Rajasthan Nikay Chunav 2026: राजस्थान में शहरी निकाय चुनाव के दोनों चरण पूरे हो चुके हैं। लेकिन उन चुनावों को सिर्फ पार्षद चुनने का चुनाव समझना राजनीतिक भूल होगी। राजस्थान (Rajasthan) में यह चुनाव सत्ताधारी दर बीजेपी (BJP) और प्रमुख विपक्षी पार्टी कांग्रेस (Congress) के लिए 2028 विधानसभा चुनाव का सेमीफाइनल है। ये चुनाव मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा (Bhajanlal Sharma) के लिए उनकी सरकार के कामकाज का रिपोर्ट कार्ड है। पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत (Ashok Gehlot) के लिए अपने राजनीतिक प्रभाव का इम्तिहान। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा (Govind Singh Dotasra) के लिए संगठन और नेतृत्व की परीक्षा। बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष मदन राठोड़ (Madan Rathore) के लिए उनके राजनीतिक कद को संवारने की जंग। और बीजेपी व कांग्रेस दोनों ही पार्टियों में टिकट से वंचित नेताओं के लिए अपनी राजनीतिक जमीन बचाने की लड़ाई। चुनाव में 4,852 वार्डों के लिए 18,266 उम्मीदवार मैदान में रहे और कुल मतदान 72.95 प्रतिशत रहा। जनता ने राजस्थान निकाय युनाव 2026 (Rajasthan Nikay Chunav 2026) के लिए अपना फैसला ईवीएम में बंद कर दिया है। राजस्थान की राजनीति (Rajasthan Politics) में अब 14 सितंबर को नतीजे बताएंगे कि राजस्थान के शहरों की राजनीतिक हवा मुख्यमंत्री शर्मा और प्रदेश बीजेपी अध्यक्ष राठोड़ की हवा खराब करती है या उनकी राजनीति को मजबूती देती है।
भजनलाल काे टेस्ट में सभी नेता सक्रिय रहे
मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा इस चुनाव में काफी सक्रिय दिखे, जगह जगह रोड़ शो भी उन्होंने किए, क्योंकि उनके लिए यह चुनाव बेहद महत्वपूर्ण है। सरकार में आए बीजेपी सरकार को पौने तीन साल से ज्यादा वक्त हो गया है। अब सरकार के दावों और जनता की धारणा के बीच का अंतर चुनाव परिणाम बताएगा। बीजेपी की ताकत परंपरागत रूप से शहरी मतदाताओं में मानी जाती है। इसलिए जयपुर, जोधपुर, कोटा, उदयपुर, अजमेर और बीकानेर जैसे प्रमुख शहरों में प्रदर्शन मुख्यमंत्री के राजनीतिक कद का संकेत बनेगा। राजनीतिक विश्लेषक निरंजन परिहार का मानना है कि बीजेपी को व्यापक बढ़त मिली तो इसे बीजेपी की स्वीकार्यता माना जाएगा। लेकिन अगर कांग्रेस शहरी क्षेत्रों में वापसी करती है तो सरकार के खिलाफ स्थानीय असंतोष और संगठनात्मक कमजोरी की चर्चा तेज होगी। वरिष्ठ पत्रकार विवेक श्रीवास्तव कहते हैं कि बीजेपी ने इस बार का निकाय चुनाव लगभग युद्ध की तरह लड़ा। इस चुनाव में पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के अलावा मुख्यमंत्री शर्मा, प्रदेश अध्यक्ष मदन राठौड़, प्रभारी डॉ राधामोहन दास अग्रवाल, वरिष्ठ नेता राजेंद्र राठौड़ सहित सभी मंत्री, सभी प्रमुख नेता सक्रिय हुए। मुख्यमंत्री ने चुनाव प्रचार में सक्रिय भागीदारी की और रोड शो किए।
कांग्रेस के सामने संगठन की अग्निपरीक्षा
कांग्रेस की राजनीति में यह चुनाव प्रदेश अध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा के लिए सबसे अहम है। अशोक गहलोत चुनाव में सक्रिय नजर आए। उन्होंने बीजेपी सरकार पर सवाल उठाते हुए कहा कि राज्य में अपेक्षित काम नहीं हुआ। गहलोत की सक्रियता और उनके समर्थकों की स्थानीय पकड़ कांग्रेस के लिए महत्वपूर्ण हो सकती है। दूसरी ओर सचिन पायलट की सक्रियता अपेक्षाकृत सीमित रही। निकाय चुनावों के बीच ही पायलट को पंजाब जैसे चुनावी प्रदेश का प्रभारी बनाना भी उनके इधर ध्यान न देने के एक कारण रहा। लेकिन बीते 6 साल से भी ज्यादा वक्त से प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष पद पर आसीन डोटासरा हैं के लिए ये निकाय चुनाव निर्णायक हैं। राजनीतिक विश्लेषक निरंजन परिहार का मानना है कि कांग्रेस कितने वार्ड जीतती है, इससे ज्यादा महत्वपूर्ण यह होगा कि डोटासरा पार्टी के भीतर की गुटबाजी और टिकट से पैदा हुए असंतोष को कितना नियंत्रित कर पाए। वरिष्ठ पत्रकार विवेक श्रीवास्तव ने एक्स पर लिखा कि कांग्रेस ने निकाय चुनावों को स्थानीय स्तर के नेताओं के भरोसे रखा। पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत, महासचिव सचिन पायलट, पीसीसी चीफ डोटासरा, नेता प्रतिपक्ष टीकाराम जूली और हरीश चौधरी अपनी विधानसभा के निकाय छोड़कर कहीं नहीं गए।
बागी और निर्दलीय किंगमेकर संभव
निकाय चुनाव की राजनीति का दूसरा बड़ा चरित्र है निर्दलीय। वरिष्ठ पत्रकार जितेश चेठानंदानी कहते हं कि राजस्थान में विपक्ष इन निकाय चुनाव में कहीं खास नहीं नजर आया, हालांकि निर्दलीयों ने काफ़ी दम लगाया। जनता भी कुछ जगह निर्दलीयों के साथ नजर आयी। जयपुर जैसे बड़े शहरी क्षेत्र में निर्दलीय उम्मीदवारों की भारी संख्या ने दोनों पार्टियों की चिंता बढ़ाई है। यही कारण है कि चुनाव परिणाम से पहले ही कई जगह संभावित बोर्ड के गणित को लेकर राजनीतिक हलचल शुरू हो गई है। बीजेपी और कांग्रेस दोनों ने अपने उम्मीदवारों के साथ निर्दलीयों को भी साधने की कोशिश शुरू कर दी है। सभापति की कुर्सी के लिए समर्थन जुटाने का खेल परिणाम से पहले ही शुरू हो गया है। जयपुर में बीजेपी ने अपने प्रत्याशियों की बाड़ाबंदी तक शुरू कर दी है। घोषित उद्देश्य प्रशिक्षण और रणनीति बताया गया है, लेकिन राजनीतिक संदेश साफ है कि जीते हुए पार्षदों को परिणाम के बाद टूटने से बचाना। यानी असली चुनाव परिणाम के बाद भी जारी रह सकता है।
टिकट वितरण ने खोली दोनों दलों की पोल
बीजेपी और कांग्रेस दोनों में टिकट वितरण के दौरान विवाद सामने आए। कई जगह स्थानीय नेताओं और कार्यकर्ताओं के बीच तीखी झड़पों तक की खबरें आईं। कांग्रेस के भीतर भी टिकट वितरण में पारदर्शिता और स्थानीय पसंद को लेकर सवाल उठे। यानी दोनों दलों ने नए चेहरों पर दांव लगाया है। लेकिन नए चेहरों के साथ पुराने असंतोष को भी मैदान में छोड़ दिया। वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक अरविंद चोटिया मानते हैं कि “निकाय चुनाव में पार्टी का सिंबल भले ही महत्वपूर्ण है, लेकिन उम्मीदवार का व्यक्तिगत नेटवर्क उससे भी ज्यादा महत्वपूर्ण होता है। इसलिए बागी और निर्दलीय इस चुनाव में बीजेपी और कांग्रेस के वोट बैंक में सीधी सेंध लगा सकते हैं। राजनीति के जानकार वरिष्ठ पत्रकार जितेश जेठानंदानी का आकलन है कि अगर मुकाबला करीबी रहा तो जयपुर में बीजेपी का बोर्ड बन सकता है, लेकिन आंकलन के अनुसार बीजेपी कोस कुछ निर्दलीयों को साथ लेना पड़ेगा। उनके इस कथन से ये साफ हो जाता है कि जीत अंततः बागियों की ही होगी, क्योंकि वे अपनी ताकत का प्रदर्शन कर चिके और अगले चुनाव के लिए अपनी उपयोगिता साबित कर देंगे।”
अगले विधानसभा चुनाव की ताकत का अक्स
इस चुनाव की असली राजनीतिक अहमियत यहीं खत्म नहीं होती। इसके बाद पंचायत चुनाव होने हैं। यानी शहरों के बाद गांवों की राजनीतिक नब्ज भी सामने आएगी। अब यह दोनों पार्टी की रणनीति है, किसकी रणनीति सफल होगी यह परिणाम के दिन पता चलेगा। लेकिन बीजेपी निकाय और पंचायत दोनों में मजबूत प्रदर्शन करती है तो भजनलाल शर्मा का नेतृत्व 2028 की ओर मजबूत स्थिति में जाएगा। अगर कांग्रेस शहरी क्षेत्रों में बड़ा पलटवार करती है और पंचायत चुनाव में भी बढ़त बनाती है तो डोटासरा और कांग्रेस संगठन को नई ऊर्जा मिलेगी। और अगर बड़ी संख्या में निर्दलीय तथा बागी निर्णायक साबित हुए तो दोनों दलों के टिकट वितरण और संगठनात्मक रणनीति पर गंभीर सवाल खड़े होंगे। राजस्थान निकाय चुनाव यह बताएगा कि किस पार्टी का संगठन जमीन पर मजबूत है, किस नेता की व्यक्तिगत पकड़ बची है और या फिर किसके अपने ही उसके वोट काट रहे हैं। 14 सितंबर को ईवीएम खुलेंगी। परिणाम सामने आएंगे। लेकिन राजस्थान की राजनीति में असली सवाल तब भी खुला रहेगा कि भजनलाल शर्मा ने अपनी 2028 के विधानसभा चुनाव की राह मजबूत की या नहीं?
– आकांक्षा कुमारी
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