब पांच साल पहले ‘ढाई चाल’ उपन्यास के रूप में सामने आया, तो यह साफ था कि लेखक सिर्फ एक राजनीतिक किस्सा नहीं सुना रहे। वह उन चेहरों, उन रिश्तों और उन घटनाओं की कहानी कह रहे हैं, जिनसे हमारा समाज रोज रूबरू होता है। शतरंज की बिसात पर चलने वाली ढाई चाल को वास्तविक जिंदगी के साढ़े तीन रंगों में समझने की कोशिश दरअसल उस राजनीति की पड़ताल है, जहां जीतने के लिए नियमों से ज्यादा नियमों के बीच की जगह महत्वपूर्ण हो जाती है। किताब के पन्नों पर अक्षरों के आकार से आजाद होकर नवीन चौधरी की यह कहानी अब दृश्यों में पहुंच रही है। नवीन चौधरी की वेब सीरीज ‘ढाई चाल’ 27 नवंबर से जियोहॉटस्टार पर स्ट्रीम होगी। रितेश शाह इसके क्रिएटर हैं। सतीश कुमकुम नाथ नायर और नव निर्माण सिंह ने इसका निर्देशन किया है। गगन अरोड़ा, आदिल खान, अंकित सिवाच, राजेश कुमार, पारितोष सैंड, अंजलि तारतारी और ऋषिका लोर्के प्रमुख भूमिकाओं में नजर आएंगे।

राजनीति अब जिंदगी का सबसे बड़ा थ्रिलर
सत्ता की हिस्सेदारी के लिए समाज के भीतर वर्चस्व की लड़ाई कोई नई बात नहीं। सदियों से सत्ता पाने की चाह ने रिश्तों को बदला है, दोस्तियों को दुश्मनी में बदला है और विश्वास को संदेह के कटघरे में खड़ा किया है। लेकिन बदलते समय में राजनीति का सबसे दिलचस्प पहलू यह है कि अब वह सिर्फ चुनाव जीतने का खेल नहीं रही। वह जिंदगी का सबसे बड़ा मनोरंजन भी है और सबसे बड़ा थ्रिलर भी। ‘ढाई चाल’ इसी राजनीति की कहानी है। यहां छल है, कपट है, प्रपंच है, महत्वाकांक्षा है और निजी रिश्तों के भीतर धीरे-धीरे आकार लेते सियासी समीकरण हैं। कहानी चौंकाती है, लेकिन इसलिए नहीं कि इसमें कुछ असंभव घटता है। बल्कि इसलिए कि जो घटता है, वह हमारे आसपास पहले से मौजूद है। राजनीति की बिसात पर कोई भी रिश्ता पूरी तरह निजी नहीं रह जाता। दोस्ती के भीतर भविष्य की संभावना छिपी होती है। दुश्मनी के भीतर किसी कारोबारी हित की परछाईं दिखाई देती है। और किसी के साथ खड़े होने का फैसला भी कई बार इंसान की अपनी इच्छा से ज्यादा उसके राजनीतिक लाभ-हानि से तय होने लगता है।
जनता स्टोर से सत्ता के गलियारों तक
‘ढाई चाल’ की कहानी का एक महत्वपूर्ण सिरा छात्र राजनीति से जुड़ता है। जनता स्टोर की दुनिया से निकलकर कहानी राज्य स्तर की राजनीति तक पहुंचती है। कॉलेज की राजनीति में दिखाई देने वाला जोश, नेतृत्व की महत्वाकांक्षा और अपनी पहचान बनाने की बेचैनी धीरे-धीरे बड़े सत्ता संघर्ष का हिस्सा बनने लगती है। छात्र राजनीति किसी भी लोकतंत्र की पहली प्रयोगशाला होती है। यहां युवा पहली बार नेतृत्व, संगठन, विचारधारा और सत्ता के व्यवहार को करीब से समझते हैं। लेकिन यही वह जगह भी है, जहां आदर्श और महत्वाकांक्षा के बीच की दूरी दिखाई देने लगती है। एक युवा राजनीति में कुछ हासिल करना चाहता है। उसके सामने भविष्य की संभावनाएं हैं। लेकिन अतीत के कुछ किस्से, पुराने रिश्ते और पहले किए गए फैसले उसके पीछे साये की तरह चलते रहते हैं। राजनीति में चुनाव जीत लेना ही पर्याप्त नहीं होता। जीत के बाद भी हिसाब बाकी रहता है। कारोबारी अदावतें, पुराने विवाद और बदलते समीकरण हर समय नई चाल चलते रहते हैं।

जब अपराध भी सियासी समीकरण बन जाए
इस कहानी का सबसे बेचैन करने वाला पक्ष वह है, जहां अपराध और राजनीति के बीच की दूरी खत्म होती दिखाई देती है। बलात्कार जैसी गंभीर घटना के बाद न्याय की अपेक्षा होती है। पीड़ित को समाज का साथ चाहिए, व्यवस्था से संवेदनशीलता चाहिए और कानून से निष्पक्ष कार्रवाई की उम्मीद होती है। लेकिन जब ऐसी घटना को भी राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप, धार्मिक पहचान और चुनावी लाभ के लिए इस्तेमाल किया जाने लगे, तब न्याय का सवाल पीछे छूटने लगता है। ‘ढाई चाल’ में बलात्कार से जुड़ी रहस्यात्मक कथा, लव जिहाद के आरोपों और राजनीतिक दांवपेचों का संदर्भ इसी व्यापक सामाजिक बेचैनी को सामने लाता है। यहां सवाल सिर्फ अपराध का नहीं, अपराध के बाद समाज के व्यवहार का भी है। कौन किसके साथ खड़ा होगा? किसकी बात सुनी जाएगी? किसकी पहचान को उसके अपराध या पीड़ा से पहले रख दिया जाएगा? जाति, धर्म, मीडिया और राजनीति का गठजोड़ कहानी को उस दुनिया तक ले जाता है, जहां किसी घटना की सच्चाई से ज्यादा उसकी राजनीतिक उपयोगिता महत्वपूर्ण हो जाती है।
रिश्तों की बिसात पर चलती ढाई चाल
नवीन चौधरी की कहानी का आकर्षण यही है कि राजनीति को केवल नेताओं और चुनावों तक सीमित नहीं रखा गया। राजनीति घर के भीतर भी है, कारोबारी संबंधों में भी और उन निजी फैसलों में भी, जिन्हें हम अक्सर व्यक्तिगत समझकर नजरअंदाज कर देते हैं। कहानी का उभरता राजनीतिक किरदार बहुत कुछ हासिल करना चाहता है। लेकिन महत्वाकांक्षा के रास्ते में पुराने किस्से, निजी संबंध और बदलती परिस्थितियां उसकी राह कठिन बनाते हैं। दो अलग-अलग धर्मों के लोगों के बीच कारोबारी अदावत हो, तो समाज उसे केवल कारोबार की नजर से नहीं देखता। धर्म बीच में आ जाता है। पहचान सामने आ जाती है। और फिर राजनीति उस विवाद को अपने हिसाब से इस्तेमाल करने लगती है। यही वह बिंदु है, जहां ‘ढाई चाल’ अपने शीर्षक का अर्थ खोलती है। शतरंज में चाल सामने दिखाई देती है, लेकिन जिंदगी में कई चालें ऐसी होती हैं, जिनका पता तब चलता है, जब नुकसान हो चुका होता है। कोई दोस्त कब प्रतिद्वंद्वी बन गया, कोई संबंध कब राजनीतिक जरूरत में बदल गया और कोई घटना कब सत्ता की रणनीति का हिस्सा बन गई, इसका हिसाब अक्सर बहुत देर से मिलता है।
अक्षरों से आजाद होकर, दृश्यावली का सफर
वेब सीरीज का टीजर भी छात्र राजनीति, महत्वाकांक्षा, बदलते रिश्तों और सत्ता संघर्ष की दुनिया की झलक देता है। सवाल वही है—राजनीति को पढ़ना अलग बात है, उसका हिस्सा बनना अलग। लेकिन ‘ढाई चाल’ की असली दिलचस्पी इस सवाल के जवाब में नहीं, उसके बाद शुरू होने वाली जिंदगी में है। जब युवा राजनीति में उतरता है, तो क्या वह अपने आदर्श बचा पाता है? जब सत्ता सामने होती है, तो क्या रिश्ते पहले जैसे रह जाते हैं? और जब किसी घटना पर समाज दो हिस्सों में बंट जाता है, तो सच किसके साथ खड़ा होता है? इन सवालों के जवाब कहानी को किताब के आखिरी पन्ने तक पाठक के साथ बनाए रखते हैं। अब यही बेचैनी पर्दे पर भी दिखाई देने वाली है। ‘ढाई चाल’ दरअसल हमारे समय की कहानी है। जिंदगी की बिसात पर राजनीति जब सबसे बड़ी खिलाड़ी बन चुकी है, तो हर रिश्ता एक संभावना, हर विवाद एक नया समीकरण और हर फैसला अगली चाल की तैयारी है। नवीन चौधरी के उपन्यास ढाई चाल पर बनी वेब सीरीज में दिखने वाली सत्ता की शतरंज में जीत किसकी होगी, यह देखना दिलचस्प होगा। लेकिन उससे भी बड़ा सवाल यह है कि खेल खत्म होने के बाद इंसान अपने भीतर कितना बचा रह जाएगा।
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निरंजन परिहार (राजनीतिक विश्लेषक)

