Rajasthan: विधायक निधि प्रकरण अब एक नए मोड़ पर खड़ा है। राजस्थान (Rajasthan) की जनता की नजर में सवाल बहुत सीधा है कि जांच कब तक और फैसला कब? सवाल तीखा है लेकिन मामला भी उतना ही बड़ा है। विधायक निधि (MLA Fund) में घोटाले की खबर से राजनीति में चुने हुए जन प्रतिनिधियों की जिम्मेदारी, पारदर्शिता और ईमानदारी पर एक बार फिर गंभीर खतरे में हैं। बीजेपी के रेवंत राम डांगा (Rewant Ram Danga), कांग्रेस की अनिता जाटव (Anita Jatav) और निर्दलीय विधायक रितु बनावत (Ritu Banawat) जैसे नाम जब इस प्रकरण में एक साथ सामने आते हैं, तब विवाद किसी एक दल की सीमा से बाहर निकलकर पूरे सिस्टम के नैतिक संकट में बदल जाता है। मामला केवल इन तीनों विधायकों (MLA) की वित्तीय अनियमितता का नहीं, बल्कि यह सवाल है नैतिकता की दुहाई देने वाली बीजेपी (BJP) और खुद को सबसे पुरोनी पार्टी कहने वाली कांग्रेस (Congress) सहित सभी विधायकों व सांसदों की लोकतांत्रिक मर्यादा, व्यावहारिक नैतिकता और राजनीतिक दलों की जवाबदेही का। विधायक निधि में घोटाले के इस मामले ने राजनीति के उस चेहरे को फिर उजागर किया है, जिसे लोकतंत्र अक्सर पर्दे में ढक कर रखता है। माना कि विधानसभा की आचार समिति में सुनवाई की प्रक्रिया आगे बढ़ी है और कांग्रेस व बीजेपी में भी हलचल है और जांच एजेंसियों द्वारा विधायक निधि खातों की गतिविधियों पर रोक तथा विजिलेंस जांच जैसी चर्चाएं भी सामने आईं। लेकिन सवाल है कि क्या यह वास्तविक कार्रवाई होगी या केवल औपचारिकता?

डांगा, अनिता और रितु के चेहरों पर शिकन तक नहीं
विधायक निधि का विचार मूलतः विकास की प्रक्रिया का सरलीकरण है कि जनता की जरूरतों के लिए स्थानीय विकास कार्यों को तेज़ी से धन उपलब्ध कराया जाए। लेकिन बीजेपी के रेवंत राम डांगा, कांग्रेस की अनिता जाटव और निर्दलीय विधायक रितु बनावत के इसी तेज प्रक्रिया से तेज धन निकालने के कारनामे के उजागर होने के बावजूद किसी के चेहरे पर शिकन तक नहीं है। क्योंकि न तो कांग्रेस, न ही बीजेपी, और न ही विधानसभा ने इन तीनों विधायकों के खिलाफ कोई खास कार्रवाई करने की पहल दिखाई है। रेवंत राम डांगा, अनिता जाटव और रितु बनावत के चेहरों पर कोई शिकन तक नहीं है। तीनों की तरफ से मामले में सहजता दुखाने के बजाय उल्टे प्रकरण को ही गलत बताने और उलझाने के बेशर्मी भरे बयान सामने आए हैं। लेकिन इस मामले से यह साबित हो गया है कि विधायक निधि विकास का साधन न होकर सौदेबाज़ी का माध्यम बन गई है। भारत के कई राज्यों की तरह राजस्थान में भी विधायक निधि को लेकर कमीशनखोरी, फर्जी कार्यों, अधूरे कामों के भुगतान और टेंडर मैनेजमेंट जैसी बातें उठती रही हैं।
कानून बनानेवाले ही भ्रष्ट, तो न्याय की उम्मीद किससे करें
राजस्थान की राजनीति के गहन जानकार वरिष्ठ पत्रकार त्रिभुवन जैसे पत्रकारों की दृष्टि में यह खबर केवल भ्रष्टाचार का एक और उदाहरण नहीं। वे इसे लोकतांत्रिक संस्थाओं की साख से जोड़ते हैं। उनके मुताबिक यह घोटाला केवल तीन विधायकों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह राजस्थान की राजनीति में भ्रष्टाचार की गहरी जड़ों को दर्शाता है। उन्होंने इस बात पर जोर दिया है कि जब कानून बनाने वाले ही इस तरह की अवैध गतिविधियों में लिप्त हों, तो न्याय की उम्मीद किससे की जाए। उन्होंने एक प्रसिद्ध शेर का हवाला देते हुए कहा – जब मुंसिफ ही कातिल हो, तो न्याय की गुहार किससे करेंगे? त्रिभुवन के अनुसार, इसमें भाजपा, कांग्रेस और निर्दलीय तीनों ही शामिल हैं, जो यह बताता है कि यह किसी एक दल की नहीं बल्कि सत्ता की बीमारी है। विधायक निधि को जनता के विकास के बजाय “निजी एटीएम” की तरह इस्तेमाल किया जा रहा है। राजनीतिक विश्लेषक निरंजन परिहार इसे भ्रष्टाचार की व्यापक राजनीतिक संस्कृति के रूप में देखते हैं। उनका कहना है कि आज की राजनीति में आरोप उतने खतरनाक नहीं होते, जितना आरोपों के बाद भी सिस्टम का जस का तस बने रहना होता है। परिहार के मुताबिक, बीजेपी जैसी पार्टी को तत्काल कार्रवाई करना चाहिए, लेकिन लीपापोती हो रही है। व कहते हैं कि इन मामलों में अक्सर डैमेज कंट्रोल की रणनीति चलती हैं, कमेटियां बनती हैं, जांच बैठती है, तारीखें पड़ती हैं और मामला धीरे-धीरे जनता की यादों से उतरने लगता है। यही पॉलिटिकल मैनेजमेंट कल्चर, राजनीति का सबसे बड़ा रोग है।

कानूनी कार्यवाही, रिकवरी और राजनीतिक दंड जरूरी
राजस्थान के वरिष्ठ पत्रकार अरविंद चोटिया का इस मामले में स्वर अपेक्षाकृत ज्यादा कड़ा है। उनका रुख आम तौर पर प्रत्यक्ष जवाबदेही पर केंद्रित रहता है। चोटिया मानते हैं कि विधायक निधि गरीब-ग्रामीण विकास की रीढ़ है, उस पर उंगली उठना ही पर्याप्त नहीं, बल्कि फास्ट ट्रैक कार्रवाई जरूरी है। वे यह भी जोड़ते हैं कि जनप्रतिनिधि से ज्यादा जिम्मेदार कोई नहीं, क्योंकि उसे जनता ने भरोसे की मुहर दी होती है। इसलिए अगर किसी जनप्रतिनिधि का नाम आता है, तो आचार समिति में पेशी या बयान जारी करना कार्रवाई नहीं, बल्कि तत्काल कानूनी कार्यवाही, रिकवरी और राजनीतिक दंड होना चाहिए। इसी तरह वरिष्ठ पत्रकार हरिसिंह राजपुरोहित कहते हैं कि यदि विधायकों पर आरोप सही हैं तो कड़ी दंडात्मक कार्रवाई होनी चाहिए और यदि गलत हैं, तो उतनी ही स्पष्ट पब्लिक क्लीन चिट, दोनों में से कोई एक बात जनता को मिलनी चाहिए। हरि सिंह कहते हैं कि बीच की स्थिति यानी वर्षों तक चलती जांच लोकतंत्र के भरोसे को कमजोर करती है। उनका कहना है कि इस पूरे केस में यदि नतीजा ठोस नहीं निकला, तो संदेश यही जाएगा कि राजनीति में अंततः हर विवाद मैनेज किया जा सकता है। और यही लोकतंत्र के लिए सबसे खतरनाक संकेत है।
पक्ष और विपक्ष ही नहीं, समूचा लोकतंत्र शक के घेरे में
दरअसल, लोकतंत्र का भरोसा भाषणों से नहीं, निर्णयों से बनता है। यदि दोष है, तो दंड हो। यदि दोष नहीं, तो प्रमाण सहित सफाई हो। लेकिन सबसे बड़ा नुकसान तब होता है, जब मामला लटका दिया जाता है। इसी पृष्ठभूमि में राजस्थान के विधायकों, रेवंतराम डांगा, अनिता जाटव और रितु बनावत पर आरोप राजनीतिक रूप से ज्यादा विस्फोटक हो जाते हैं, क्योंकि यहां किसी एक दल को नहीं, बल्कि सत्ता-विपक्ष और निर्दलीय तीनों को नैतिक सवालों के घेरे में ला दिया गया है। आज आवश्यकता है कि बीजेपी हो या कांग्रेस, राजनीतिक दल अपने भीतर भी नैतिक अनुशासन लागू करें और विधानसभा की संस्थागत मर्यादा को सिर्फ प्रतीक न रहने दे। क्योंकि विधायक निधि का पैसा किसी दल का नहीं, जनता का है और जनता का पैसा जब सवालों में घिरता है, तो केवल विपक्ष नहीं, पूरा लोकतंत्र कठघरे में खड़ा हो जाता है।
-राकेश दुबे
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