Rajya Sabha Election: राजस्थान से राज्यसभा (Rajya Sabha) की तीन सीटों के लिए उम्मीदवारों की घोषणा के साथ ही प्रदेश की राजनीति में नए संदेश और नए समीकरणों पर चर्चा शुरू हो गई है। कांग्रेस (Congress) ने एक बार फिर वरिष्ठ नेता और वर्तमान राज्यसभा सांसद नीरज डांगी (Neeraj Dangi) पर भरोसा जताया है, जबकि बीजेपी (BJP) ने पूर्व प्रदेश अध्यक्ष डॉ सतीश पूनिया (Dr Satish Poonia) और सामाजिक क्षेत्र से जुड़ी डॉ अलका गुर्जर (Dr Alka Gurjar) को उम्मीदवार बनाकर राजनीतिक और सामाजिक संतुलन साधने का प्रयास किया है। राजस्थान (Rajasthan) की राजनीति में नीरज डांगी डॉ सतीश पूनिया और डॉ अलका गुर्जर तीनों में सबसे बड़ी समानता यही है कि तीनों नेता बेहद शालीन, समर्पित और जनता से जुड़े हुए माने जाते हैं। तीनों बेहद मेहनती और नतीजे देने वाले नेता रहे हैं तथा तीनों का संसदीय अनुभव कोई बहुत ज्यादा नहीं है, फिर भी वे राजनीति में बेहद गहरे ताल्लुक रखने वाले शांत और प्रभावी नेता मनाने जाते हैं। जातिगत व सामाजिक समीकरण देखें, तो कांग्रेस ने नीरज डांगी के जरिए दलितों पर दांव लगाया है, तो बीजेपी ने गुर्जर तथा जाट समुदायों को प्रतिनिधित्व देकर एक खाास संदेश दिया है। तीनों के बारे में एक और खास बात यह है कि तीनों नेता अपने अपने आलाकमान के खासमखास हैं। इस बार के राज्यसभा चुनाव (Rajya Sabha Election) राजस्थान की सियासत में कांग्रेस और बीजेपी दोनों नए समीकरण का साधने के समयकाल में दिख रही है।

आलाकमान और गहलोत से डांगी की नजदीकियां
कांग्रेस द्वारा नीरज डांगी को दोबारा उम्मीदवार बनाए जाने का निर्णय कई मायनों में महत्वपूर्ण माना जा रहा है। डांगी लंबे समय से संगठन और संसदीय राजनीति में सक्रिय रहे हैं। राज्यसभा में उनका कार्यकाल अपेक्षाकृत शांत लेकिन प्रभावी माना जाता रहा है। कांग्रेस नेतृत्व ने उन्हें पुनः अवसर देकर यह संकेत दिया है कि पार्टी अनुभवी और संगठन के प्रति समर्पित नेताओं को प्राथमिकता देना चाहती है। साथ ही यह निर्णय प्रदेश कांग्रेस में स्थिरता और नेतृत्व के प्रति विश्वास का संदेश भी देता है। राजस्थान की राजनीति में डांगी कांग्रेस के दिग्गज नेता अशोक गहलोत के आशीर्वादप्राप्त नेता के रूप में जाने जाते हैं। पिछली बार भी जब उनको उम्मीदवारी मिली थी, तो गहलोत की तरफ से ही मिली थी। राजनीितिक विश्लेषक संदीप सोनवलकर कहते हैं कि इस बार राजस्थान की राजनीति में कुछ गहलोत विरोधी आलाकमान की गहलोत से नाराजगी की घोषणा के साथ जब यह कह रहे हैं कि जादूगर गहलोत की सियासत का जादू अपने उतार पर हैं, तो अशोक गहलोत ने नीराज डांगी की उम्मीदवारी घोषित करववाकर सभी के मुंह पर ताला लगा दिया है। अब डांगी का अपने आलाकमान से भी करीब का नाता है।

पूनिया और अलका के चयन नेतृत्व का निर्णय
दूसरी ओर, बीजेपी ने अपने उम्मीदवारों के चयन के माध्यम से व्यापक सामाजिक और राजनीतिक संदेश देने की कोशिश की है। डॉ. सतीश पूनिया को राज्यसभा भेजने का निर्णय उनके लंबे राजनीतिक अनुभव और संगठनात्मक योगदान की स्वाभाविक स्वीकार्यता के रूप में देखा जा रहा है। राजनीतिक विश्लेषक निरंजन परिहार कहते हैं कि प्रदेश बीजेपी के अध्यक्ष के रूप में डॉ पूनिया ने चुनौतीपूर्ण दौर में संगठन को मजबूत करने का काम किया था। परिहार कहते हैं कि विधानसभा चुनावों के बाद सक्रिय राजनीति में उनकी भूमिका को लेकर कई तरह की चर्चाएं थीं, लेकिन राज्यसभा का टिकट देकर पार्टी ने स्पष्ट कर दिया है कि पूनिया अब भी उसके महत्वपूर्ण नेताओं में शामिल हैं। बीजेपी की दूसरी उम्मीदवार डॉ. अलका गुर्जर का चयन भी विशेष महत्व रखता है। सामाजिक क्षेत्र में उनकी सक्रियता और गुर्जर समाज में उनकी पहचान को देखते हुए यह निर्णय सामाजिक प्रतिनिधित्व की दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। राजस्थान की राजनीति में जातीय और सामाजिक समीकरण हमेशा प्रभावशाली रहे हैं। ऐसे में बीजेपी ने महिला प्रतिनिधित्व और सामाजिक संतुलन दोनों को ध्यान में रखते हुए यह दांव खेला है।
राजस्थान की आवाज बुलंद होगी राज्यसभा में
राजस्थान से राज्यसभा के इन तीनों नेताओं की घोषणा केवल राज्यसभा की औपचारिक प्रक्रिया भर नहीं है, बल्कि यह आने वाले राजनीतिक संकेतों का भी हिस्सा है। कांग्रेस ने जहां अनुभव और निरंतरता को महत्व दिया है, वहीं बीजेपी ने संगठन, सामाजिक प्रतिनिधित्व और भविष्य की राजनीतिक रणनीति के बीच संतुलन स्थापित करने का प्रयास किया है। ज्यसभा चुनावों में संख्याबल के आधार पर इन उम्मीदवारों की जीत लगभग तय मानी जा रही है, लेकिन राजनीतिक दृष्टि से इन तीनों नामों का महत्व इससे कहीं अधिक है। नवभारत टाइम्स के राजनीतिक संपादक राजकुमार सिंह कहते हैं कि तीनों नेता अपने अपने आलाकमान के बेहद करीबी हैं तथा तीनों के समर्पण व त्याग के मायने देख कर ही चयन किया गया है। यह चयन आने वाले समय में राजस्थान की राजनीति की दिशा, दलों की प्राथमिकताओं और उनके सामाजिक आधार को मजबूत करने की रणनीति को भी प्रतिबिंबित करता है। राज्यसभा के माध्यम से दिल्ली की राजनीति में राजस्थान की आवाज़ कौन और किस प्रकार उठाएगा, इस पर भी अब सबकी निगाहें रहेंगी।
– राकेश दुबे (वरिष्ठ पत्रकार)
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