Kriti Sanon Ad: सवाल सिर्फ रक्षाबंधन के विज्ञापन में अंग प्रदर्शन का नहीं है। सवाल यह है कि बाजार आखिर कब तक शरीर को ‘सेलिंग पॉइंट’ मानता रहेगा? रक्षाबंधन भाई-बहन के रिश्ते का त्योहार है। इसमें भाव है, अपनापन है, स्मृति है और भारतीय पारिवारिक संस्कृति की एक गहरी तस्वीर है। लेकिन इसी त्योहार के लिए बनाए गए विज्ञापन से अभिनेत्री कृति सेनन (Kriti Sanon) अचानक विवाद के केंद्र में आ गई। विवाद इतना बढ़ा कि ज्वेलरी ब्रांड ‘गीवा’ को अपना विज्ञापन सभी माध्यमों से वापस लेना पड़ा। विज्ञापन में कृति इंडो-वेस्टर्न परिधान में दिखाई दीं। जिसमें उसका वक्षस्थल स्पष्ट प्रदर्शित हो रहा है। एक ओर उसके कपड़ों को लेकर आपत्ति हुई, दूसरी ओर विज्ञापन में पालतू कुत्ते को राखी बांधने के दृश्य ने भी बहस को जन्म दिया। यहीं से असली सवाल शुरू होता है। समाज शास्त्री डॉ विजय शर्मा, फिल्म जगत के चर्चित पत्रकार चंद्रकांत शिंदे, लेखिका डॉ मीना सिंह, राजनीतिक विश्लेषक निरंजन परिहार और सामाजिक कार्यकर्ता दीपा सिंह जैसे विभिन्न क्षेत्रों के नामी लोगों से हमने इस मुद्दे पर बातचीत की और जाना कि आखिर इस तरह के अंग प्रदर्शन वाले विज्ञापनों के लिए कोई अभिनेत्री दोषी है, निर्माता दोषी है या विज्ञापन का बाजार? इस लेख में इसी की पड़ताल –
आधुनिकता का अर्थ अंग प्रदर्शन नहीं होता
दृश्य माध्यमों में महिलाओं को अक्सर देखने वाले पुरुष की नजर से प्रस्तुत किया जाता है। यानी महिला स्वयं एक सक्रिय चरित्र होने के बजाय दिखने की वस्तु बन जाती है। यह विचार विज्ञापन और दूसरे दृश्य माध्यमों के विश्लेषण में भी इस्तेमाल होता रहा है। सिनेमा और विज्ञापनों में स्त्री शरीर को ग्लैमर की दुनिया में आकर्षण के साधन के रूप में इस्तेमाल किया जाता हैं। हमने देखा है कि दुनिया भर के सिनेमा और विज्ञापनों में महिला शरीर को अक्सर देखे जाने और प्रदर्शित की जाने वाली वस्तु के रूप में फ्रेम किया जाता है। समाज शास्त्री डॉ विजय शर्मा कहते हैं कि विवाद केवल भारत का या कृति सेनन अकेली का नहीं है। यह उस पूरी विज्ञापन संस्कृति का सवाल है जिसमें शरीर कभी-कभी उत्पाद से ज्यादा बड़ा विज्ञापन बन जाता है। डॉ शर्मा कहते हैं कि आधुनिकता का अर्थ हमेशा अधनंगापन या अंगद प्रदर्शन तो कतई नहीं होता। कभी – कभी बाजार आधुनिकता की भाषा में पुराने दबावों को नए रूप में बेचता है। पहले कहा जाता था कि सुंदर बनो। अब कहा जाता है कि ग्लैमरस बनो। पहले कहा जाता था कि दिखो। अब कहा जाता है कि दिखाओ, और डिजिटल बाजार कहता है कि वायरल हो जाओ।

क्या नारी शरीर उत्पाद बेचने का साधन बन गया
कृति सेनन के इस विवादास्पद विज्ञापन को सांसद – अभिनेत्राी कंगना रणौत ने विरोध किया, तो कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने समर्थन करते हुए कहा कि कोई महिला क्या पहने, यह उसकी स्वतंत्रता है और उसके लिए उसे ट्रोल नहीं किया जाना चाहिए। विज्ञापन समर्थकों का भी कहना है कि कपड़े संस्कृति का प्रमाणपत्र नहीं होते। कृति सेनन ने भी आलोचना के जवाब में यही तर्क रखा। उन्होंने कहा कि त्योहार का सार कपड़ों में नहीं, बल्कि उससे जुड़े भाव और परंपरा में है। कृति ने यह सवाल भी उठाया कि महिलाओं को यह बताना कब बंद होगा कि उन्हें क्या पहनना चाहिए। तर्क महत्वपूर्ण है लेकिन किसी धार्मिक या सांस्कृतिक पर्व की दृश्य भाषा पर सवाल उठाना भी अपने आप में गलत नहीं है। आखिर राखी बांधते हुए किसी बहन को अपना प्रेदम प्रदर्शित करते हुए वक्षस्थल भी दिखाने की जरूरत क्या है। लंबे समय तक फिल्म जगत के चर्चित पत्रकार रहे चंद्रकांत शिंदे कहते हैं कि रक्षाबंधन कोई एक फैशन थीम नहीं है। यह करोड़ों भाई – बहनों के भावनात्मक जीवन से जुड़ा त्योहार है। इसलिए विज्ञापन निर्माता ने अपनी क्रिएटिव स्वतंत्रता और सांस्कृतिक संवेदनशीलता को बीच की महीन रेखा को समझा होता, तो यह विवाद ही नहीं होता। शिंदे कहते हैं कि यह सही है कि सिनेमा और विज्ञापनों में महिला शरीर को अलग अलग तरीकों से प्रस्तुत करने और उन्हें उत्पाद बेचने के साधन में बदल दिया गया है। और कृति सेनन के इस विज्ञापन विवाद की सबसे महत्वपूर्ण परत भी यही है।
कलाकार बाजार के माहौल का हिस्सा बन जाते हैं
इस सबके बीच सवाल यह भी है कि अभिनेत्रियां आखिर ऐसे विज्ञापनों के लिए तैयार क्यों हो जाती हैं? इस सवाल का जवाब केवल उससे होने वाली कमाई में नहीं है। विभिन्न विषयों पर कई पुस्तकों की लेखिका डॉ मीना सिंह कहती हैं कि ग्लैमर उद्योग में किसी भी अभिनेत्री की सार्वजनिक छवि उसके करियर की पूंजी होती है। ग्लैमरस दिखना, फैशन के साथ चलना, आधुनिक दिखाई देना और कैमरे पर आकर्षक लगना इस उद्योग की पेशेवर मांगों का हिस्सा है। इसी कारण, कई बार कलाकार उस माहौल का हिस्सा बन जाते हैं, जिसे बाजार ने पहले से तैयार कर रखा है। डॉ मीना सिंह कहती हैं कि मनोरंजन और विज्ञापन उद्योग ने महिलाओं के सामने सफलता की ऐसी छवि बना दी है जिसमें सुंदर दिखना और शरीर दिखाना लगभग पेशेवर अनिवार्यता जैसा महसूस होने लगता है? यही वह मोड़ है जहां समाजशास्त्र विज्ञापन को केवल फैशन नहीं मानता।

विज्ञापन पर राजनीति से लेकर हर तरफ चर्चा
विवाद तब और तेज हुआ जब अभिनेत्री और भाजपा सांसद कंगना रनौत ने विज्ञापन के परिधान पर तीखी टिप्पणी की। इसके बाद कृति ने अपने बचाव में जवाब दिया और राहुल गांधी के समर्थन से बहस राजनीतिक रंग में भी पहुंच गई। राजनीतिक विश्लेषक निरंजन परिहार कहते हैं कि इस पूरे प्रकरण ने एक दिलचस्प स्थिति पैदा कर दी। एक तरफ था – मेरा शरीर, मेरी पसंद। दूसरी तरफ थी त्योहार की मर्यादा और बीच में खड़ा रहा बाजार। निरंजन परिहार कहते हैं कि सबसे महत्वपूर्ण यही बाजार है, क्योंकि हर विवाद में सबसे ज्यादा फायदा भी बाजार को ही होता है। अब विज्ञापन हट गया है लेकिन उसकी चर्चा देशभर में हो गई। लोगों ने वीडियो खोजे, स्क्रीनशॉट शेयर किए, कमेंट किए, बहस की। समर्थन किया, विरोध किया। राजनेता बोले और अभिनेत्री बोलीं। परिहार की बात सही है कि विज्ञापन वापस लेने के बावजूद चर्चा में रह गया। लेकिन समाज शास्त्रियों का सबसे बड़ा सवाल यह है कि स्त्री को कब तक लोग सिर्फ ‘शरीर’ मानते रहेंगे? उनका सवाल यह भी है कि क्या प्रतिभा, व्यक्तित्व और रचनात्मक क्षमता को बेचने के लिए नारी के शरीर का सहारा लेना अनिवार्य है?
सौंदर्य, ग्लैमर और शरीर विज्ञापन में बार-बार इस्तेमाल
अभिनेत्री के कपड़ों और उसके अंगप्रदर्शन पर नैतिकता की बात आसान है। लेकिन असली पड़ताल इससे कहीं आगे जाती है। सामाजिक कार्यकर्ता दीपा सिंह कहती हैं कि माना कि एक अभिनेत्री किसी विज्ञापन में अकेले निर्णय नहीं लेती। उसके पीछे ब्रांड होता है। विज्ञापन एजेंसी होती है। क्रिएटिव टीम होती है। स्टाइलिस्ट होता है। फोटोग्राफर होता है। निर्देशक होता है। मार्केटिंग टीम होती है। कानूनी सलाहकार होते हैं। और अंत में ब्रांड की मंजूरी होती है। लेकिन कपड़े तो आखिर वही पहनती हैं, इसलिए यह सवाल उस अभिनेत्री से इसीलिए किया जाता है कि उसने ऐसे कपड़े क्यों पहने। और यहीं विज्ञापन की अर्थव्यवस्था सामने आती है। दीपा सिंह कहती हैं कि आज विज्ञापन का पहला लक्ष्य केवल उत्पाद दिखाना नहीं है। पहला लक्ष्य है, उस विज्ञापन पर पर दर्शक की नजर रोकना। नजर रुकी तो दर्शक रुकेगा। दर्शक रुका तो संदेश पहुंचेगा। संदेश पहुंचा तो ब्रांड याद रहेगा। और ब्रांड याद रहा तो बिक्री की संभावना बढ़ेगी। दीपा सिंह कहती हैं कि यही कारण है कि सौंदर्य, ग्लैमर और शरीर विज्ञापन में बार-बार इस्तेमाल होते हैं। लेकिन सवाल यह सदा बना रहेगा कि भारतीय ब्रांड के बाजार में महिला की देह कब तक सबसे आसान भाषा बनी रहेगी?
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आकांक्षा कुमारी
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