– निरंजन परिहार
नई दिल्ली का जंतर-मंतर। कई बदलावों का गवाह। सरकारें बदलीं। नारे बदले। मांगें बदलीं। चेहरे बदले। अनशन और आंदोलनों के तौर बदले और तरीके भी बदले। माना कि समय बहुत कुछ बदल देता है। लेकिन कॉक्रोच जनता पार्टी के (CJP Protest) प्रदर्शन () के दौरान जो शर्मनाक बदलाव दिखा, उसने सबको ठिठका दिया। विरोध के मंच पर तर्क कम थे और तेवर ज़्यादा। नारे कम थे, गालियां ज़्यादा। भावनाएं कम थीं, भद्दे इशारे ज्यादा थे। कॉक्रोच जनता पार्टी (CJP) के प्रदर्शन की सामग्री भी अंतरंग अंगों से आजाद होकर निकली हुई थी। सबसे ज़्यादा हैरानी हुई, जब छोटी-छोटी उम्र की लड़कियां भी कैमरों के सामने बेशर्मी से गंदी गंदी गालियां बकती दिखीं। हाथों में ऐसे पोस्टर, जिन्हें सभ्य समाज में ज़ोर से पढ़ना भी शर्मनाक लगे। सोशल मीडिया (Social Media) पर छा जाने की भूख में, कैमरे चालू होते ही कुछ चेहरों पर मानो अभिनय हावी हो जाता। जितनी गंदी गालियां, उतनी ही ज्यादा तालियां। जितनी शर्मनाक शब्दावली, उतनी ज़्यादा चर्चा। और जितने बेशर्म इशारे, इतने ही ज्यादा दर्शक। यही विरोध का नया पैमाना शा, कॉक्रोच जनता पार्टीं के आंदोलन का। सीजेपी के प्रदर्शन में ज्यादातर लड़कियों के प्लेकार्ड्स पर जो लिखा था, और वीडियो में कई लड़कियों ने जो कहा था,था, वह इतना शर्मानाक और अश्लील है कि हम न सुना सकते, न दिखा सकते। आप चाहें, तो सोशल मीडिया पर सुन सकते हैं।
किसी भी आंदोलन में इतनी गंदी गालियां पहली बार
तो, क्या अब आंदोलनों की सफलता इससे तय होगी कि किसने सबसे गंदी गाली दी। किसने सबसे अश्लील इशारों से सनसनी पैदा की। जंतर मंतर ने इतनी गालियां, इतने अश्लील इशारे और इतनी बेशर्म हरकतें इससे पहले कभी नहीं देखी, कभी नहीं सुनीं। जंतर मंतर पर लेकिन कॉक्रोच जनता पार्टी का यह माहौल उसके प्रदर्शनकारियों के संस्कार और पारिवारिक विरासत का प्रतीक भी है। भारत की बेटियों की पहचान कभी ऐसी नहीं रही। इस देश की बेटियों ने सीमा पर वर्दी पहनकर सम्मान कमाया है। विज्ञान में खुद को रोशन किया है। खेलों में तिरंगा लहराया है। अदालतों में न्याय की लड़ाई लड़ी है। संसद में दमदार भाषण दिए और विरोध प्रदर्शन में भी शालीनता से खुद को गरिमामयी बनाया है। उन्होंने अपनी बात ताकत से रखी, लेकिन अपनी गरिमा छोड़े बिना। यही तो स्त्री की असली ताकत रही है। इसलिए जब कॉक्रोच जनता पार्टी के आंदोलन में नौजवान होती पीढ़ी की लड़कियां अश्लील इशारे, गंदी गालियां, हल्की हरकतें, और अंतर्वासना जैसी आवाजों से आंदोलन की आरती उतारती दिखाई देती हैं, तो सवाल केवल राजनीति पर नहीं उठता। सवाल समाज पर उठता है, उनके संस्कारों पर उठता है और परिवार की परंपरा से भी जुड़ता है।
जितनी गंदी भाषा, उतने ही अधिक लाइक्स और व्यूज़
कैमरे के सामने खड़े होकर जो कहा जाता है, वह केवल वहीं नहीं रह जाता। वह मोबाइल की स्क्रीन से होकर घर तक पहुंचता है। मां-बाप तक जाता है। भाई-बहनों के निगाहों से गुजरता है। रिश्तेदारों के कानों में भी गूंजता है। शिक्षक उसे देखते हैं और पड़ोसी भी सुनते हैं। तब मन में एक प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि क्या यही अभिव्यक्ति का आदर्श है? लोकतंत्र में असहमति का अधिकार है। होना भी चाहिए। सत्ता से सवाल पूछिए। नीतियों का विरोध कीजिए। सड़क पर उतरिए। लेकिन विरोध में भाषा की सीमाएं सार्वजनिक तौर पर मां – बहन की गालियों और घटिया इशारों के साथ अश्लील इशारों पर पहुंचे, तो संस्कारों की बात भी होती है। जिस दिन गाली तर्क की जगह ले लेती है, अश्लील नारे और गंदे इशारे विरोध की बुलंदी के स्वर बनते हैं और व्यक्ति विरोध की जिद किसी की मां – बहन के अंगों की विकृत व्याख्या ही जब उसके अपमान का पैमाना बन जाए, तो बहस उसी दिन हार जाती है। सोशल मीडिया एक नई बीमारी है। कैमरा देखते ही कुछ लोग संवाद नहीं, प्रदर्शन करने लगते हैं। जितनी गंदी भाषा, उतने ही अधिक लाइक्स और व्यूज़। जितनी शर्मनाक शैली, उतनी ज़्यादा वायरल क्लिप। मानो शालीनता अब आउटडेटेड हो गई हो। यह प्रवृत्ति चिंताजनक है।
विरोध सभ्य शालीन हो, ताकि अगली पीढ़ी शर्मिंदा न हो
राजनेताओं और राजनीतिक विरोध के आयोजकों को भी सोचना होगा, उनके समर्थकों को भी। और सहभागियों को भी। यदि मांगों से ज़्यादा उसकी भाषा आंदोलन की पहचान बनने लगे, तो समझिए कि संदेश पीछे छूट गया और शोर आगे निकल गया। आंदोलन इतिहास बदलते हैं। लेकिन इतिहास उन्हें याद रखता है, जिन्होंने समाज को जोड़ा। उन्हें नहीं, जिन्होंने केवल गोलियों का शोर पैदा किया। लोकतंत्र की खूबसूरती यह है कि विरोध की आवाज़ दबाई नहीं जानी चाहिए। लेकिन लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत यह भी है कि विरोध सभ्य हो, संयमित हो और ऐसा हो, जिसे देखकर अगली पीढ़ी सीखे, शर्मिंदा न हो। भारत की बेटियां शक्ति का प्रतीक हैं और संस्कार का भी। आत्मविश्वास का भी और अगली पीढ़ी के निर्माण का भी। उनसे समाज की अपेक्षा केवल साहस की नहीं, गरिमा की भी रहती है। गाली से गलत लोगों की तालियां मिल सकती हैं, सम्मान नहीं। अश्लील इशारों और बेशर्म बवालों से कुछ पल की प्रसिद्धि मिल सकती है, विश्वसनीयता नहीं।
कॉक्रोच जनता पार्टी के आंदोलन में बेशर्मी की हद
आंदोलन में गरिमा टूट जाए और मर्यादा छूट जाए, वहां सबसे पहले उसी आंदोलन की नैतिक ताकत कमज़ोर पड़ती है। विरोध कीजिए, पूरे अधिकार से कीजिए। लेकिन याद रखिए कि लोकतंत्र की आवाज़ जितनी बुलंद हो, उसकी भाषा उतनी ही गरिमामयी होनी चाहिए। क्योंकि, समय सोशल मीडिया का है। अब शब्द केवल उसी दौर में, उसी जगह, उसी पल सुने नहीं जाते। वे बरसों – बरस सुनाई देते हैं, पीछा करते कृरहते हैं और सदा के लिए सामने खड़े रहते है। कॉक्रोच जनता पार्टी के आंदोलन में जो गलियां बोली गईं, अश्लील इशारों के साथ प्रदर्शन किया गया और अंतरंग अंगों की छुपाई जाने वाली सामग्री को शर्मनाक तरीके से प्रदर्शित किया गया, वह सचमुच बेशर्मी की हद है। लेकिन लगता है, इस नए समाज की नई पीढ़ी का नया चरित्र भी यही हैं। और अगर यही असल चरित्र है, तो हमारी अगली पीढ़ी का भविष्य क्या होने जा रहा है, यह तय होना मुश्किल है। तय यह भी होना मुश्किल है कि गंदी गालियां, भद्दे इशारे और बेशर्मी बयान करती बालाएं अपना खुद का क्या भविष्य गढ़ रही हैं, यह वे ही जाने!
(लेखक निरंजन परिहार राजनीतिक विश्लेषक हैं)
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