Shivsena: बाल ठाकरे ने जीते जी ऐसा कभी नहीं सोचा होगा कि उनके वारिस ही उनकी विरासत की दुर्गति कर देंगे। शिवसेना (Shivsena) में पहले दो फाड़ हुई, फिर वह सरकार से धकियाई गई और अब मुंबई (Mumbai) महानगर पालिका से भी आउट हो गई है। जिस महाराष्ट्र में शिवसेना दी कभी धाक थी, उसी प्रदेश की कई महानगर पालिकाओं में तो उसको एक सीट भी नहीं मिली। राजनीतिक रूप से लगभग खत्म होने की कगार पर खड़े होने के मौके पर राज ठाकरे (Raj Thackeray) और उद्धव ठाकरे (Udhav Thackeray) का साथ आना मराठी माणुस को भले ही सुहाया हो, मगर अब केवल मराठी माणुस से सहारे मुंबई में चुनाव जीतने का खेल भी आसान नहीं रहा। मुंबई और महाराष्ट्र में शिवसेना का राजनीतिक परिदृश्य पतला पड़ चुका है। हिंदु हृदय सम्राट के नाम से मशहूर बाल ठाकरे (Bal Thackeray) के बेटे उद्धव को पहले तो हिंदुत्व का साथ छोड़ने से प्रदेश की सत्ता से हाथ धोना पड़ा और अब महानगरपालिकाओं से भी रुखसत होने का दिन देखना पड़ा। उद्धव ठाकरे राजनीतिक रूप से इतने कमजोर हो चुके हैं कि राज ठाकरे का साथ आना भी, उन्हें नहीं उबार सका। महाराष्ट्र (Maharashtra) में माना यही जा रही है कि ठाकरे की राजनीतिक विरासत दिन ब दिन कमजोर हो चुकी है।बीजेपी (BJP) के नेतृत्व में प्रदेश की राजनीति में कई नए बदलाव आ चुके हैं और शिवसेना सहित उद्धव और राज ठाकरे उसे समझने में नाकाम रहे हैं। शिवसेना के लिए यह आत्म चिंतन का वक्त है।
उद्धव से शिवसेना का हिंदुत्व समर्थक भ्रमित
बाल ठाकरे ने तो क्या उसके किसी भी नेता ने कभी नहीं सोचा था कि शिवसेना को “मराठी अस्मिता” और “हिंदुत्व” के दो मजबूत खंभों पर खड़ा किया था, वही पार्टी वर्तमान में, अपनी ही अंदरूनी खींचतान, बदलती राजनीति और नेतृत्व की दुविधाओं के कारण इतनी कमजोर पड़ जाएगी कि उसकी पहचान ही धुंधली होने लगे। राजनीतिक विश्लेषक निरंजन परिहार कहते हैं कि आज शिवसेना का राजनीतिक परिदृश्य महाराष्ट्र में जिस तरह पतला पड़ता जा रहा है, वह न केवल ठाकरे परिवार की विरासत पर प्रश्नचिन्ह है, बल्कि मराठी राजनीति के बदलते चरित्र का भी संकेत है। परिहार कहते हैं कि शिवसेना की गिरावट की कहानी का पहला बड़ा अध्याय तब शुरू हुआ, जब पार्टी दो फाड़ हुई। एक धड़ा एकनाथ शिंदे के नेतृत्व में अलग हुआ और दूसरा उद्धव ठाकरे के साथ रह गया। वरिष्ठ पत्रकार संदीप सोनवलकर का कहना है कि शिवसेना में यह विभाजन केवल संगठनात्मक नहीं था, यह शिवसेना की आत्मा का विभाजन था—जहां एक ओर सत्ता की व्यावहारिक राजनीति थी, वहीं दूसरी ओर भावनात्मक विरासत का दावा। सोनवलकर कहते हैं कि लेकिन राजनीति में केवल विरासत का सहारा लंबे समय तक नहीं टिकता, यह बात उद्धव ठाकरे को सबसे ज्यादा नुकसान के रूप में झेलनी पड़ी। उद्धव ठाकरे की राजनीति की सबसे बड़ी कमजोरी यह रही कि वे बाल ठाकरे के “कठोर राजनीतिक कौशल” और “आक्रामक जन-संपर्क” की जगह, अपेक्षाकृत नरम और समझौतावादी छवि लेकर आगे आए। इसके अलावा, उन्होंने जिस तरह कांग्रेस और एनसीपी के साथ गठबंधन कर सत्ता बनाई, उसने शिवसेना के पारंपरिक हिंदुत्व समर्थक वर्ग को भ्रमित कर दिया। बाल ठाकरे की शिवसेना जिन विचारों के लिए जानी जाती थी, उसी विचारधारा से दूर जाने का संदेश कार्यकर्ताओं और मतदाताओं दोनों में गया। यही वह मोड़ था, जहां शिवसेना की वैचारिक पहचान कमजोर होने लगी।
मुंबई सहित हर जगह से आउट हुई शिवसेना
महाराष्ट्र की राजनीति में भाजपा अब केवल एक सहयोगी शक्ति नहीं, बल्कि एक प्रमुख वर्चस्व बन चुकी है। भाजपा ने न केवल संगठन को मजबूत किया, बल्कि हिंदुत्व की राजनीति पर अपना अधिकार भी स्थापित किया। नवभारत टाइम्स के राजनीतिक पत्रकार राजकुमार सिंह कहते हैं कि कभी शिवसेना जिस जगह हिंदुत्व की अग्रणी पार्टी थी, आज वहीं भाजपा ने उसे पीछे धकेल दिया। उद्धव ठाकरे का कांग्रेस-एनसीपी के साथ जाना भाजपा के लिए एक बड़ा अवसर बन गया। सिंह का कहना है कि भाजपा ने इसे हिंदुत्व के समर्पण के रूप में पेश किया और शिवसेना का बड़ा वोट-बेस अपने पाले में खींचने में सफल रही। आज स्थिति यह है कि शिवसेना न सिर्फ सरकार से बाहर हो गई, बल्कि मुंबई महानगर पालिका जैसे अपने सबसे मजबूत किले से भी बाहर होने की बात सामने आ रही है। मुंबई महानगर पालिका केवल एक नगर निकाय नहीं, बल्कि शिवसेना की राजनीतिक रीढ़ मानी जाती थी। वरिष्ठ पत्रकार हरिसिंह राजपुरोहित कहते हैं कि वर्षों तक मुंबई की सत्ता में रहना पार्टी को आर्थिक, सांगठनिक और सामाजिक ताकत देता रहा। लेकिन जब यही किला हाथ से निकलने लगे, तो यह किसी सामान्य हार से कहीं बड़ा संकेत है। राजपुरोहित मानते हैं कि शिवसेना का यह हाल दर्शाता है कि संगठन की पकड़ टूट रही है और जनता की राजनीतिक प्राथमिकताएं बदल रही हैं। सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि महाराष्ट्र की कई महानगर पालिकाओं में शिवसेना को एक सीट तक न मिलना, पार्टी के कमजोर होते अस्तित्व की पुष्टि करता है। यह परिदृश्य बताता है कि शिवसेना अब केवल मुंबई या कुछ क्षेत्रों तक सीमित सिमट चुकी है, और वहां भी उसका प्रभुत्व पहले जैसा नहीं रहा। पार्टी का कार्यकर्ता वर्ग भी हताश है, क्योंकि वह खुद को ऐसी राजनीति में घिरा पा रहा है जहां स्पष्ट नेतृत्व और भविष्य की दिशा नजर नहीं आती।
बाल ठाकरे की तरह प्रभावी नहीं दिखते उद्धव
राज और उद्धव ठाकरे का साथ आना भावनात्मक रूप से मराठी माणुस को भले ही आकर्षित कर गया हो, पर राजनीति केवल भावनाओं के सहारे नहीं चलती। यह गठबंधन देर से हुआ, और तब हुआ जब शिवसेना पहले ही काफी कमजोर हो चुकी थी। साथ ही, यह भी सच है कि अब मुंबई और महाराष्ट्र में चुनाव जीतने का खेल केवल “मराठी माणुस” के नाम पर आसान नहीं रहा। वरिष्ठ पत्रकार संदीप सोनवलकर मानते हैं कि मुंबई का सामाजिक ढांचा बदला है, मतदाताओं की प्राथमिकता बदली है और राजनीतिक समीकरण भी बदल चुके हैं। आज विकास, रोजगार, शहरी सुविधाएं, सुरक्षा और स्थिर सरकार जैसे मुद्दे ज्यादा असरदार हो गए हैं। सोनवलकर कबते हैं कि उद्धव ठाकरे की एक और चुनौती यह है कि वे राजनीतिक रूप से उतने प्रभावी नहीं दिखते जितना बाल ठाकरे का व्यक्तित्व था। बाल ठाकरे नेता नहीं, एक आंदोलन थे। वे एक आवाज थे जो जनता को झकझोर देती थी। जबकि उद्धव में वह आक्रामक अपील नहीं दिखती, जो शिवसेना के पुराने समर्थकों को जोड़े रख सके। सोनवलकर सकके इस मंतव्य को आगे बढ़ाते हुए निरंजन परिहार इसमें कहते हैं कि यही वजह रही कि राज ठाकरे का साथ आना भी उद्धव को राजनीतिक रूप से उबार नहीं सका।
उद्धव के लिए यह आत्म-चिंतन का वक्त
कुल मिलाकर अब यह मान्यता बनने लगी है कि ठाकरे की राजनीतिक विरासत धीरे-धीरे कमजोर होती जा रही है और एक ऐसी स्थिति की ओर बढ़ रही है जहां वह राजनीतिक रूप से समाप्ति की कगार पर खड़ी दिखती है। राजनीतिक विश्लेषक निरंजन परिहार का मानना है कि महाराष्ट्र की राजनीति में नए बदलाव आ चुके हैं कि भाजपा का वर्चस्व, नए सामाजिक समीकरण, युवा मतदाता, और विकास आधारित राजनीति, इन सबको समझने और अपनाने में उद्धव और राज ठाकरे दोनों ही नाकाम दिखे हैं। परिहार कहते हैं कि शिवसेना के लिए यह आत्म-चिंतन का वक्त है। उसे तय करना होगा कि वह केवल भावनात्मक विरासत की पार्टी बनकर रहना है या बदलते महाराष्ट्र के साथ नई ऊर्जा और नई राजनीति के साथ खड़े होना है। परिहार कहते हैं कि अगर शिवसेना को फिर से उठना है, तो उसे विचारधारा में स्पष्टता, नेतृत्व में दृढ़ता और संगठन में नई जान डालनी होगी। वरना इतिहास में यह पार्टी उस विरासत के रूप में दर्ज होगी, जिसने कभी महाराष्ट्र की राजनीति को हिलाया था, लेकिन समय के साथ खुद ही बिखर गई।
- राकेश दुबे
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