निरंजन परिहार
Women Reservation Bill: महिला आरक्षण। सियासत का सबसे चमकदार नारा। और सबसे उलझा हुआ सच। संसद में गूंज थी। घोषणाओं की। दावों की और इरादों की। केंद्र सरकार आई थी तैयारी के साथ। संविधान संशोधन का प्रस्ताव। बड़ा लक्ष्य। बड़ी बात। बड़ी उम्मीद। लेकिन सियासत, सीधी रेखा नहीं होती। यह घुमावदार रास्तों का खेल है। जहां हर कदम पर समीकरण बदलते हैं। दो,तिहाई बहुमत। यही असली कसौटी थी। यही सबसे बड़ी दीवार भी। महिला आरक्ष्ण बिल (Women Reservation Bill) पर सरकार के पास संख्या थी। पर पूरी नहीं थी। इच्छा थी। पर समर्थन अधूरा था। विपक्ष खड़ा हो गया। सवालों के साथ। शंकाओं के साथ। और अपनी,अपनी रणनीतियों के साथ।
किसी ने कहा, यह दिखावा है। किसी ने कहा, यह चुनावी चाल है। किसी ने कहा, इसमें ओबीसी महिलाओं का हक कहां है? और किसी ने कहा, समय गलत है, नीयत संदिग्ध है। सवालों की बारिश हुई। लेकिन जवाबों की धूप नहीं निकली। पर असली कहानी इससे गहरी है। यह सिर्फ एक बिल का गिरना नहीं है। यह भारतीय सियासत की जटिलता का आईना है।
महिला आरक्षण। दो शब्द। लेकिन भीतर कई परतें। पहली परत, प्रतिनिधित्व की। संसद में महिलाएं कम हैं। विधानसभाओं में और भी कम। आंकड़े बताते हैं, आधी आबादी, आधा अधिकार नहीं पा सकी। दूसरी परत, सत्ता की। हर सीट, एक अवसर है। हर अवसर, एक शक्ति है। और कोई भी दल, अपनी शक्ति यूं ही नहीं छोड़ता। तीसरी परत, सामाजिक संतुलन की। आरक्षण के भीतर आरक्षण। जाति का समीकरण। क्षेत्र का समीकरण। और इन सबके बीच, सियासत की गणित।
सरकार चाहती थी, एक बड़ा कदम। एक ऐतिहासिक फैसला। एक ऐसा संदेश, जो दूर तक जाए। लेकिन विपक्ष ने ब्रेक लगा दिया। कहा, पहले खाका साफ करो। पहले न्याय सुनिश्चित करो। फिर आगे बढ़ो। यह टकराव नया नहीं है। महिला आरक्षण का इतिहास लंबा है। हर बार उम्मीद जगी। हर बार अड़चन आई। कभी दलों के भीतर असहमति। कभी बाहर से विरोध। कभी तकनीकी अड़चनें। कभी सियासतक गणित। और हर बार, बिल आगे बढ़ते,बढ़ते रुक गया। इस बार भी वही हुआ। लोकसभा में बहुमत कम पड़ गया। संविधान संशोधन विधेयक गिर गया। और साथ में, एक और उम्मीद भी।
सवाल यह है, जिम्मेदार कौन? सरकार? या विपक्ष? या पूरी सियासतक व्यवस्था? सच यह है, सभी। क्योंकि यहां नीयत से ज्यादा, सियासत भारी पड़ती है। सरकार को पता था, दो,तिहाई आसान नहीं है। फिर भी उसने दांव खेला। शायद उम्मीद थी, विपक्ष साथ देगा। या फिर दबाव में आ जाएगा। विपक्ष को भी पता था — यह लोकप्रिय मुद्दा है। फिर भी उसने विरोध किया। क्योंकि सियासत में, समर्थन भी रणनीति है। और विरोध भी। यह वही सियासत है, जहां मुद्दे नहीं, मौके चलते हैं। जहां आदर्श नहीं, आंकड़े बोलते हैं।
महिला आरक्षण, सिद्धांत में सबको मंजूर है। लेकिन व्यवहार में, सबकी अपनी शर्तें हैं। यही विडंबना है। यही त्रासदी भी। महिलाएं इंतजार में हैं। सालों से। दशकों से। हर चुनाव में वादा मिलता है। हर संसद में चर्चा होती है। लेकिन नतीजा वही, अधूरा। अब सवाल यह है, आगे क्या? क्या फिर कोई नया प्रस्ताव आएगा? क्या फिर वही बहस होगी? क्या फिर वही गतिरोध? या इस बार, सियासत कुछ सीखेगी?
जरूरत है, ईमानदार संवाद की। स्पष्ट खाके की। और सच्चे इरादे की। महिला आरक्षण, कोई एहसान नहीं है। यह अधिकार है। संविधान की भावना है। लोकतंत्र की आत्मा है। अगर आधी आबादी, आधी हिस्सेदारी नहीं पाएगी, तो लोकतंत्र अधूरा रहेगा। और जब लोकतंत्र अधूरा होता है, तो विकास भी अधूरा रह जाता है। यह वक्त है, सियासत को आईना दिखाने का। यह वक्त है, नारे से आगे बढ़ने का। यह वक्त है, निर्णय लेने का। वरना, इतिहास लिखेगा, वायदों की किताब मोटी थी, लेकिन फैसलों के पन्ने खाली थे।
(लेखक राजनीतिक विश्लेषक हैं)
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