Jabalpur Cruise Accident: यह तसवीर देखकर मैं भीतर से सुबक पड़ा। क्योंकि यह तस्वीर केवल एक हादसे (Accident) की तस्वीर नहीं है; यह मनुष्य की सभ्यता पर रखा हुआ वह नम, कांपता हुआ प्रश्न है, जिसका उत्तर कोई मुआवजा, कोई जांच-समिति और कोई सरकारी शोक-संदेश नहीं दे सकता। जबलपुर (Jabalpur) के बरगी डैम में मध्य प्रदेश पर्यटन विभाग का क्रूज (Cruise) अचानक तूफ़ान और तेज हवाओं के बीच पलट गया था। नौ लोगों की मौत हो चुकी है। जबलपुर क्रूज एक्सीडेंट (Jabalpur Cruise Accident) में कुछ बचाए गए और तलाश अब भी है। लेकिन इन संख्याओं के बीच जो सबसे बड़ा दर्द है, वह इस मां की बंद आंखों में साफ़ दिख रहा है।
एक मां, जिसने डूबती हुई नर्मदा में भी अपने बच्चे को खुद से अलग नहीं होने दिया। बेटा या बेटी कितनी भी दूर हो। माँ उसे कभी अलग नहीं होने देती। वह खाने की थाली सामने रखती है तो हजार कोस दूर बैठे बेटे या बेटी को याद करके ही पहला कौर मुंह की ओर बढ़ाती है। एक बार मैंने चूरू में बहुत ठंड के समय अरविंद चोटिया की माँ के फोन की बात सुनी थी। जयपुर में गरमी थी और चूरू में भयानक ठंड तो माँ ने चूरू से बेटे को ठंड से बचने की सलाह दी थी कि ओढ़ पहन के रखना। अभी मेरा बेटा अंडमान में था और दूसरा गुड़गांव में तो मैं जाने कब से देखता हूँ कि उनकी माँ अपने खाने की थाली से पहले उन्हें ज़रूर याद करती है। अब तो वह बेटी को भी याद करती है। आपके भी घर में ऐसा ही होगा।
कई बार माँ चली जाती है तो वह बच्चों को कहते हैं कि आसमान से भी देखना नहीं भूलती।आप देखिए इस तस्वीर को। पानी काला है। हवा की हिंसा अब शांत हो चुकी है। फूलों और कचरे के बीच जीवन की अंतिम थरथराहट जम गई है। मां के चेहरे पर मृत्यु का भय नहीं, एक अजीब-सी थकी हुई शांति है; जैसे उसने आखिरी क्षण तक अपने बेटे से कहा हो, “डरना मत, मैं हूं।” बच्चा मां की छाती से बहुत आत्मविश्वास से लगा हुआ है। जैसे उसे लगे कि अब वह एकदम सुरक्षित है। इसीलिए संवेदनशील सभ्यताएँ अपने देश को मातृभूमि और असभ्य मुल्क उसे पितृभूमि मानते हैं।
दुनिया की सारी सुरक्षा-व्यवस्थाएं, सारे प्रोटोकॉल, सारी लाइफ जैकेटें, सारे नियम उस छोटे-से शरीर के सामने विफल हैं। मां और उसके चार साल के बेटे के शव एक-दूसरे से लिपटे हैं। पिता और बेटी बच गए, मगर मां-बेटा लौटकर नहीं आए। यह तस्वीर हमें रुलाती ही नहीं, शर्मिंदा भी करती है। क्योंकि हर हादसा केवल मौसम से नहीं होता; कई हादसे लापरवाही, चेतावनी की अनदेखी, अधूरी तैयारी और पर्यटन को तमाशा समझ लेने से होते हैं। अगर सचमुच लाइफ़ जैकेट देर से दी गईं, अगर चेतावनी अनसुनी हुई, अगर सुरक्षा प्रोटोकॉल काग़ज़ पर रह गए तो यह दुर्घटना नहीं, व्यवस्था की नैतिक डूब है।
नर्मदा ने कल की शाम एक मां और बेटे को नहीं छीना; उसने हमसे पूछा है : क्या हमारी यात्राएं सुरक्षित हैं? क्या हमारी सरकारें सजग हैं? क्या हमारी संवेदनाएं जीवित हैं? इस तस्वीर को देखते हुए आंखें इसलिए छलछला आती हैं कि मृत्यु में भी मां ने मातृत्व नहीं छोड़ा। वह चली गई; लेकिन अपने बच्चे को अंतिम क्षण तक सीने से लगाए रही। मानो कह रही हो, “मेरी सांस भले डूब जाए, मेरा प्यार नहीं डूबेगा!” मैं इस मां को प्रणाम करता हूं।
– त्रिभुवन (वरिष्ठ पत्रकार)
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