80sTrend: सोशल मीडिया का दौर है। इस दौर में कुछ भी चल जाता है, तो फिर पुरानी यादों का तो अपना अलग ही आलम होता है, वह क्यों न चले। इसीलिए इन दिनों 80’s की बयार (80’sTrend) क्या चली, लगता है जैसे वक्त ने अचानक अपनी घड़ी की सुइयाँ पीछे घुमा दी हों। पुराने रंग फिर से खिल उठे हैं, बीते दौर के अंदाज़ फिर जवान हो गए हैं और फैशन की बंद अलमारियों में बरसों से रखी यादें एक बार फिर बाहर निकल आई हैं। सोशल मीडिया (Social Media) पर वही हेयरस्टाइल, वही चश्मे का अंदाज़, वही कपड़ों की ठसक, वही पुराने रंग और वही तस्वीरों में उस दौर को फिर से जी लेने की कोशिश… हर कोई उस दौर में दिखने को बेताब सा है। सियसत के सितारों से लेकर ग्लैमर की चककाचौंध वाली दुनिया के दीवानों सहित साधाराण घर परिवार वाले गांव – गली और मोहल्ले के लोग भी 80 के दौर में दिखने की चाहत में एआई में घुसे पड़े हैं। मगर, इसी दौर में कुछ लोग अस्सी के दशक की असली तस्वीरें भी साझा कर रहे हैं, उनको भी काफी सराहा जाने लगा है।
बीता लक्त लौट कर फिर आ गया
इस दौर का सच कहें तो इसमें बुराई भी क्या है? कुछ दौर सिर्फ कैलेंडर के पन्नों पर नहीं होते, वे हमारी स्मृतियों में बसे होते हैं। कोई पुराना गीत बजता है तो अचानक मन कहीं दूर निकल जाता है। किसी पुराने कपड़े का रंग आंखों के सामने आता है तो बचपन की कोई तस्वीर याद आ जाती है। किसी पुराने अंदाज़ में सजी तस्वीर देखकर लगता है जैसे बरसों पहले का कोई दरवाजा फिर खुल गया हो। बीता हुआ समय लौटकर तो नहीं आता, लेकिन उसकी खुशबू जरूर लौट सकती है। इसलिए 80’s को जीजिए, सजिए, संवरिए, पुराने गीतों पर झूमिए और उन दिनों की यादों को आज की जिंदगी में फिर से जगह दीजिए। मगर इस पूरे उत्सव के बीच एक सवाल मन के किसी कोने में धीरे से दस्तक देता है कि इस दौर के असलियत में हम खुद कहां हैं?

अपनी तस्वीरों में, हम दूसरों के जैसे
सोशल मीडिया का भी अपना एक मौसम है। किसी एक चेहरे पर कोई नया अंदाज़ दिखाई देता है और देखते ही देखते वही अंदाज़ सैकड़ों चेहरों पर उतर आता है। किसी ने एक हेयरस्टाइल अपनाया, किसी ने वैसा ही पोज दिया, किसी ने वही चश्मा लगाया और किसी ने वही रंग पहन लिया। फिर लगता है, जैसे हम सब अपनी-अपनी तस्वीरों में हैं, मगर तस्वीरें एक-दूसरे जैसी होती जा रही हैं। कितना अजीब है न? हम अलग दिखने के लिए सजते हैं और कभी-कभी उसी कोशिश में सब एक जैसे दिखने लगते हैं। फैशन की अपनी खूबसूरती है। ट्रेंड का अपना आकर्षण है। लेकिन क्या खूबसूरत दिखने के लिए हमें किसी और जैसा दिखना जरूरी है? शायद नहीं। क्योंकि असली खूबसूरती उस चेहरे की नहीं, जिसे देखकर लोग कहें – “कितना ट्रेंडिंग है! असली खूबसूरती तो उस चेहरे की है, जिसे देखकर कोई अपना कह उठे – “ये तो बिल्कुल वैसा ही है, जैसा हमेशा से था।”
ट्रैंडिंग में बहुत कुछ, मगर जीवन में कहां
हमारी तस्वीरें केवल हमारा चेहरा नहीं सहेजतीं, वे हमारा समय सहेजती हैं। उनमें हमारे जीवन की आवाजें, रिश्तों की गर्माहट, हंसी के वे बेफिक्र क्षण और उन दिनों की धड़कनें छिपी रहती हैं। इसलिए जब अगली बार कोई तस्वीर खिंचे, तो उसमें सिर्फ फैशन मत रखिए—अपनी कोई कहानी भी रखिए। मां के साथ बैठी वह शाम, बहनों के साथ हुई बेवजह की हंसी, दोस्तों के साथ बिताया कोई यादगार दिन, परिवार के साथ चाय की वह छोटी-सी महफिल, किसी पुराने गीत पर अचानक थिरकते कदम या फिर वह तस्वीर जिसमें बाल बिखरे थे, कपड़े साधारण थे, मगर चेहरे पर मुस्कान बिल्कुल सच्ची थी। यही तो वे पल हैं, जिन्हें बरसों बाद देखकर आंखें नम भी होती हैं और होंठों पर मुस्कान भी आ जाती है। जीवन के सबसे खूबसूरत पल कभी ट्रेंडिंग नहीं होते। वे बस हमारे होते हैं।

असली तस्वीर का अपना एक खास सच
जमाना सोशल मीडिया का है और उसकी सच केवल यही है कि आज हम लाइक्स, कमेंट्स और ट्रेंड्स के बीच अपनी पसंद तलाश रहे हैं। कौन-सा लुक अच्छा लगेगा, कौन-सा पोज तस्वीर को बेहतर बनाएगा, किस अंदाज़ में ज्यादा प्रतिक्रिया मिलेगी—इन सवालों में कहीं हमारी अपनी सहजता पीछे छूट जाती है। हम भूल जाते हैं कि कभी-कभी बिना किसी फिल्टर की तस्वीर सबसे ज्यादा खूबसूरत होती है। बिना तैयारी की हंसी सबसे ज्यादा सच्ची होती है। और बिना किसी ट्रेंड के अपने जैसा दिखना—शायद सबसे बड़ी खूबसूरती है। इसलिए 80’s को अपनाइए। खूब अपनाइए। पुराने रंग पहनिए, पुराने गीत सुनिए, पुराने अंदाज़ में तस्वीरें खिंचवाइए और उस दौर की यादों को फिर से जी लीजिए। मगर किसी और की परछाईं बनकर नहीं अपने रंग में।
असलीपन की कोई एक्सपायरी डेट नहीं
लेकिन दौर तो दौर है, वह तो आता रहेंगे, जाते रहेंगे और बदलते रहेंगे। आज 80’s है, कल 90’s होगा और फिर कोई नया दौर हमारी उंगलियां पकड़कर हमें अपनी ओर ले जाएगा। फैशन आएगा, छाएगा और फिर चला जाएगा। लेकिन हमारी अपनी हंसी, हमारी अपनी बोली, हमारी अपनी पसंद, हमारे रिश्ते और हमारी यादें—ये किसी ट्रेंड की मोहताज नहीं। इन्हें बचाकर रखिए। क्योंकि आखिर में जब सारी चमक फीकी पड़ जाएगी, जब ट्रेंड पुराने हो जाएंगे और सोशल मीडिया की तस्वीरें धुंधली पड़ जाएंगी, तब खुद जैसा बने रहना ही असली हुनर लगेता। और शायद जिंदगी की सबसे बड़ी खूबसूरती भी यही है, क्योंकि फैशन की उम्र होती है, ट्रेंड की तारीख होती है, मगर असलीपन की कोई एक्सपायरी डेट नहीं होती। यही हमारी पहचान है। यही हमारी कहानी है। और सच पूछिए तो—यही हमारी सबसे अनमोल पूंजी है।
– निरंजन परिहार
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