Rajasthan Congress Politics: राजस्थान की कांग्रेसी राजनीति बड़ी उलझन भरी है। अशोक गहलोत (Ashok Gehlot) और सचिन पायलट (Sachin Pilot) भले ही दोनों सबसे बड़े नेता हैं, लेकिन दोनों ही विपरीत ध्रुवीय ताकतें हैं। पीढ़ी का फर्क और सत्ता सुख की लालसा दोनों में बराबर हैं। हो भी क्यों नहीं, व्यक्ति राजनीति (Politics) में सक्रिय ही इसीलिए रहता है कि उसे सत्ता सुख मिले, वह प्रभावी बना रहे और उसकी ताकत लगातार बढ़ती रहे। अपनी ताकत को लगातार बढ़ाने और बनी हुई ताकत को निरंतर बनाए रखने की कोशिश में ही 75 साल के गहलोत और 55 साल के पायलट, दोनों की अनवरत सक्रिय हैं। और यही सक्रियता इन दोनों नेताओं की ताकत भी है और परस्पर प्रतिस्पर्धा का कारण भी। हालांकि गहलोत और पायलट के कमजोर विरोधी इस प्रतिस्पर्धा को कांग्रेस को कमजोर करने वाला बताते है, लेकिन असल में कांग्रेस (Congress) इन दोनों की सक्रियता के कारण ही सक्रिय भी लगती है। प्रदेश में तीसरा कोई नेता ऐसा नहीं है कि जिसका व्यापक प्रभाव हो। इसीलिए, जब भी अशोक गहलोत और सचिन पायलट एक मंच पर दिखाई देते हैं, राजस्थान कांग्रेस (Rajasthan Congress) कार्यकर्ताओं में नई ऊर्जा का संचार होने लगता है। राहुल गांधी (Rahul Gandhi) की हालिया कोटा यात्रा के दौरान दोनों नेताओं की मुस्कुराती तस्वीरें एक बार फिर चर्चा का विषय बनीं। लेकिन राजनीति के जानकार मानते हैं कि तस्वीरों में दिखाई देने वाली निकटता और राजनीतिक वास्तविकताओं के बीच अक्सर लंबी दूरी होती है।
कांग्रेस की राजनीति का केंद्र हैं गहलोत और पायलट
राजस्थान कांग्रेस में आज भी सबसे अधिक जनस्वीकार्यता रखने वाले दो चेहरे अशोक गहलोत और सचिन पायलट ही हैं। गोविंद सिंह डोटासरा भले ही प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष हैं और टीकाराम जूली विपक्ष के नेता। लेकिन दोनों पद से नेता है, कद से नहीं, इस सच को वे खुद भी जानते हैं। एक ओर गहलोत का पांच दशक से अधिक का राजनीतिक अनुभव है, तो दूसरी ओर पायलट नई पीढ़ी के कांग्रेस नेतृत्व का सबसे बड़ा चेहरा हैं। कांग्रेस के दिग्गज नेता और राजस्थान के पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने केंद्र सरकार में तीन अलग-अलग प्रधानमंत्रियों – इंदिरा गांधी, पीवी नरसिम्हा राव और राजीव गांधी के नेतृत्व में मंत्री के रूप में कार्य किया है। राजनीति में अपने लंबे सफर में, गहलोत ने तीन बार राजस्थान के मुख्यमंत्री के रूप में भी प्रदेश का नेतृत्व किया है। वे 6 बार विधायक और पांच बार सांसद रहे हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा और नेता प्रतिपक्ष टीकाराम जूली अपनी भूमिकाएं निभा रहे हैं, लेकिन प्रदेश की राजनीति में कांग्रेस का वास्तविक जनाधार और राजनीतिक विमर्श अभी भी गहलोत और पायलट के इर्द-गिर्द ही घूमता है। राजस्थान में कांग्रेस के सामने सबसे बड़ा प्रश्न यह नहीं है कि गहलोत और पायलट साथ दिखते हैं या नहीं।

गहलोत और पायलट कांग्रेस की मजबूरी भी, ताकत भी
राजस्थान कांग्रेस की राजनीति केवल दो नेताओं की व्यक्तिगत प्रतिस्पर्धा नहीं, बल्कि अनुभव और महत्वाकांक्षा, परंपरा और परिवर्तन, तथा वर्तमान और भविष्य के नेतृत्व के बीच संतुलन की कहानी भी है। वरिष्ठ राजनीतिक संपादक त्रिभुवन (Tribhuvan) का कहना है कि गहलोत और पायलट की राजनीति को केवल प्रतिद्वंद्विता के नजरिए से नहीं देखा जाना चाहिए। दोनों अलग-अलग सामाजिक, क्षेत्रीय और पीढ़ीगत समूहों का प्रतिनिधित्व करते हैं। त्रिभुवन कहते हैं कि कांग्रेस की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि वह इन दोनों राजनीतिक धाराओं को किस हद तक एक कर पाती है। राजस्थान की राजनीति पर लंबे समय से नज़र रखने वाले राजनीतिक विश्लेषक निरंजन परिहार (Niranjan Parihar) का मानना है कि गहलोत और पायलट दोनों कांग्रेस की मजबूरी भी हैं और ताकत भी। यदि दोनों साथ रहते हैं तो कांग्रेस मजबूत दिखाई देती है, लेकिन यदि मतभेद खुलकर सामने आते हैं तो उसका सीधा लाभ भाजपा को मिलता है। परिहार कहते हैं कि कांग्रेस की सबसे बड़ी चुनौती बीजेपी नहीं, बल्कि अपने कार्यकर्ताओं के भीतर भरोसा पैदा करना है। राजस्थान के वरिष्ठ राजनीतिक पत्रकार अरविंद चोटिया (Arvind Chotia) के अनुसार, किसी भी राजनीतिक दल के लिए दो परस्पर विरोधी नेताओं के मेलजोल की तस्वीरों से अधिक महत्वपूर्ण संगठनात्मक फैसले होते हैं। यदि टिकट वितरण, संगठन विस्तार और विपक्ष की राजनीति में दोनों नेताओं की भूमिका संतुलित रहती है, तभी कार्यकर्ताओं में वास्तविक एकजुटता का संदेश जाएगा। चोटिया कहते हैं कि कांग्रेस का कार्यकर्ता तभी उत्साहित होगा जब उसे लगेगा कि पार्टी नेतृत्व किसी आंतरिक संघर्ष में नहीं उलझा है। लेकिन ऐसा होना आसान नहीं है, यही कांग्रेस की मुश्किल है।
तस्वीरों की मुस्कान और सियासत का गणित
राजनीति में मुस्कानें हमेशा रिश्तों की गहराई का प्रमाण नहीं होतीं। कई बार वे रणनीति का हिस्सा भी होती हैं। राजस्थान कांग्रेस में यह बात और अधिक महत्वपूर्ण हो जाती है क्योंकि पिछले कुछ वर्षों में गहलोत और पायलट के बीच सार्वजनिक मतभेद राष्ट्रीय स्तर तक चर्चा का विषय रहे हैं। ऐसे में, असली सवाल यह है कि क्या दोनों नेता पार्टी की राजनीतिक रणनीति, संगठनात्मक विस्तार और आगामी चुनावी तैयारी में समान दिशा में काम कर पाएंगे। राजनीतिक पर्यवेक्षकों के अनुसार, कांग्रेस नेतृत्व यह अच्छी तरह समझता है कि राजस्थान में भाजपा का मुकाबला तभी प्रभावी ढंग से किया जा सकता है, जब पार्टी के दोनों बड़े नेता कम से कम सार्वजनिक तौर पर एकजुट दिखाई दें। यही कारण है कि कांग्रेस का केंद्रीय नेतृत्व समय-समय पर संगठनात्मक संतुलन बनाए रखने की कोशिश करता रहा है। कांग्रेस कार्यकर्ता लंबे समय से इस बात का इंतजार कर रहा है कि तस्वीरों की मुस्कान राजनीतिक व्यवहार में भी दिखाई दे। क्योंकि कार्यकर्ता जानता है कि केवल मंच साझा करने से चुनाव नहीं जीते जाते, बल्कि साझा लक्ष्य और साझा रणनीति से जीत का रास्ता बनता है।

संगठन में एकता कांग्रेस की सबसे बड़ी चुनौती
राजस्थान में अगला विधानसभा चुनाव अभी दूर है, लेकिन राजनीतिक तैयारी अभी से शुरू हो चुकी है। भाजपा सत्ता में है और कांग्रेस विपक्ष की भूमिका में। ऐसे में कांग्रेस के लिए सबसे महत्वपूर्ण काम संगठन को मजबूत करना और नेतृत्व के बीच सामंजस्य स्थापित करना होगा। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि अशोक गहलोत का अनुभव और सचिन पायलट की ऊर्जा एक साथ काम करती है, तो कांग्रेस राजस्थान में मजबूत चुनौती पेश कर सकती है। लेकिन यदि तस्वीरों की मित्रता केवल राजनीतिक औपचारिकता तक सीमित रही, तो पार्टी को संगठनात्मक स्तर पर नुकसान उठाना पड़ सकता है। राजस्थान की राजनीति में तस्वीरें हमेशा चर्चा पैदा करती हैं, लेकिन चुनावी नतीजे तस्वीरों से नहीं, राजनीतिक विश्वास से तय होते हैं। गहलोत और पायलट की हालिया मुलाकात ने कांग्रेस कार्यकर्ताओं को उत्साहित जरूर किया है, लेकिन असली परीक्षा अभी बाकी है। क्योंकि राजनीति में हाथ मिलाने से ज्यादा महत्वपूर्ण दिल मिलाना होता है। और जब दिल मिलते हैं, तभी संगठन मजबूत होते हैं, कार्यकर्ता उत्साहित होता है और जनता का विश्वास लौटता है।
– राकेश दुबे (वरिष्ठ पत्रकार)
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