BJP: जयपुर में भाजपा (BJP) के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन (Nitin Nabin) का आना केवल किसी पार्टी अध्यक्ष का औपचारिक प्रवास नहीं है; यह उस संगठनात्मक मशीनरी की चमकती हुई चाल है, जो अपनी देह में संघ (RSS) की पुरानी स्मृति, भाजपा की चुनावी भूख और सत्ता की ठंडी गणितीय बुद्धि को एक साथ रखती है। राजस्थान (Rajasthan) में उनके पहले बड़े प्रवास पर भाजपा ने एयरपोर्ट से लेकर पार्टी मुख्यालय तक स्वागत की तैयारियां की हैं; वे टोंक में नए जिला कार्यालयों के उद्घाटन और जयपुर में कोर कमेटी की बैठक जैसे कार्यक्रमों से संगठन की नसों को टटोलेंगे। यह वही भाजपा है, जो अपने दफ़्तरों को सिर्फ़ ईंट-पत्थर नहीं मानती, उन्हें सत्ता के भविष्य के गोदाम, कार्यकर्ता की धर्मशाला और चुनावी ऊर्जा के छोटे-छोटे पावरहाउस की तरह बनाती है। मैं हर रोज़ देखता हूँ कि काँग्रेस का प्रदेश कार्यालय किस तरह वीरान रहता है और भाजपा के कार्यालय में कितना उफान। यही दोनों दलों के वर्तमान की ताक़त और कामकाज का दर्पण है।
भाजपा और कांग्रेस के स्वभाव का वास्तविक अंतर
नितिन नबीन का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनना भी भाजपा की दूरगामी राजनीति का हिस्सा है। वे 45 वर्ष की उम्र में भाजपा के सबसे युवा राष्ट्रीय अध्यक्ष बने हैं और जेपी नड्डा के बाद यह पद संभाला है। भाजपा का यह पीढ़ीगत शिफ़्ट है। युवा वोटर को ध्यान में रखकर की गई नियुक्ति। काँग्रेस के बूढ़ों ने अपने रथों को युवा नेताओं के ऊर्जावान अश्वों के आगे फंसा दिया है और भाजपा के बूढ़े दूर-दूर से खोज-खोजकर युवाओं को अहम पदों पर ला रहे हैं। नितिन नबीन बिहार से पांच बार विधायक रहे हैं और पार्टी ने उन्हें अचानक आसमान से नहीं उतारा; वे पहले बिहार की ज़मीन, युवा मोर्चे, सरकार और संगठन की उन सीढ़ियों से गुजरे, जिन पर चलते हुए कोई नेता सिर्फ़ नेता नहीं, पार्टी की आंतरिक भाषा सीखता है। यहीं भाजपा और कांग्रेस के स्वभाव का अंतर दिखता है।
संकेत हैं पहली बार के विधायक सीधे मुख्यमंत्री
कांग्रेस में राजस्थान जैसे प्रदेशों में पहली बार के विधायक के लिए सत्ता का दरवाज़ा अक्सर बाहर से बहुत चमकदार होता है; लेकिन भीतर से इसलिए बहुत बंद रहता है कि बड़े नेताओं को उनसे बड़ा ख़तरा रहता है; लेकिन भाजपा ने भजनलाल शर्मा जैसे पहली बार के विधायक को सीधे मुख्यमंत्री बनाकर यह संकेत दिया कि वह उम्र, वरिष्ठता और पुराने दावों के काठ को कभी-कभी अचानक काटकर नए कबाड़ में बदल देती है। भजनलाल शर्मा का मुख्यमंत्री बनना सचमुच भाजपा की चौंकाने वाली राजनीति का उदाहरण था। पहली बार विधायक और सीधे राजस्थान की सत्ता का शीर्ष। दोनों दलों में अंतिम निर्णय ऊपर से ही उतरता है, यह कोई रहस्य नहीं; पर भाजपा की विशेषता यह है कि वह ऊपर से उतरते निर्णय को भविष्य की लंबी कथा में पिरो देती है, जैसे कोई पुराना ज्योतिषी तारे नहीं, कार्यकर्ताओं की पीढ़ियां पढ़ रहा हो। हालांकि काँग्रेस के ऐसे नेता भजनलाल शर्मा को पर्ची मुख्यमंत्री कहते हैं, जो ख़ुद किसी चुनाव, नामांकन या राजनीतिक प्रक्रिया से उस पद पर चयनित नहीं हुए। जैसे भाजपा परिवारवाद की आलोचना करती है; लेकिन उन्हें भी नेता पारिवारिक पृष्ठभूमि वाले ही मिलते हैं।

जैसे एक्सीडेंटल पॉलिटिशियन हैं नीतिन नबीन
नितिन नबीन दरअसल बिहार भाजपा की उसी पुरानी मिट्टी से निकले हैं, जिसमें जेपी आंदोलन की धूल, पटना की कायस्थ-बौद्धिक गलियों की गंध और संघ-भाजपा की आरंभिक कठिनाई का पसीना मिला हुआ था। उनके पिता नवीन किशोर प्रसाद सिन्हा पटना पश्चिम से भाजपा के वरिष्ठ विधायक थे; नबीन स्वयं पिता के निधन के बाद 2006 में सार्वजनिक जीवन में आए और उसी वर्ष विधायक बने। इसीलिए वे अपने को कई बार “एक्सीडेंटल पॉलिटिशियन” भी कह चुके हैं। बिहार भाजपा की पुरानी स्मृति में सुशील मोदी, नंद किशोर यादव और नवीन किशोर प्रसाद सिन्हा जैसे नाम उस समय के स्तंभ थे, जब भाजपा बिहार में आज जैसी विराट मशीन नहीं थी, अपितु संघर्ष करती हुई, अपना मुहल्ला खोजती हुई, सत्ता के बाहर खड़ी एक विचार-व्यवस्था थी। ऐसी पार्टियां अपने पुराने हिसाब भूलती नहीं हैं।
कांग्रेस और भाजपा में परंपरा का दबलता फर्क
कांग्रेस की स्मृति अक्सर व्यक्ति के साथ बुझ जाती है; संघ-भाजपा की स्मृति दफ़्तरों, शाखाओं, संपर्कों, रिश्तों और पीढ़ियों में जमा रहती है। इसी स्मृति ने कभी राजस्थान में विजयराजे सिंधिया की बेटी वसुंधरा राजे को बूढ़े, लड़ते-भिड़ते और अभिमानी राजस्थानी नेताओं के बीच सहजता से स्थापित किया था; इसी स्मृति ने नवीन किशोर प्रसाद सिन्हा की विरासत को नितिन नबीन में एक नए राजनीतिक बीज की तरह बचाकर रखा। फ़र्क़ यही है। कांग्रेस में व्यक्ति का उपकार अक्सर अगले चुनाव तक जीवित रहता है; भाजपा-संघ में व्यक्ति की उपयोगिता, निष्ठा और पारिवारिक-संगठनात्मक पूंजी कई बार अगली पीढ़ी तक पहुंच जाती है। कांग्रेस में भी कभी यही परंपरा थी।
जीत में छिपा ज़मीन पर जमा वोट का रसायन
नितिन नबीन की असली परीक्षा उनकी विरासत नहीं, बांकीपुर रही। बांकीपुर ने उन्हें सिर्फ़ विधायक नहीं बनाया; उसने उन्हें एक शहरी, मिलनसार, सहज, उपलब्ध और लगातार जीतने वाले नेता में बदला। मैंने पटना में जब भाजपा को नापसंद करने वाले कई युवा लोगों से लेकर बुज़ुर्गों तक से पूछा तो सबने एक स्वर से नितिन नबीन की ज़बरदस्त तारीफ़ें कीं। 2025 के विधानसभा चुनाव में उन्होंने बांकीपुर से 98,299 वोट लेकर राजद की रेखा कुमारी को 51,936 मतों से हराया; यानी यह कोई कागज़ी प्रभुत्व नहीं, ज़मीन पर जमा हुआ वोट का रसायन है। इसलिए यह कहना अतिशयोक्ति नहीं कि वे आज बांकीपुर से सोते-सोते भी जीत सकने वाली राजनीतिक स्थिति में हैं; क्योंकि कुछ सीटें नेता को नहीं ढोतीं, नेता भी उन्हें अपनी आदत बना लेता है।

इतिहास के मलबे पर वर्तमान की सीढ़ियां चढ़ने मामला
पटना की राजनीति में बांकीपुर और कुम्हरार दोनों सीटों की अपनी अलग गंध है। कुम्हरार तो इतिहास की वह जगह है, जहां पाटलिपुत्र की प्राचीन स्मृति, मौर्यकालीन स्थापत्य और अशोक के 80 स्तंभों वाले सभा-हॉल की कथा आज भी मिट्टी के भीतर सांस लेती है। बिहार पर्यटन इसे अशोक के महल से जुड़ी 80-स्तंभों वाली संरचना के रूप में याद करता है; यानी यहां चुनाव सिर्फ़ वोटों का नहीं, इतिहास के मलबे पर वर्तमान की सीढ़ियां चढ़ने का भी मामला है। और इसी कुम्हरार में 2025 में भाजपा ने अपनी सबसे दिलचस्प पॉलिटिकल ट्रिग्नोमेट्री दिखाई। इतने कायस्थ-प्रभाव वाले इलाके में भाजपा ने कायस्थ चेहरे के बजाय संजय गुप्ता को उतारा। सामने जन सुराज ने बिहार के विख्यात गणितज्ञ और शिक्षक प्रो. केसी सिन्हा को मैदान में रखा। वही केसी सिन्हा, जिनकी गणित की किताबों से बिहार की कई पीढ़ियां बड़ी हुईं; जिन्होंने 70 से अधिक पुस्तकें लिखीं और जिन्हें बिहार में “अद्वितीय गणित शिक्षक” जाना जाता है। लेकिन चुनावी कक्षा में गणित की प्रतिष्ठा वोटों के ब्लैकबोर्ड पर टिक नहीं पाई और उन्हें महज महज महज 15,017 वोट मिले। राजनीति के स्वयंभू महापंडित बने प्रशांत किशोर ने एक महान शिक्षक की प्रतिष्ठा धूल में मिला दी।
राजनीति का चतुर-चालाक और हृदयहीन संस्करण
यही वह क्षण है, जहां राजनीति प्राय: कैलकुलस से बड़ी और कैलकुलस अक्सर राजनीति से छोटी दिखने लगती है। हमें आर्य स्कूल में डीसी थरेजा साहब ने कैलकुलस पढ़ाया था। और गणित मुझे तब ही से बहुत प्रिय है। कैलकुलस हमें बताता है कि बदलाव की दर क्या है, रेखा कब मुड़ती है, वक्र के नीचे कितना क्षेत्रफल है, गति का क्षणिक वेग क्या है और संचित मात्रा किस तरह भविष्य का आकार बनाती है। अगर आप स्टीफ़न हॉकिंग की “अ ब्रीफ़ हिस्ट्री ऑव टाइम” पढेंगे तो वहां भी कैलकुलस की जानकारियाँ दिलचस्प तरीके से दी गई हैं। न्यूटन और लाइबनिज़ ने गणित में जो खोजा, भाजपा ने राजनीति में उसका एक ठंडा, चतुर-चालाक और लगभग निर्दय और हृदयहीन संस्करण विकसित कर लिया है। वह जाति को देखती है, पर जाति में क़ैद नहीं रहती; वह समुदाय को पढ़ती है, पर समुदाय के नाम पर आत्मसमर्पण नहीं करती; वह चेहरे बदलती है, पर संगठन की नाड़ी नहीं छोड़ती।

राजनीति के नए धरातल के संकेत पढ़ना जरूरी
उलटबांसी देखिए; जो दल अपने को वैज्ञानिक, प्रगतिशील और सामाजिक न्याय का ठेकेदार बताते हैं, वे जाति की पुरानी, जर्जर, सीधे अंकगणित में फंसे हुए हैं; और जो भाजपा रूढ़िवादी, मंदिरवादी, परंपरावादी और अवैज्ञानिकता के जर्जर ढांचे को ढो रही है, वह सीट-दर-सीट राजनीतिक कैलकुलस, सामाजिक त्रिकोणमिति और संगठनात्मक बीजगणित पर कहीं अधिक मेहनत कर रही है। आप जरा सोचिए कि बिहार के कुम्हरार में एक प्रसिद्ध कायस्थ गणितज्ञ बुरी तरह हार जाता है और भारतीय ब्राह्मणवादी वर्णव्यवस्था के सबसे वर्चस्वशाली और बुद्धिमत्ता में अग्रणी माने जाने वाले कायस्थ अपनी जाति के शीर्ष सम्मानित और अद्वितीय शिक्षक के बजाय भाजपा के गुप्ता उम्मीदवार को जिताते हैं तो इसका मतलब साफ़ है कि विपक्ष भारतीय राजनीति के नए धरातल के संकेतों को अभी भी ठीक से पढ़ नहीं पा रहा। वह जाति जनगणना के सिद्धांत को ऐसे सीने से लगाए घूम रहा है जैसे वही अंतिम शास्त्र हो, जबकि भाजपा उसी शास्त्र के हाशिये पर अपनी नई सियासी इबारतें लिखती जा रही है। उसके सीबीआई, ईडी, चुनाव आयोग और न्यायपालिका के दुरुपयोग के शोर में उसकी इन बातों पर लोगों का ध्यान ही नहीं जा रहा।
राजनीति में भाजपा की मशीन का ख़तरनाक़ होना
बिहार की राजनीति में लोकसभा चुनाव के समय यह चर्चा रही थी कि नितिन नबीन पटना साहिब से लोकसभा जाना चाहते थे; लेकिन रविशंकर प्रसाद का टिकट नहीं कटा। पर शायद उन्हें भी उस समय यह पूरा एहसास न रहा हो कि भाजपा का न्यूक्लियस उन्हें किसी संसदीय सीट की सीमित परिधि में नहीं, राष्ट्रीय संगठन की केंद्रीय रेखा पर बैठाना चाहता है। राजनीति में कभी-कभी जो टिकट नहीं मिलता, वही आदमी को उससे बड़ी कुर्सी तक पहुंचा देता है। भाजपा की मशीन इसीलिए ख़तरनाक़ है; क्योंकि वह पराजय, प्रतीक्षा, वंचना और अधूरी इच्छा तक को भविष्य की खाद बना देती है। इसलिए नितिन नबीन का जयपुर प्रवास केवल स्वागत-मालाओं, कार्यालय-उद्घाटनों और कोर कमेटी की औपचारिक बैठकों का दिन नहीं है। यह राजस्थान भाजपा के लिए भी संकेत है कि दिल्ली अब सिर्फ़ बुज़ुर्ग़ चेहरों की सलामी नहीं, संगठन की अगली पीढ़ी का तापमान भी देख रही है। यह भजनलाल शर्मा के राजस्थान में उसी राजनीतिक सूत्र का विस्तार है; ऊपर से निर्णय, नीचे तक संगठन, बीच में जाति-संतुलन और सबसे भीतर भविष्य की गणना।
भाजपा में कुर्सी छीनने की कांग्रेस जैसी बेचैनी नहीं
भाजपा का यह नया गणित विपक्ष के लिए असुविधाजनक है; क्योंकि यह न तो पूरी तरह विचारधारा से समझ आता है, न जाति से, न व्यक्तित्व से, न मीडिया-प्रचार से। यह सबका मिश्रण है। एक धीमी, गीली, गर्म राजनीतिक मिट्टी, जिसमें संघ की स्मृति, मोदी-शाह की शक्ति, संगठन की गुप्त रेखाएं और स्थानीय समाज की महीन जातीय-मानसिक बनावट एक साथ पकती है। नितिन नबीन उसी सियासी सूत्र का नया चेहरा हैं। भाजपा में यह संभव है; क्योंकि वहां कभी-कभी नेता कुर्सी छीनने या किसी की कुर्सी को रोकने की कांग्रेस जैसी बेचैनी नहीं है। वहाँ आडवाणी जैसे तुर्रमखां को भी हाशिए पर किया जा सकता है और कई नेताओं के सामने जुटे कार्यकर्ताओं के साथ आख़िरी पंक्ति में खड़े किसी अनाम से भजनलाल शर्मा के सिर ताज पहनाया जा सकता है। भाजपा का यह राजनीतिक गणितीय कैलकुलस आज तक समाजशास्त्रीय जातिगत राजनीति कर रही काँग्रेस के समझ नहीं आ रहा। इसलिए भाजपा के सभी नितिन अब नवीन हैं। लेकिन पूरा देश हो या राजस्थान; राजनीति की नरम दूब पर बैठकर ट्वीट करते कांग्रेस नेताओं के लिए दूरक्षितिज पर टंगे स्वप्न क्या उन्हें थोड़ा धरातल के नज़दीक लाएंगे? ला सकते हैं, अगर आप अपने किसी नितिन को नवीन बनाएँ! अपनी ऐतिहासिक पार्टी की पॉलिटिकल कैलकुलस के नए डेरिवेटिव तलाश करें।

