-निरंजन परिहार
West Bengal: यह कहना मुश्किल है कि आने वाला इतिहास ममता बनर्जी (Mamta Banerjee) को ताकतवर राजनेता के तौर पर याद करेगा या गलती से राजनीति (Politics) में भटक गई एक नेता के तौर पर। दोनों में से कैसे भी याद करें, ममता बनर्जी को जूझने वाली और कईयों के छक्के छुड़ा देने वाली नेता के तौर पर, और फिर उसी से उपजे अहंकार के दर्प से दबी नेता के तौर पर पहचाना जाएगा। पश्चिम बंगाल (West Bengal) ने इतिहास दोहराया। 78 साल पहले, 15 अगस्त 1947 के दिन अंग्रेजी अहंकार को खदेड़ा। 4 मई 2026 की ढलती शाम ममता बनर्जी के मद का मर्दन किया। सत्ता के सिहासन अहंकार का आसमान भी अपने साथ लाते हैं। वे आसमान सितारा बनकर चमकने के लिए होते है। अहंकार की उड़ान के लिए नहीं। मगर ममता दीदी अहंकार से ओतप्रोत। इसीलिए पश्चिम बंगाल ने उनको आसमान से जमीन पर उतार दिया। दिलों से निकाल कर दल दल में धकेल दिया। भवानीपुर ने 15,114 शुवेन्दु अधिकारी को जिता दिया, ममता को हरा दिया। घर बिठा दिया। कोलकाता… फिर गवाह बना आजादी के बाद पहली बार बीजेपी (BJP) के शासन का। इतिहास का नया मोड़।
ममता बनर्जी का कद बड़ा था। पर कद के साथ आया अहंकार, और वही भारी पड़ा। अहंकार की उड़ान, और गिरावट की पटकथा। सत्ता सिर्फ शासन नहीं देती। भ्रम भी देती है। ममता दीदी के इर्दगिर्द वही भ्रम खड़ा था। अजेय होने का भ्रम, अपराजेय होने का भ्रम और हर हाल में हिंदुत्व को हराने का भ्रम। लेकिन लोकतंत्र… भ्रम नहीं सहता। वह फैसले करता है। और इस बार फैसला कठोर था। नारे ने खुद को सच साबित किया, 4 मई… दीदी गई।
पंद्रह साल बाद, ‘ममता युग’ का अंत। डेढ़ दशक… कम नहीं होता। एक पूरी पीढ़ी विदा हो जाती है। एक नई पीढ़ी तैयार हो जाती है। ममता ने बंगाल को अपने अंदाज़ में ढाला। अनावश्यक आक्रामक, अपरिहार्य उग्र और लगभग अराजक। दीदी ने राजनीति को अपनी भाषा दी। सत्ता को अपना रंग दिया। शक्ल पर सादगी, मगर सियासी धूर्तता से भरपूर। मगर हर दौर की एक उम्र होती है। उम्र पूरी हुई। ममता का उतार, भगवा का उभार। धीरे -धीरे, पर निर्णायक। कभी बीजेपी का खाता तक नहीं खुला। 2011 में शून्य पर। लेकिन अब शिखर। 294 में से 206 पर बीजेपी की जीत। बहुत बड़ेबहुमत से बंगाल फतह कर लिया। और जो किया, वह सिर्फ चुनावी जीत नहीं है। यह धैर्य की जीत है। नरेंद्र मोदी के कद की जीत है, अमित शाह की रणनीति की जीत है। और कार्यकर्ताओं के तपस्या का तेज है।
बीजेपी के पास प्रचंड से भी ज्यादा प्रचंड और लगभग अखंड जैसा दिखाई पड़ने वाला बहुमत है। कालीघाट से नबन्ना तक बदलाव है। कालीघाट… जहां से आवाज उठती थी। अब वह धीमी है। नबन्ना… जहां सत्ता बसती है। अब वहां ‘कमल’ खिल चुका है। यह सिर्फ सत्ता परिवर्तन नहीं। यह प्रतीक बदलने की कहानी है। जनता का फैसला है, बिल्कुल साफ और संपूर्ण सख्त। यह जीत सिर्फ वोटों का गणित नहीं। यह मन का फैसला है। 34 साल वामपंथ। 15 साल तृणमूल। लंबा इंतजार था। और जब बदलाव आता है, तो वह आधा नहीं आता। पूरा आता है। प्रचंड आता है। वह आया। बीजेपी ने इतिहास बदल दिया।
लेकिन जीत… आसान नहीं होती राजनीति का नियम साफ है। जितनी बड़ी जीत—उतना बड़ा बोझ। सियासत के समीकरण कहते हैं कि जीत जितनी प्रचंड, अपेक्षाओं का बोझ भी उतना ही भारी। ताज अब बीजेपी के सर पर है। पर यह ताज, कांटों से भरा है। उम्मीदें ऊंची हैं। सवाल भारी हैं। और नजरें… हर वक्त निशाने पर। चुनौती सिर्फ शासन की नहीं। चुनौती अब अपोक्षाओं की है। क्योंकि बंगाल आसान प्रदेश नहीं। यहां राजनीति भावनाओं से चलती है। यहां विचारधारा गहरी है। संस्कृति मजबूत है। और सत्ता को स्वीकार कराने के लिए, सिर्फ जीत काफी नहीं होती। विश्वास बनाना पड़ता है।
और तृणमूल ? खत्म नहीं, घायल है। वह हारी है, खत्म नहीं हुई। ममता बनर्जी गिरी हैं। और राजनीति में गिरना अंत नहीं होता। यह फिर से उठने का अवसर होता है। वापसी की तैयारी भी। पांच साल बाद फिर नया अध्याय, पर खाली नहीं। पंद्रह साल बनाम 5 साल। बंगाल का नया पन्ना खुला है।लेकिन कोरा नहीं है। उस पर पहले से लिखी हैं उम्मीदें, आशंकाएं, और चुनौतियां। हर फैसला अब परखा जाएगा। हर कदम तोला जाएगा। तस्वीर साफ है कि कोलकाता ने फिर इतिहास लिखा। इस बार स्याही राजनीति की थी। अहंकार हारा। परिवर्तन जीता। लेकिन परिवर्तन की असली परीक्षा शुरू होती है अब। क्योंकि सत्ता पाना आसान है, सत्ता निभाना मुश्किल। और बंगाल… हर किसी की परीक्षा लेता है, परीक्षा बीजेपी को भी देनी है। परीक्षाओं में आजकल खेल होते हैं। मगर सियासत तो अपने आप में खेल है। इसीलिए खेल यहीं खत्म नहीं हो रहा, खेला चलता रहेगा!
(लेखक राजनीतिक विश्लेषक हैं)
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