– निरंजन परिहार
Rajasthan Congress: सियासत में मुस्कानें कभी-कभी शब्दों से ज्यादा बोलती हैं। संकेत मौन से ज्यादा मुखरित होते हैं। और इशारे अक्सर नई कहानी कहते हैं। इस बार भी कुछ ऐसा ही हुआ। राजस्थान (Rajasthan) के मुख्यमंत्री रहे अशोक गहलोत (Ashok Gehlot) और उप मुख्यमंत्री रहे सचिन पायलट (Sachin Pilot) जब पद के बिना आमने-सामने आए, तो हाथ सिर्फ मिले नहीं, ठहरे। मुस्कानें सिर्फ दिखी नहीं, टिकी रही। और बोल सिर्फ फूटे नहीं, सियासत के संकेतों की नई भाषा गढ़ने लगे। सियासी संकेतों की बिना किसी लिपि की इस अलिखित भाषा ने कांग्रेस में कईयों को सहमने के संकेत दे दिए हैं। सियासत में इस बार सहमने की बारी प्रदेश कांग्रेस (Congress) अध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा (Govind Singh Dotasra) की है, जो गहलोत की मेहरबानियों से ही पद और कद दोनों में बड़े बने हैं। मगर इन गिनों नई चाल चलने में व्यस्त दिख रहे हैं।
नई दिल्ली के कांग्रेस मुख्यालय में अशोक गहलोत और सचिन पायलट की यह मुलाकात साधारण नहीं थी। यह तस्वीरों से ज्यादा संदेशों की मुलाकात थी। कांग्रेस के ये दोनों नेता अपनी पार्टी की ओबीसी एडवाइजरी काउंसिल की बैठक में हिस्सा लेने पहुंचे थे। इस मुलाकात के बहाने, राजस्थान की राजनीति के कई बंद दरवाजों पर दस्तक दी गई। कार से उतरने से पहले, जब पायलट ने गहलोत को रिसीव किया, तो वह स्वागत कम और संकेत ज्यादा था। और जब गहलोत ने मुस्कुराकर लोगों की तरफ देखते हुए कहा कि ‘देख लो, हमारी कितनी बनती है’, तो यह संवाद कम, अगली सियासी पटकथा का सधा हुआ संवाद अधिक लगा।
राजस्थान की राजनीति में गहलोत और पायलट, दोनों नेताओं के रिश्ते किसी सीधी रेखा की तरह नहीं, बल्कि टेढ़े-मेढ़े वक्र की तरह रहे हैं। कभी पास, कभी दूर। कभी साथ, कभी आमने-सामने। कभी विरोध तो कभी धुर विरोध के। मिले तो दोनों पहले भी कई बार हैं। तारीफ दोनों ने पहले भी एक दूजे की, की है। लेकिन इस बार की नजदीकी में एक अलग किस्म की सियासी गूंज सुनाई दे रही है। दरअसल, चुनावी कैलेंडर अपनी रफ्तार पकड़ चुका है। ढाई साल—सुनने में लंबा, लेकिन सियासत में यह पलक झपकने जितना छोटा समय होता है। ऐसे में हर मुस्कान, हर मुलाकात और हर इशारा भविष्य की बिसात पर एक खास चाल बन जाता है।
अखिल भारतीय कांग्रेस के महासचिव के रूप में अपनी सफल पारी खेल रहे सचिन पायलट की महत्वाकांक्षा अब किसी रहस्य की मोहताज नहीं। वह कांग्रेस के राजस्थान संगठन में वापसी चाहते हैं। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष की कुर्सी उन्हें सिर्फ पद नहीं लगती, वे उसे नेतृत्व का प्रवेशद्वार मानते हैं। पिछली बार जो सपना अधूरा रह गया था, इस बार उसे पूरा करने की बेचैनी उनके हर कदम में झलकती है। और यह गलत भी नहीं है। क्योंकि सियासत में हर समझदार आगे बढ़ने की महत्वाकांक्षा से सदा सज्ज रहता है। वहीं अशोक गहलोत सियासत में अनुभव के उस शिखर पर खड़े हैं, जहां हर कदम नाप-तोल वाला होता है। गहलोत जानते हैं कि राजनीति में सिर्फ वर्तमान नहीं, भविष्य की आहट भी सुनी जाती है। इसलिए उनकी सक्रियता अब नए रंगों में दिख रही है, संयमित, लेकिन सजग। इन दोनों के बीच खड़े हैं गोविंद सिंह डोटासरा। न पूरी तरह इधर, न पूरी तरह उधर। लेकिन अध्यक्ष पद पर बने रहने की फिराक में। छह साल का कार्यकाल, और अगला चुनाव अपने नेतृत्व में लड़ने की आकांक्षा। ये दोनों उन्हें इस त्रिकोणीय सियासी संघर्ष का अहम किरदार बना देते हैं।
कांग्रेस में डोटासरा का खेल अलग लग रहा है। पाय़लट की मंशा को बांकर वह मैदान छोड़ने के मूड में नहीं। खुद को पद पर बनाए रखने की लालसा में उन्होंने सारे घोड़े खोल दिए हैं। खुद तो कुछ नहीं कर रहे, लेकिन सोशल मीडिया पर समर्थकों का आक्रामक रुख, तेज चल रहा हैं। पायलट और गहलोत दोनों को आरएसएस का एजेंट बताने की कोशिश का यह आलम बताता है कि यह लड़ाई अब केवल पद की नहीं, प्रतिष्ठा की भी है। हालांकि, इस अभियान की विश्वसनीयता पर सवाल उठते हैं, और यही सवाल इसे सियासी शोर ज्यादा, रणनीति कम बना देते हैं। ऐसे में गहलोत और पायलट की यह मुलाकात एक तीसरा कोण पैदा करती है। क्या यह स्वागत, मुलाकात और एकता की बात सिर्फ औपचारिकता थी? या फिर एक साझा संदेश? या फिर एक दबाव की रणनीति?
संभावनाएं कई हैं। पहली यह हाईकमान को संदेश हो सकता है कि दोनों नेता अब टकराव से ज्यादा तालमेल की राह पर हैं। दूसरी यह डोटासरा को संकेत हो सकता है कि सियासत में समीकरण बदलते देर नहीं लगती। तीसरी यह कार्यकर्ताओं के लिए एक मनोवैज्ञानिक खेल हो सकता है, जिससे भ्रम और संतुलन दोनों बनाए रखा जा सके। सियासत में तस्वीरें अक्सर कहानी का पहला पन्ना होती हैं, पूरा अध्याय नहीं। यह मुलाकात भी वैसी ही है। मुस्कानें जितनी सहज दिखीं, उतनी ही सजग भी थीं। हाथ मिलाना जितना स्वाभाविक लगा, उतना ही रणनीतिक भी। अंततः, यह कहना जल्दबाजी होगी कि इस मुलाकात से राजस्थान कांग्रेस की तस्वीर बदल जाएगी। लेकिन इतना तय है कि इसने चर्चा का नया दरवाजा खोल दिया है। और सियासत में कभी-कभी दरवाजे खुलना ही सबसे बड़ा संकेत होता है। क्योंकि यहां शब्द कम, संकेत ज्यादा चलते हैं। और इस बार संकेत साफ है कि राजस्थान की सियासत में खेल अभी बाकी है।
(लेखक राजनीतिक विश्लेषक हैं)
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