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Home»देश-प्रदेश»Narayan Bareth: फिर जन्म मिले, तो यहां मत आना नारायण बारेठ, क्योंकि ये दुनिया आप जैसों के लिए बची नहीं है
देश-प्रदेश 5 Mins Read

Narayan Bareth: फिर जन्म मिले, तो यहां मत आना नारायण बारेठ, क्योंकि ये दुनिया आप जैसों के लिए बची नहीं है

Prime Time BharatBy Prime Time BharatMarch 8, 2026No Comments
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          • -निरंजन परिहार
  • पहली मुलाकात ही आखिरी सांस तक जिंदा रही
  • अशोक गहलोत पहुंचे अर्थी को कंधा देने
  • उनका सच शालीन था, कभी किसी को नहीं चुभा
  • पत्रकारिता के शिखर पुरुष थे नारायण बारेठ
-निरंजन परिहार

एक थे नारायण बारेठ। संसार से चले गए। चुपचाप चहल कदमी करते हुए। वे सरल थे, विरल थे, विमल थे, विनम्र थे और विराट व्यक्तित्व के भी। सच है कि वे जैसे थे, वैसे आम तौर पर लोग आसानी से हो नहीं पाते, और यह भी कि नारायण बारेठ (Narayan Bareth) जैसे लोग बार-बार संसार में नहीं जन्मते। लेकिन अपना तो यहां तक कहना है कि फिर जन्म मिले, तो इस दुनिया में आना ही मत नारायणजी, क्योंकि यह दुनिया आप जैसों को लिए बची ही नहीं हैं। वे नैतिक थे, निरापद थे और किसी संत सरीखे सदा रहे। राजस्थान (Rajasthan) की पत्रकारिता का नैतिक चेहरा थे बारेठ। अब वे नहीं हैं। लेकिन ऐसी विरासत छोड़ गए, जिसे मौजूदा दौर में सम्हालना आसान नहीं। यह विरासत उन्होंने शब्दों से नहीं, लेखन से भी नहीं बल्कि अपनी चारित्रिक नैतिकता के मूल्यों से बनाई और उसी पत्रकारीय नैतिकता को आज का मीडिया कैसा तांड़व करवा रहा है, यह किसी से अनजाना नहीं है।

Narayan Bareth Niranjan Parihar London Gandhi Memorial Parliament Square Prime Time Bharat
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पहली मुलाकात ही आखिरी सांस तक जिंदा रही

वह 1987 का साल था, नारायण बारेठ जोधपुर में नवभारत टाइम्स के संभागीय मुखिया थे। गांधी शांति प्रतिष्ठा के नेमीचंद्र जैन ‘भावुक’ जी ने उनसे अपनी पहली मुलाकात कराई थी। अपन बच्चे से थे, 16-17 साल के कच्चे बच्चे। अपना ताना – बाना नारायण बारेठ से तब ही बुन लिया गया था। बीस – तीस मिनट की वह मुलाकात उनकी आखिरी सांस तक जिंदा रही। अपन हर दौर में उनके करीब रहे, दिल के भी और काम से भी। कुछ साल पहले वे लंदन आए थे। बोले – पार्लियामेंट स्क्वायर जा रहा हूं, गांधीजी के दर्शन करने। नारायण बारेठ वहां पहुंचे, संसद के सामने आदमकद खड़ी गांधीजी की प्रतिमा को नमन किया, तस्वीर खिंचवाई और उस दौरान उनके भाव कह रहे थे कि जैसे उनकी लंदन की यात्रा इसी तस्वीर के साथ पूरी हो गई। एक सरल, सादा, सीधा और सच्चा जीवन था नारायणजी का। न कोई दिखावा, न कोई छल। न कोई महत्वाकांक्षा और न किसी से होड़। पेशे से भले ही वे पत्रकार थे, लेकिन असल में पत्रकारिता के संस्कार थे, पत्रकारिता की मर्यादा थे और उसकी आत्मा भी।

Narayan Bareth Rajasthan Prime Time Bharat
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अशोक गहलोत पहुंचे अर्थी को कंधा देने

राजस्थान की राजनीति पर उनकी पकड़ अद्भुत थी। नेताओं के किसी भी चाल को चलने से पहले ही वे उसे पढ़ लेते थे। और उस चाल की सफलता के सियासी के संकेत भी भांप लेते थे। उनकी सबसे बड़ी ताकत थी उनकी विश्वसनीयता। यही विश्वसनीयता उनको राजस्थान के तीन बार मुख्यमंत्री रहे अशोक गहलोत के करीब लाई।  नारायण बारेठ का परिचय गहलोत जी से जोधपुर में तब से रहा, जब वे सांसद और पहली बार केंद्र में मंत्री थे। गहलोतजी से उनकी नजदीकियां इसी से समझ लीजिए कि जब नारायण बारेठ संसार से गए, तो गहलोतजी उनके घर पहुंचे, उनकी देह को नमन किया, अर्थी को कंधा दिया और भावुक मन से अंतिम विदाई भी। सिक्किम के राज्यपाल ओम प्रकाश माथुर  ने नारायण बारेठ को श्रद्धांजलि देते हुए अपना पुराना मित्र बताया। दरअसल, दिग्गज राजनेताओं के बेहद के करीब रहने के बावजूद सत्ता की ताकत भी बारेठ को बदल नहीं पाई। वे वैसे ही रहे – सरल, संतुलित और निष्पक्ष। मीडिया के आज के माहौल में नारायण बारेठ को किसी महात्मा जैसा माना जा सकता था।

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उनका सच शालीन था, कभी किसी को नहीं चुभा

वे राजस्थान की मिट्टी में पले। यहीं के समाज को पढ़ा और यहीं की सियासत की सच्चाई को समझा तो उस सच को सबके सामने भी रखा। बेबाक, बेलाग और बेपरवाह तरीके से। मुख्यमंत्री बदलते रहे। मंत्री, सांसद, विधायक बनते – हारते रहे। सरकारें आती-जाती रहीं। लेकिन एक चीज स्थिर रही, नारायण बारेठ के प्रति उन सबके मन में सम्मान। यह सम्मान उनके पत्रकारीय सात्विकता के चमकते चरित्र से पैदा हुआ था। कहते हैं कि सच बहुत चुभता है, लेकिन नारायण बारेठ के सच में इतनी शालीनता इतनी रही कि उनका कहा किसी को चुभता नहीं था। उनकी भाषा में तल्खी नहीं थी। बीबीसी के संपादक रहे संजीव श्रीवास्तव कहते हैं कि नारायण बारेठ की किसी भी बात में कटुता नहीं थी, लेकिन सच्चाई पूरी होती थी। वे बड़े पत्रकार थे,  लेकिन बड़े होने के अहंकार से विरत। यह संतुलन नारायण बारेठ ने  कहां से सीखा था, कोई नहीं जानता। नवभारत टाइम्स में उनके साथ काम करने का अवसर मिलना अपना लिए सौभाग्य रहा।

Narayan Bareth Journalist Prime Time Bharat
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पत्रकारिता के शिखर पुरुष थे नारायण बारेठ

जीवन उनका संघर्षों से सजा था, लेकिन संघर्ष उन्हें कठोर नहीं बना सके। बल्कि अतिरिक्त विनम्र बना दिया। लड़ना उनकी फितरत में नहीं था, पर वे न्यूमोनिया से लड़े, पूरे पांच सप्ताह तक लड़े और आखरी सांस तक लड़े। मगर जीवन हार गया, मृत्यु जीत गई। वैसे भी अंततः जीतती तो वही है, अतः नारायणजी का हारना तय था। लेकिन वे हार कर भी जीत गए, क्योंकि जीवन को पूरी ईमानदारी से जीने वाले और उसे जीतने वाले नारायण बारेठ जैसे दुर्लभ चरित्रों के लिए यह संसार जीने के लिए अब वैसा नहीं बचा है, जिसमें वे सुख की आखरी सांस ले सकते। नारायणजी अब हमारे बीच नहीं हैं। फिर भी, वैसे पत्रकारिता में इतिहास के लायक कुछ बचा नहीं है, पर पत्रकारिता का इतिहास अगर कभी लिखा भी जाएगा, तो नारायण बारेठ का नाम पत्रकारिता के शिखर पुरुष के रूप में अवश्य शामिल होगा।

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