– त्रिभुवन
Hanuman Beniwal: ऐसे समय में, जब भारतीय राजनीति आज्ञाकारिता को साहस से अधिक मूल्य देती है, हनुमान बेनीवाल एक असुविधाजनक अपवाद की तरह खड़े दिखाई देते हैं। राजस्थान की तपती हुई राजनीति में, जहां वफादारियां अक्सर जाति, सत्ता और परंपरा से तय होती हैं; हनुमान बेनीवाल (Hanuman Beniwal) ने एक ऐसा रास्ता चुना जो प्रायः राजनीतिक निर्वासन की ओर जाता है। उन्होंने भारतीय जनता पार्टी (BJP) से न केवल विद्रोह किया, उसके बाहर रहकर अपना वजूद भी कायम रखा। मेरे ख़याल से हाल के वर्षों में देवीसिंह भाटी के बाद राजस्थान (Rajasthan) में वे पहले नेता हैं, जिन्होंने यह साबित किया कि केंद्रीय सत्ता से अलग होकर भी जनाधार बनाया जा सकता है और उसे बचाए रखा जा सकता है। भाटी तो फिर भी वापस भाजपा में चले गए; लेकिन बेनीवाल ने किसान आंदोलन के समय मोदी सरकार से भी टकराव मोल लेकर अपने आपको दु:साहसी साबित किया।
छात्र राजनीति के उबाल से उभरे बेनीवाल
हनुमान बेनीवाल राजनीति से अनजान परिवार से नहीं आते। उनके पिता रामदेव बेनीवाल राजस्थान विधानसभा के दो बार सदस्य रहे। लेकिन राजनीतिक विरासत ने उन्हें रास्ता दिखाया, मंज़िल नहीं। 2 मार्च 1972 को नागौर ज़िले में जन्मे बेनीवाल की असली दीक्षा विश्वविद्यालय के गलियारों, पुलिस की लाठियों और जेल की सलाखों के बीच हुई। नब्बे के दशक में अगर राजस्थान विश्वविद्यालय छात्र राजनीति का उबलता हुआ केंद्र था तो इसलिए कि वहां हनुमान ही अपनी गदा घुमा रहे थे। वहीं से बेनीवाल उभरे, पहले महाराजा कॉलेज, फिर लॉ कॉलेज और अंततः राजस्थान विश्वविद्यालय छात्रसंघ के अध्यक्ष के रूप में।

केवल नेता नहीं, हनुमान बने आक्रोश की आवाज़
एक आंदोलन के दौरान 1996 में गिरफ्तारी और फिर तत्कालीन मुख्यमंत्री भैरोंसिंह शेखावत के आदेश पर आधी रात को रिहाई, यह घटना कैंपस की लोककथा बन गई। विश्वविद्यालय के छात्रावास में 1997 में हुए सामूहिक बलात्कार के विरोध में उन्होंने जो आंदोलन किया, उसने उन्हें केवल नेता नहीं, आक्रोश की आवाज़ बना दिया। पुलिस मुकदमों के बावजूद वे निर्दलीय चुनाव जीत गए। लेकिन छात्र राजनीति का सबसे निर्णायक क्षण तब आया जब उन्होंने ग्रामीण छात्रों के लिए पाँच प्रतिशत अतिरिक्त अंक की मांग को आंदोलन में बदला। यह कोई बड़ा नारा नहीं था, एक व्यावहारिक न्याय की मांग थी। आठ दिनों की जेल और लगातार संघर्ष के बाद यह मांग मानी गई, और लगभग आठ हज़ार ग्रामीण छात्रों को विश्वविद्यालय में प्रवेश मिला। यहीं से बेनीवाल ने यह सीख ली कि अगर आंदोलन लंबा और ईमानदार हो तो संस्थाएँ भी झुकती हैं।
भाजपा से निकले, फिर भी ताकतवर बने रहे
मुख्यधारा की राजनीति में उनका प्रवेश उतना सहज नहीं था। सन 2003 में पहला विधानसभा चुनाव हारने के बाद 2008 में वे भाजपा के टिकट पर खींवसर से जीते। लेकिन यह रिश्ता अस्थायी साबित हुआ। सन 2010 के दशक की शुरुआत में उन्होंने भाजपा के शीर्ष नेतृत्व पर भ्रष्टाचार और सत्ता-साठगांठ के आरोप लगाए। पार्टी ने इसे अनुशासनहीनता कहा; बेनीवाल ने इसे नैतिक ज़िम्मेदारी। नतीजा, निलंबन और निष्कासन। यहीं से उनका असली राजनीतिक परीक्षण शुरू हुआ। सन 2013 में निर्दलीय जीतकर उन्होंने यह साबित किया कि भाजपा से बाहर रहना राजनीतिक आत्महत्या नहीं है। वे विधानसभा में ऐसे विधायक बने जो सत्ता के भीतर रहकर भी विरोध की भाषा बोलते थे। चाहे आरपीएससी के पेपर लीक हों, अवैध बजरी खनन हो या किसानों की उपेक्षा, बेनीवाल ने हर मुद्दे को सड़क तक पहुंचाया।

‘किसान हुंकार’ रैलियों में हनुमान की ताकत
फिर आया 2015, उन पर हुआ हमला और उसके बाद छात्रों का उग्र विरोध, उनकी जनस्वीकृति का प्रमाण था।2018 में राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी (RLP) की स्थापना एक जोखिम भी थी और एक घोषणा भी। किसान कर्ज़माफी, मुफ़्त सिंचाई बिजली और न्यूनतम समर्थन मूल्य जैसे मुद्दों को लेकर उनके ‘किसान हुंकार’ महारैलियों ने राजस्थान की राजनीति को झकझोर दिया। आरएलपी राज्य की तीसरी राजनीतिक शक्ति बनकर उभरी, एक दुर्लभ उपलब्धि। सन 2019 में नागौर से लोकसभा जीतकर वे राष्ट्रीय राजनीति में पहुंचे, भाजपा नेतृत्व वाले एनडीए के सहयोगी के रूप में। लेकिन यह गठबंधन भी स्थायी नहीं रहा। 2020 के कृषि क़ानूनों पर उन्होंने खुला विद्रोह किया, संसदीय समितियों से इस्तीफ़ा दिया, किसानों को दिल्ली कूच के लिए संगठित किया और अंततः एनडीए से नाता तोड़ लिया।
बलशाली नेताओं के सामने महाबली हनुमान
ऐसी संसद में, जहां असहमति दुर्लभ होती जा रही है, एनडीए से नाता तोड़ने का यह कदम असाधारण था। दिसंबर 2023 में संसद की सुरक्षा भंग होने की घटना के दौरान, जब घुसपैठिए लोकसभा कक्ष में कूदे, बेनीवाल उन सांसदों में थे जिन्होंने उन्हें काबू किया। बाद में उनका बयान कि ‘हीरोगीरी उतार दी’; यह उनकी राजनीतिक शैली का सटीक प्रतिबिंब था, सीधी, देहाती और दिखावे से मुक्त। हालांकि उनकी राजनीति अजेय नहीं रही। फिर भी भाजपा और कांग्रेस जैसी बड़ी पार्टियों के बलशाली नेताओं के सामने महाबली हनुमान ही साबित हुए। भले चुनाव उनके हाथ से निकल गया हो। 2024 के खींवसर उपचुनाव में उनकी पत्नी कनिका बेनीवाल की हार ने यह दिखाया कि करिश्मा भी सीमित होता है और जातीय समीकरण अब भी निर्णायक हैं। हालांकि कनिका चुनाव यह चुनाव हार गईं, लेकिन यह तय हो गया कि गंगानगर की यह बेटी भी इस संघर्ष की राह से विधानसभा या लोकसभा की राह पर आगे बढ़ रही है।

विरोध को टिकाऊ बना दिया बेनीवाल ने
चुल 4 बार विधायक और दो बार सांसद रहे हनुमान बेनीवाल आज राष्ट्रीय राजनीति में एक असहज लेकिन साहस के स्थान पर खड़े हैं। सन 2024 में ‘इंडिया’ गठबंधन से जीतने के बाद भी उन्हें हाशिये पर रखे जाने की शिकायत रही। यह उस संरचनात्मक सच्चाई को उजागर करता है कि छोटे दलों के नेता, चाहे जितने लोकप्रिय हों, राष्ट्रीय गठबंधनों में अक्सर अस्थायी माने जाते हैं। फिर भी, राजस्थान की राजनीति में हनुमान बेनीवाल एक ज़रूरी याद दिलाते हैं कि लोकतंत्र अब भी सड़कों से जन्म ले सकता है, सिर्फ़ पार्टी मुख्यालयों से नहीं। यह भविष्य की राजनीति में टिक पाएगा या नहीं, कहना मुश्किल है। लेकिन इतना तय है कि बेनीवाल ने एक दुर्लभ काम किया है: उन्होंने विरोध को टिकाऊ बना दिया है। अगर हनुमान बेनीवाल की तरह का साहस भाजपा या कांग्रेस के कुछ नेताओं ने दिखाया होता तो राजस्थान आज एक अलग ही राह पर चल रहा होता!

