Girnar: तीर्थ स्थलों की पवित्र राह पर वन्यजीवों का खतरा अब अनदेखा करने लायक नहीं रहा। गिरनार (Girnar) तीर्थ पर दर्शन के लिए जा रहे 12 वर्षीय बालक की शेर के हमले में मौत ने देशभर के जैन (Jain) समाज को झकझोर दिया है। घटना के बाद सबसे बड़ा सवाल यही है कि घने जंगलों और पहाड़ों के बीच स्थित तीर्थों पर निहत्थे जा रहे श्रद्धालुओं की सुरक्षा आखिर किसकी जिम्मेदारी है? वन विभाग की, स्थानीय प्रशासन की या करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था का प्रबंधन करने वाले तीर्थ ट्रस्टों की? सम्मेत शिखर, पालीताणा और गिरनार जैसे जैन तीर्थों (Jain Temples) की यात्रा सामान्य धार्मिक भ्रमण नहीं है। यहां हजारों श्रावक-श्राविकाएं कठिन पहाड़ी रास्तों पर पैदल चलते हैं। जैन साधु-साध्वियों का विहार भी पूरी तरह पैदल होता है। लंबी चढ़ाई और धार्मिक परंपराओं के कारण कई श्रद्धालु सूरज निकलने से पहले अंधेरे में ही यात्रा शुरू कर देते हैं। हाथ में न कोई हथियार, न सुरक्षा साधन। दूसरी ओर यही समय जंगल में तेंदुओं (Leopard) हिंसक वन्यजीवों की गतिविधियों के लिहाज से संवेदनशील होता है।
घटना के बाद गश्त बढ़ाना कब तक समाधान?
जैन अग्रणियों के बीच अब तीर्थ सुरक्षा को लेकर गंभीर मंथन शुरू हो गया है। समाज के वरिष्ठ लोगों का कहना है कि हर हादसे के बाद कुछ दिन गश्त बढ़ाकर फिर पुराने ढर्रे पर लौटने की व्यवस्था बदलनी होगी। जैन अग्रणी तनसुख धारीवाल का कहना है कि तीर्थ ट्रस्टों को दर्शन, धर्मशाला और भोजनशाला की व्यवस्थाओं के साथ यात्री सुरक्षा को भी अपनी प्राथमिक जिम्मेदारी मानना होगा। धारीवाल ने कहा कि हम वन्यजीवों के खिलाफ नहीं हैं, लेकिन श्रद्धालुओं को खतरे के बीच अकेला भी नहीं छोड़ा जा सकता। धार्मिक मर्यादाओं के अनुरूप सुरक्षा का रास्ता निकालना होगा।” उनका सुझाव है कि तीर्थ मार्गों पर नाइट विजन कैमरे, वन्यजीव मूवमेंट सेंसर, चेतावनी अलार्म और प्रशिक्षित सुरक्षा दल तैनात किए जाएं। साधु-साध्वियों के विहार मार्गों के लिए भी वन विभाग के साथ विशेष सूचना तंत्र विकसित हो।

हादसे का इंतजार क्यों, पहले खतरे की पहचान हो
समाजसेवियों ने भी मौजूदा व्यवस्था पर सवाल उठाए हैं। विख्यात समाजसेवी सुखराज नाहर का कहना है कि जंगल से जुड़े तीर्थ मार्गों पर वन्यजीवों की गतिविधि कोई अचानक पैदा हुई समस्या नहीं है। वन विभाग के पास जानवरों की मौजूदगी और मूवमेंट की जानकारी होती है। फिर यह सूचना समय रहते तीर्थ ट्रस्ट और यात्रियों तक क्यों नहीं पहुंचती? नाहर के मुताबिक – जिस रास्ते पर रोज हजारों लोग पैदल जा रहे हैं, उसका रोजाना जोखिम आकलन होना चाहिए। यदि किसी क्षेत्र में शेर या तेंदुए की गतिविधि है तो यात्रियों को अंधेरे में उस रास्ते पर जाने से रोका जाए। जान बचाना धार्मिक यात्रा रोकना नहीं है।
वन विभाग और देवस्थान विभाग की साझा जवाबदेही तय हो
राजनीतिक विश्लेषकों की राय में अब केंद्र और राज्य सरकारों को धार्मिक स्थलों की ‘वन्यजीव सुरक्षा नीति’ पर विचार करना चाहिए। जंगलों से घिरे प्रमुख तीर्थों का सुरक्षा ऑडिट हो और वन विभाग, देवस्थान विभाग, जिला प्रशासन तथा तीर्थ ट्रस्ट की जिम्मेदारियां लिखित रूप से तय की जाएं। राजनीतिक विश्लेषक निरंजन परिहार ने कहा कि वन्यजीव संरक्षण जरूरी है, लेकिन मानव जीवन की सुरक्षा भी शासन की जिम्मेदारी है। विभागों के बीच फाइल घूमने से खतरा खत्म नहीं होगा। एक संयुक्त कमांड और त्वरित प्रतिक्रिया तंत्र बनाना होगा। परिहार कहते हैं कि गिरनार की घटना ने चेतावनी दे दी है। सवाल सिर्फ एक बालक की दर्दनाक मौत का नहीं, बल्कि उन लाखों श्रद्धालुओं का है जो विश्वास के साथ तीर्थ की राह पकड़ते हैं। आस्था की राह भय की राह बने, इससे पहले सरकार, वन विभाग और तीर्थ ट्रस्टों को तय करना होगा—अगले हादसे का इंतजार करना है या अभी जागना है?
सवाल आखिर तीर्थयात्रियों की सुरक्षा सुनिश्चित करने का है
सही मायने में देखें, तो विख्यात जैन – हिंदू तीर्थ गिरनार में 12 साल के बालक की शेर के ताजा हमले में मौत ने कई गंभीर सवाल खड़े किए हैं, जो इससे पहले कभी नहीं किए गए। वन्यजीवों के हमलों में लोगों की मौतें पहले भी हुई है, लेकिन अब लोग पहले से ज्यादा जागरूक हैं। सोशल मीडिया ने भी इस तरह की सजगता को बढ़ावा दिया है। सम्मेत शिखर से पालीताणा, गिरनार, राणकपुर आदि जैसे कई तीर्थ स्थल घने जंगलों से भरे पहाड़ों पर बसे हैं। इन तीर्थ स्थलों तक पहुंचने के रास्ते भी कई – कई किलोमीटर लंबे हैं। ऐसे में निहत्थे तीर्थयात्रियों के लिए धुप्प अंधेरे पहाड़ी तीर्थों की राह तय करना खतरे से खाली नहीं होता। लेकिन इन तीर्थयात्रियों की सुरक्षा की जिम्मेदारी सुनिश्चित करना आखिर किसकी जिम्मेदारी है और इस दिशा में कौन पहल करेगा, ये सबसे बड़े सवाल हैं।
– आकांक्षा कुमारी
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