Jitendra Singh: राजनीति में हार होती रहती हैं और इस्तीफे भी। ताजा हार कांग्रेस (Congress) की है, चुनाव असम (Assam) का था और इस्तीफा भंवर जितेंद्र सिंह (Jitendra Singh) का। कांग्रेस असम में बुरी तरह हार गई है। कांग्रेस के प्रभारी महासचिव भंवर जितेंद्र सिंह ने हार की जिम्मेदारी लेते हुए प्रभारी पद से इस्तीफा दे दिया है। इस्तीफा कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिर्जुन खड़गे के पास है और आम तौर पर इस तरह के इस्तीफे जल्दी नहीं स्वीकारे जाते। लेकिन जितेंद्र सिंह का जैसा राजनीतिक व्यक्तितव है, उसमें जिम्मेदारी, नैतिकता और समर्पण ज्यादा है। इसी पर राजनीतिक विश्लेषक और वरिष्ठ पत्रकार त्रिभुवन का यह लेख –
हार के बीच जवाबदेही की एक शांत रेखा
असम के चुनावी परिदृश्य में कांग्रेस की हार को केवल एक व्यक्ति के सिर रख देना राजनीतिक सुविधा हो सकती है, विश्लेषण नहीं। असम कोई आसान राज्य नहीं था। वहां भाजपा के पास सत्ता, संसाधन, क्षेत्रीय समीकरण, मजबूत नेतृत्व और बूथ-स्तर तक फैली चुनावी मशीनरी थी। भाजपा का काम करने का तरीका भी बहुत अलग है। कांग्रेस के प्रभारी के रूप में भंवर जितेंद्र सिंह की भूमिका को देखने के लिए थोड़ी राजनीतिक परिपक्वता चाहिए। हार हुई है, यह निर्विवाद है; लेकिन हार के बाद कोई नेता आगे आकर यह कहे कि “मैं जिम्मेदारी लेता हूं”, यह आज की राजनीति में दुर्लभ दृश्य है। मैंने नहीं देखा कि राजस्थान में किसी ने जिम्मेदार पद पर रहते हुए ऐसा किया हो। किसी ने सत्ता खोई हो और कहा हो कि चूक हमारी थी। किसी के हाथ संगठन हो और कहे कि कुछ ग़लती हमसे भी हुई। प्रभारी बोले हों कि हाँ, हम भी जिम्मेदार हैं।

सिंह का व्यक्तित्व चिल्लाहट वाला नहीं
अलबत्ता, मुझे याद है, राजस्थान में डॉ. चंद्रभान ने समय-समय पर आगाह किया था तो लोगों ने उन्हें सुना तक नहीं। ख़ैर, भंवर जितेंद्रसिंह ने असम चुनाव परिणामों की नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे को इस्तीफा भेजा है। भंवर जितेंद्र सिंह का राजनीतिक व्यक्तित्व चिल्लाहट वाला नहीं है। वह उन नेताओं में नहीं गिने जाते जो हर दिन कैमरे के सामने तलवार घुमाते हैं। उनकी शैली अपेक्षाकृत शांत, संगठनात्मक और दिल्ली-हाईकमान तथा प्रदेश-राजनीति के बीच पुल बनाने वाली रही है। उनमें वाचालता दूर दूर तक नहीं है। असम जैसे जटिल राज्य में, जहां जातीय, भाषाई, धार्मिक, आदिवासी, चाय-बागान और क्षेत्रीय पहचानें एक-दूसरे में उलझी रहती हैं, किसी भी प्रभारी की भूमिका केवल भाषण देने या संगठनात्मक काम देखने से पूरी नहीं होती। उसे स्थानीय नेतृत्व, उम्मीदवार चयन, गठबंधन-संकेत, अभियान की दिशा, संसाधनों की उपलब्धता और केंद्रीय नेतृत्व की प्राथमिकताओं के बीच संतुलन बनाना पड़ता है।
हार के बाद बहाने नहीं तलाशे जितेंद्र ने
कांग्रेस के लिए समस्या यह थी कि असम में वह केवल भाजपा से नहीं लड़ रही थी; वह अपनी पुरानी संगठनात्मक कमज़ोरियां, क्षेत्रीय दलों की चुनौतियाँ, नेतृत्व की अस्पष्टता और भाजपा की आक्रामक सामाजिक इंजीनियरिंग से भी जूझ रही थी। इस पूरे संघर्ष में भंवर जितेंद्र सिंह ने अपनी तरफ से संगठन को साधने की कोशिश की। कांग्रेस की आधिकारिक सूचनाओं में वे एआईसीसी महासचिव और असम प्रभारी के रूप में प्रदेश नेतृत्व के साथ प्रेस वार्ताओं और रणनीतिक संवादों में सक्रिय दिखे। फिर भी राजनीति परिणाम से मापी जाती है। जब परिणाम अनुकूल नहीं आया तो उन्होंने वही किया जो कई बड़े नेता करने से बचते हैं और वह है जिम्मेदारी लेना। कांग्रेस में नेता खुद जानते बूझते भी गड्ढ़े में गिरे तो वह आरोप दूसरों पर लगाता है। इसलिए यह कदम उन्हें विजेता नहीं बनाता, लेकिन उन्हें राजनीतिक रूप से अधिक गंभीर अवश्य बनाता है। आज की राजनीति में हार के बाद बहाने ढूंढना आसान है: ईवीएम, मीडिया, धनबल, जातीय समीकरण, गुटबाजी, स्थानीय नेतृत्व, केंद्रीय नेतृत्व आदि कारणों की पूरी थाली सजाई जा सकती है। लेकिन जिम्मेदारी स्वीकार करना अलग बात है। वह हार की धूल में भी व्यक्ति का कद थोड़ा ऊंचा कर देता है।
शालीनता और नैतिकता का सियासी चेहरा
भंवर जितेंद्र सिंह के लिए असम एक कठिन परीक्षा था। यह परीक्षा वे परिणाम की दृष्टि से जीत नहीं पाए, लेकिन हार के बाद उनकी प्रतिक्रिया में एक शालीनता और नैतिकता दिखी। कांग्रेस के भीतर यह गुण कम होता जा रहा है। कई नेता पद को कवच समझते हैं; उन्होंने पद को उत्तरदायित्व माना। यही उनकी सकारात्मक रेखा है। असम की हार कांग्रेस को आत्ममंथन के लिए बाध्य करती है, लेकिन भंवर जितेंद्र सिंह को केवल निशाने पर रख देना आसान और अधूरा निष्कर्ष होगा। असल सवाल यह है कि कांग्रेस पूर्वोत्तर में दीर्घकालिक संगठन कैसे बनाएगी, स्थानीय नेतृत्व को कितनी स्वायत्तता देगी और भाजपा की गहरी चुनावी मशीनरी के सामने वैकल्पिक सामाजिक गठबंधन कैसे खड़ा करेगी। भंवर जितेंद्र सिंह की भूमिका को इसी बड़े संदर्भ में देखना चाहिए। एक ऐसे प्रभारी के रूप में जिसने कठिन मोर्चा संभाला, परिणाम अनुकूल न आने पर जिम्मेदारी ली और हार के बीच भी राजनीतिक मर्यादा की एक पतली; लेकिन साफ़ रेखा खींच दी।
– त्रिभुवन (वरिष्ठ पत्रकार) उनकी ‘एक्स’ वॉल से साभार
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