Bhairon Singh Shekhawat: देश का राजनीति में भैरोंसिंह शेखावत सिर्फ एक नेता नहीं थे। वे राजनीति की उस विरल नस्ल के पुरोधा थे, जिनकी मौजूदगी ही सत्ता के गलियारों में वजन पैदा कर देती थी। वे प्रभावशाली थे, शक्तिशाली थे। और सबसे बड़ी बात, वे सामर्थ्यवान भी थे। मगर इन सबसे ऊपर, वे आदमीयत से भरपूर आदमी थे। आदमकद आदमी। और उनमें मानवीयता इतनी ज्यादा थी कि आज की राजनीति में भैरोंसिंह शेखावत (Bhairon Singh Shekhawat) जैसा कोई खोजने निकलो तो शायद दूर-दूर तक दिखाई ना दे। वे राजनीति के उस दौर के आखिरी विराट पुरुषों में थे, जिनके पास विरोधी भी सम्मान लेकर जाते थे। जिनकी आलोचना करने वाले भी भीतर से उनका कद स्वीकारते थे।
उपराष्ट्रपति पद को भी जीवंत कर दिया
तीन बार राजस्थान के मुख्यमंत्री बने शेखावत। मगर सिर्फ मुख्यमंत्री बन जाना ही बड़ी बात नहीं थी। बड़ी बात यह थी कि हर बार जनता ने उन्हें अपने मन से स्वीकार किया। राजस्थान की राजनीति में नेता बहुत हुए। कुर्सियों पर बैठने वाले भी कई हुए। मगर भैरोंसिंह शेखावत कुर्सी से बड़े थे। वे पद से बड़े थे। वे सत्ता में रहे तो भी जनता के आदमी लगे। विपक्ष में रहे तो भी सबसे बड़े नेता लगे। असल में, शेखावत का व्यक्तित्व बहुत विराट था। इतना विराट कि देश के उपराष्ट्रपति जैसे लगभग निष्क्रिय माने जाने वाले पद को भी उन्होंने जीवंत कर दिया। गरिमा दी, और वजन भी बढ़ा दिया। उपराष्ट्रपति भवन में बैठा आदमी पहली बार देश की जनता को सक्रिय दिखाई देने लगा। वरना उससे पहले उपराष्ट्रपति का पद सिर्फ औपचारिकता माना जाता था।

राजनीतिक विरोधियों से भी मिला सम्मान
राजस्थान में अगर अब तक के सबसे बड़े नेताओं की सूची बने, तो उसमें भैरोंसिंह शेखावत का नाम सबसे ऊपर की कतार में लिखा जाएगा। एक मोहनलाल सुखाड़िया भी थे। उन्होंने आधुनिक राजस्थान की बुनियाद रखी। अब अशोक गहलोत हैं, जो कांग्रेस में जीते जी किंवदंती बन चुके हैं। मगर भैरोंसिंह शेखावत का कद अलग था। वे दल से ऊपर चले गए थे। यही कारण है कि अशोक गहलोत जैसे राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी भी उन्हें अपना आदर्श बताते हैं। गहलोत ने कहा कि स्व.शेखावत जी मुझसे बहुत स्नेह रखते थे, जब मैं प्रथम बार मुख्यमंत्री बना तो वे नेता प्रतिपक्ष थे, अलग अलग राजनीतिक विचारधारा होने के बावजूद हमारे बहुत संबंध बेहद सौहार्दपूर्ण थे। एक साधारण परिवेश से निकलकर उन्होंने राजनीति में मुकाम हासिल किया। राजनीति में अपने धुर विरोधियों से भी यह सम्मान यूं ही नहीं मिलता। इसके लिए जीवन खपाना पड़ता है। लोगों के सुख-दुख में उतरना पड़ता है। अपने विरोधियों के लिए भी दिल में जगह रखनी पड़ती है।

आम आदमी के अपने नेता थे शेखावत
शेखावत के पास सत्ता थी, मगर सत्ता का अहंकार नहीं था। वे गांव के आदमी थे। गांव की भाषा बोलते थे। किसान की पीड़ा समझते थे। गरीब के घर का धुआं पहचानते थे। यही कारण था कि राजस्थान का सामान्य आदमी उन्हें अपना मानता था। आज बीजेपी में बहुत नेता हैं। बड़े-बड़े पदों पर बैठे हुए। टीवी स्क्रीन पर छाए हुए। मगर राजनीतिक सम्मान और गरिमा का जो आकाश भैरोंसिंह शेखावत ने छुआ था, वहां तक पहुंचने के लिए आज के कई नेताओं को शायद कई जन्म लेने पड़ेंगे। अपना सौभाग्य रहा कि दो दशक से भी ज्यादा वक्त तक भैरोंसिह शेखावत के स्नेह खी छाया में रहने का अवसर मिला। मुख्यमंत्री थे, तब भी और उपराष्ट्रपति के पांच साल तक भी साथ रहने और सेवा का सौभाग्य मिला। जब उनको बहुत नजदीक से देखा, तो लगा कि राजनीति सिर्फ भाषणों से नहीं चलती। वह सिर्फ प्रचार से नहीं चमकती। राजनीति का असली सोना वक्त की भट्टी में तपकर निकलता है। शेखावत उसी सोने सा चमकता नाम थे। वे जब बोलते थे, तो शब्दों में ठहराव होता था। जब चुप रहते थे, तब भी संदेश होता था।
भीतर से भी सदा बड़े आदमी बने रहे
शेखावत के पास राजनीतिक चातुर्य था। मगर चालाकी नहीं थी। वे रणनीतिकार थे, मगर षड्यंत्रकारी नहीं। यही वजह है कि विरोधी भी उन पर निजी हमला करने से बचते थे। आज की राजनीति में लोग बहुत जल्दी बड़े बन जाते हैं। पोस्टर बड़े। काफिले बड़े। दावे बड़े। मगर भीतर से बहुत छोटे। भैरोंसिंह शेखावत भीतर से बड़े आदमी थे। बहुत बड़े। इसलिए आज भी राजस्थान की राजनीति में उनका नाम लेते ही एक अलग सम्मान का भाव पैदा होता है। सच तो यह है कि शेखावत अब सिर्फ एक व्यक्ति नहीं रहे। वे संसार से विदा लेते ही राजस्थान की राजनीतिक संस्कृति का प्रतीक बन चुके हैं। ऐसी संस्कृति, जिसमें संवाद था। संवेदना थी। शालीनता थी। और सबसे बढ़कर, इंसानियत थी। शेखावत जैसा फिर कोई इस संसार में जन्मे, तो बताना।
(लेखक राजनीतिक विश्लेषक हैं)
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