Congress: डॉक्टर प्रज्ञा सातव… कांग्रेस आलाकमान के खास रहे राजीव सातव की धर्मपत्नी। नाम नया नहीं, मोड़ नया है। बीजेपी उनको विधान परिषद भेज रही है। विरासत कांग्रेस की, मगर मुकाम बीजेपी। राजनीति में रास्ते बदलते हैं, पर सवाल वही रहता है कि आखिर क्यों? सवाल यह नहीं कि क्यों कोई किसी को छोड़ कर किसी और का हो जाता है? सवाल यह कि लोग कांग्रेस (Congress) छोड़ क्यों रहे हैं? और कांग्रेस रोक क्यों नहीं पा रही? डॉ प्रज्ञा सातव (Pradnya Satav) का बीजेपी (BJP) से विधान परिषद के लिए कमर कसना सिर्फ एक व्यक्ति का पालाबदल नहीं है। यह उस ‘पॉलिटिकल सिस्टम फेल्योर’ का संकेत है, जो धीरे-धीरे कांग्रेस के भीतर लगातार फैल रहा है और रुक ही नहीं रहा। कांग्रेस आज महाराष्ट्र (Maharashtra) में संघर्ष कर रही है। न संगठन में धार, न नेतृत्व में स्पष्टता, न चेहरों में ऊर्जा। पुराने नाम हैं, लेकिन जमीन खिसक रही है।
सियासत के समीकरण समझते ही सत्ता के साथ सातव
प्रज्ञा परंपरागत कांग्रेसी परिवार की बहू। पति राजीव सातव… कांग्रेस का उभरता चेहरा थे, और राहुल गांधी के खासमखास। प्रज्ञा की सास रजनी सातव… सत्ता का सुदीर्घ अनुभव, बरसों तक महाराष्ट्र की कांग्रेसी सरकारों में मंत्री। घर में कांग्रेस विचारधारा की सांस। उसी आंगन से प्रज्ञा ने राजनीति की रवायतों को जाना। पति राजीव सातव के असमय निधन के बाद कांग्रेस ने सहारा दिया। राहुल गांधी ने दिलासा दिया। गले लगाया और भावनाओं को प्रतिनिधित्व में बदला। विधान परिषद में भेजा। यह सिर्फ पद नहीं, विश्वास था। लेकिन राजनीति में विश्वास स्थायी नहीं होता। समीकरण सदा सामने होते हैं। प्रज्ञा ने समीकरण समझ लिए। इसीलिए, दिसंबर 2025, एक तारीख नहीं थी, संकेत था समीकरणों की समझ का। उस समझ के सत्यापन का। कांग्रेस छोड़ दी। बिना हिचक। बिना झिझक। बिना किसी वैचारिक बहस के। प्रज्ञा बोली, नरेंद्र मोदी देश का विश्वास और देवेंद्र फड़णवीस मजबूत नेता। और दामन थाम लिया। थामा भी तो इतना मजबूती से कि फोन उठाते ही हैलो या नमस्कार नहीं, सीधे जयश्री राम बोलती हैं, बीजेपी नेताओं की तरह।
कांग्रेस ने ताकत नहीं समझी प्रज्ञा की, अवहेलना भी की
यहीं से कहानी बदलती है। यह सिर्फ पार्टी बदलना नहीं था। यह एक संकेत था कि कांग्रेस के भीतर कुछ गंभीर रूप से टूट रहा है। इसीलिए कांग्रेसी विचारधारा से सीधे मोदी के पाले में। यह उनका फैसला व्यक्तिगत था या राजनीतिक? सवाल बड़ा है। और जवाब उससे भी बड़ा। बीजेपी ने उन्हें सिर्फ शामिल नहीं किया। उनकी ताकत का लाभ भी लिया। कांग्रेस नहीं कर पाई। नगर परिषदों में, पालिकाओं में, चुनावी मोर्चों पर बीजेपी ने काम करवाया। प्रज्ञा ने मेहनत की। लगातार लगी रहीं। बेहतर परिणाम दिए। बीजेपी को जीत दिलाई। राजनीति में निष्ठा नहीं, उपयोगिता चलती है। और प्रज्ञा उपयोगी साबित हुईं। प्रज्ञा राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्रा में भी शामिल रहीं, राहुल ने गले भी लगाया। लेकिन कांग्रेस ने उनकी ताकत नहीं समझी, उपयोगिता की भी अवहेलना की। वैसे भी अपनी ही उलझनों में उलझा कोई संगठन, कहां किसी की ताकत का सदुपयोग करने में समर्थ होता है।

संदेश साफ है कि कांग्रेस हो रही है लगातार कमजोर
बीजेपी ने अब प्रज्ञा सातव तो विधान परिषद का उम्मीदवार बना दिया। पहले कांग्रेस से इस्तीफा दिलवाया, उसी सीट पर उपचुनाव में उम्मीदवार बनाया। जीत तय है। यह इनाम है। या निवेश? शायद दोनों। वे अब विधायक रहेंगी। यानी सत्ता के साथ लंबी पारी तय। लेकिन यह पारी सिर्फ सीट की नहीं, संदेश की भी है। संदेश साफ है कि कांग्रेस कमजोर हो रही है। धीरे-धीरे, पर लगातार, बिना किसी रुकावट के। उसके अपने लोग ही उसके हाथ से फिसल रहे हैं। महाराष्ट्र में कांग्रेस की हालत अब वैसी नहीं रही। न संगठन में धार, न नेतृत्व में दम। पुराने नाम हैं, पर नई ऊर्जा नहीं। डॉ प्रज्ञा सातव तो केवल एक चेहरा है। उन जैसे ही कईयों का कांग्रेस से लगातार निकलते जाना व्यक्तियों का जाना नहीं है। यह उस खालीपन का संकेत है, जो कांग्रेस के भीतर अनवरत बढ़ रहा है, और बढ़ता ही जा रहा है। बीजेपी इस खालीपन को पहचान रही है। और उसे और ज्यादा खाली करती भी जा रही है। चेहरे अपनी ओर जोड़ रही है। नए समीकरण सजा रही है। जाति के, समाज के और वर्गों के समीकरण।
सवाल यह है कि राहुल गांधी आखिर कर क्या रहे हैं?
डॉ प्रज्ञा सातव का सफर यही बताता है कि राजनीति अब विचारधारा की कम, अवसर की ज्यादा हो गई है। निष्ठा की कम और विश्वास की ज्यादा है। कांग्रेस के प्रति विश्वास कम हो रहा है। अब वह बीजेपी में हैं, क्योंकि विस्तार है। सवाल यह नहीं कि प्रज्ञा सही हैं या गलत। सवाल यह है कि कांग्रेस क्यों ऐसी स्थिति में पहुंची कि अपने ही लोग टिक नहीं पा रहे। राजनीति में माना जाता है कि कोई जाता है, तो कोई आता है। लेकिन कांग्रेस में कोई आ ही नहीं रहा, यही उसकी मुश्किल है। राजनीति में खाली जगह कभी खाली नहीं रहती। लेकिन कांग्रेस खाली होती जा रही है। डॉ प्रज्ञा का सफर एक लाइन में समझें, तो विचारधारा से विश्वास आगे निकल गया। बीजेपी विश्वास हैं क्योंकि वहीं से विकास है। सवाल यह है कि राहुल गांधी आखिर कर क्या रहे हैं। उनके अपने ही साथी टिक नहीं पा रहे। आखिर क्यों? यही आज की कांग्रेस के लिए सबसे सटीक, सबसे सरल सवाल है। लेकिन राहुल गांधी समझे तब न!
– निरंजन परिहार ( राजनीतिक विश्लेषक)
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