-निरंजन परिहार
Congress: भारतीय राजनीति में कांग्रेस के लिए ये बड़ी चुनौतियों का दौर है। एक ओर बीजेपी आक्रामक संगठन, मजबूत नेतृत्व और वैचारिक स्पष्टता के साथ अपनी संगठन और सत्ता दोनों को विस्तार दे रही है, तो उसके मुकाबले कांग्रेस (Congress) अपने संगठनात्मक पुनर्निर्माण और वैचारिक पुनर्स्थापना की नई प्रक्रिया में है। कांग्रेस के सामने चुनौती केवल चुनाव जीतने की नहीं, बल्कि एक ऐसी प्रभावी नेतृत्वकारी नई टीम तैयार करने की है, जो आने वाले लंबे राजनीतिक संघर्ष में पार्टी को आगे ले जा सके। यही कारण है कि आज राहुल गांधी को संसद और संगठन दोनों स्तर पर युवा, ऊर्जावान और वैचारिक रूप से प्रतिबद्ध साथियों की आवश्यकता पहले से कहीं अधिक महसूस की जा रही है। राहुल गांधी (Rahul Gandhi) चाहे, तो राज्यसभा चुनाव के दरवाजे खुले हैं, जहां पहले से ही बैठे युवा नेताओं शक्तिसिंह गोहिल, नीरज डांगी जैसों की काबिलीयत देखकर फिर से राज्यसभा भेजा जा सकता है, तो सचिन पायलट, प्रणीति शिंदे, दीपेंदर हुड्डा, इमरान प्रतापगढ़ी, जिग्नेश मेवानी जैसे नेताओं को संगठन में भी महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां देकर युवा पीढ़ी को नया संदेश दिया जा सकता है।
बड़े राजनीतिक संघर्ष में केवल एक नेता पर्याप्त नहीं
राहुल गांधी ने बीते कुछ वर्षों में जिस प्रकार लगातार वैचारिक राजनीति, सामाजिक न्याय, संविधान और लोकतांत्रिक संस्थाओं की रक्षा जैसे मुद्दों को केंद्र में रखा है, उससे यह स्पष्ट हुआ है कि वे कांग्रेस को केवल चुनावी दल के रूप में नहीं, बल्कि एक वैचारिक आंदोलन के रूप में पुनर्गठित करना चाहते हैं। लेकिन किसी भी बड़े राजनीतिक संघर्ष में केवल एक नेता पर्याप्त नहीं होता। उसके साथ ऐसे सहयोगियों की आवश्यकता होती है जो संसद में आक्रामक ढंग से पक्ष रख सकें, संगठन में कार्यकर्ताओं को ऊर्जा दे सकें और देशभर में पार्टी की विचारधारा को मजबूती से आगे बढ़ा सकें। दक्षिण भारत में केसी वेणुगोपाल, डीके शिवकुमार तेलंगाना के मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी जैसे नेता संगठनात्मक, प्रशासनिक और बौद्धिक स्तर पर कांग्रेस की ताकत बने हुए हैं। लेकिन उत्तर – पश्चिम भारत में युवा चेहरों को अधिक संगठित तरीके से आगे लाने की आवश्यकता है। राजस्थान, हरियाणा, पंजाब, दिल्ली, गुजरात, हिमाचल, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे राज्यों से कांग्रेस को ऐसे नेताओं की नई पीढ़ी तैयार करनी होगी जो सामाजिक प्रतिनिधित्व के साथ-साथ वैचारिक स्पष्टता भी रखते हों।
टीम ऐसी हों, जो कांग्रेस की आवाज मजबूती दे सके
राजस्थान से राज्यसभा सांसद नीरज डांगी और गुजरात से शक्तिसिंह गोहिल ने जिस तरह से संसदीय सक्रियता, संगठनात्मक जिम्मेदारियों और वैचारिक निष्ठा जैसे तीनों स्तरों पर खुद को साबित किया है, वह काबिले तारीफ है। कांग्रेस ने पिछले कुछ वर्षों में डांगी और गोहिल को विभिन्न राज्यों में चुनाव प्रभारी, पर्यवेक्षक और स्क्रीमिंग कमेटियों में संगठनात्मक जिम्मेदारियां देकर राष्ट्रीय नेता के रूप में तैयार किया है। इसी तरह हिमाचल के मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू, रणदीप सुरजेवाला, दीपेंदर हुड्डा, सचिन पायलट, इमरान प्रतापगढ़ी, प्रणीति शिंदे, गौरव गोगोई, जिग्नेश मेवानी, कन्हैया कुमार, सुखविंदर सिंह सुक्खू और उदय भानु छिब जैसे नेता लोकसभा, विधानसभा और संगठन व प्रशासन दोनों के अनुभव रखने वाले अपेक्षाकृत युवा हैं, जिनकी नई पीढ़ी तथा अपने अपने समाज में मजबूत पकड़ है। गौरव गोगोई संसद में अपनी प्रभावशाली बहस की क्षमता, तो पायलट अपने संतुलित राजनीतिक दृष्टि के कारण कांग्रेस के प्रमुख युवा चेहरों में शामिल हैं। कन्हैया कुमार वैचारिक आक्रामकता और युवाओं से संवाद की क्षमता रखते हैं। जिग्नेश मेवानी और नीरज डांगी सामाजिक न्याय और दलित राजनीति के मुद्दों पर कांग्रेस की आवाज को मजबूती दे सकते हैं। यह मॉडल पार्टी को राष्ट्रीय स्तर पर और व्यापक रूप से अपनाने की आवश्यकता है।
संदेश यह हो कि कांग्रेस में नई पीढ़ी के लिए जगह है
वर्तमान में, राहुल गांधी की राजनीति का केंद्र विचारधारा आधारित संघर्ष बनता जा रहा है। इसलिए उन्हें केवल चुनावी प्रबंधकों की नहीं, बल्कि ऐसे राजनीतिक सहयोगियों की आवश्यकता है जो लंबे समय तक उनके साथ चल सकें। यह सहयोग संसद के भीतर भी जरूरी है और सड़क पर होने वाले राजनीतिक आंदोलनों में भी। नीरज डांगी, सचिन पायलट, इमरान प्रतापगढ़ी, प्रणीति शिंदे, गौरव गोगोई, जिग्नेश मेवानी जैसे नेता इस दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं क्योंकि वे संसदीय और संगठनात्मक दोनों में राजनीतिक संतुलन रखते हैं। कांग्रेस को अब यह समझना होगा कि युवा नेतृत्व को केवल एकाध बार सांसद – विधायक बनाने से काम नहीं चलेगा। उन्हें लंबे राजनीतिक अवसर देने होंगे। राज्यसभा, लोकसभा, विधानसभा, संगठनात्मक पद, चुनाव प्रबंधन और मीडिया रणनीति जैसे क्षेत्रों में युवा नेताओं की भागीदारी बढ़ानी होगी। यदि पार्टी केवल पुराने नेतृत्व ढांचे पर निर्भर रहती है, तो युवा नेताओं में निराशा बढ़ेगी। इसके विपरीत, यदि डांगी, पायलट, हुडा, प्रतापगढ़ी, प्रणीति जैसे नेताओं को आगे बढ़ाया जाता है, तो यह संदेश जाएगा कि कांग्रेस में नई पीढ़ी के लिए जगह है।
पहली टीम बिखरी, मगर जो साथ हैं, उनको तो सम्हालें
अपने संसदीय जीवन में राहुल गांधी जब पहली बार लोकतंत्र की आवाज बनने निकले थे, तो उनके लिए एक टीम बनी थी। ज्योतिरादित्य सिंधिया, मिलिंद देवड़ा, जितिन प्रसाद, आरपीएन सिंह, सचिन पायलट आदि कुछ चेहरे थे, जो उस टीम में थे। फिर जब राहुल कांग्रेस अध्यक्ष बने, तो भारत की चारों दिशाओं के राज्यों और हर समाज के अलग अलग वर्गों को उनकी टीम में प्रतिनिधित्व मिला। जिसमें बाद के दिनों में, अमरिंदर सिंह राजा वडिंग, रवनीत सिंह बिट्टू, हार्दिक पटेल, प्रियंका चतुर्वेदी, सुष्मिता देव, नीरज डांगी, नवजोत सिंह सिद्धू, शक्तिसिंह गोहिल, गौरव वल्लभ, जयवीर शेरगिल, शहजाद पूनावाला, दिव्या स्पंदना, सुनील जाखड़ जैसे कई नाम बाद में उस सूची जुड़ते गए। लेकिन कांग्रेस के सत्ता से जाते ही, इनमें से कई सारे नेता कांग्रेस छोड़कर चले गए और बड़े नामों में, सचिन पायलट सहित शक्तिसिंह गोहिल और नीरज डांगी जैसे कुछ ही लोग बचे हैं। इसीलिए, कांग्रेस को और खास तौर से राहुल गांधी को अपनी राजनीतिक यात्रा को ताकतवर बनाने के लिए, विशेष रूप से दलित, पिछड़े और युवा वर्ग में अपनी राजनीतिक पकड़ मजबूत करनी होगी, और उस वर्ग को प्रतिनिधित्व आधारित राजनीति के लिए भी गंभीरता से आगे लाना होगा।
समय रहते युवा चेहरों को पर्याप्त महत्व जरूरी
बीजेपी ने पिछले वर्षों में सामाजिक विस्तार की राजनीति के जरिए कई वर्गों में अपनी पैठ बनाई है। न तो राहुल गांधी और न ही कांग्रेस, बीजेपी की इस ताकत का मुकाबला केवल वैचारिक भाषणों से नहीं कर सकती; उसे जमीन पर ऐसे नेताओं को आगे करना होगा जो समाज के विभिन्न वर्गों के बीच भरोसा पैदा कर सकें। इसीलिए राहुल गांधी को एक ऐसी युवा टीम की आवश्यकता है जो वैचारिक रूप से प्रतिबद्ध, संगठनात्मक रूप से सक्षम और राजनीतिक रूप से दीर्घकालिक हो। दीपेंदर हुड्डा, नीरज डांगी, अमरिंदर सिंह राजा वडिंग, सचिन पायलट, प्रणीति शिंदे, इमरान प्रतापगढ़ी, जिग्नेश मेवानी, कन्हैया कुमार, शक्ति सिंह गोहिल जैसे नेता इस दिशा में कांग्रेस की नई राजनीति के लिए शानदार चेहरे हैं। यदि पार्टी समय रहते इन चेहरों को पर्याप्त महत्व देती है, संसदीय भूमिका में लगातार आगे करती है और संगठनात्मक रूप से ताकत देती है, तो आने वाले वर्षों में कांग्रेस अधिक संगठित, अधिक संघर्षशील और अधिक मजबूत राजनीतिक शक्ति के रूप में उभर सकती है। हालांकि राहुल गांधी यह समझ रहे हैं कि उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती केवल विपक्ष के नेता की भूमिका निभाने की नहीं, बल्कि कांग्रेस के भविष्य का नेतृत्व तैयार करने की है, लेकिन अपनी इस सोच पर राहुल गांधी तत्काल अमल करे तो कोई बात। क्योंकि कांग्रेस का भाग्य, सौभाग्य और दुर्भाग्य सब कुछ युवा पीढ़ी से ही जुड़े हैं।
(लेखक राजनीतिक विश्लेषक हैं)
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