Sunil Bansal: भाजपा की कई राज्यों में निरंतर जीत के पीछे का वह ‘शांत चेहरा’ जिसे कैमरा नहीं, बूथ पहचानता है। अभी किसी बड़े राज्य के एक बहुत ताक़तवर भाजपा (BJP) विरोधी नेता से लंबी मुलाक़ात हुई तो उन्होंने कहा कि काश उनके पास एक अदद ऐसा व्यक्ति होता, जो “ये” काम कर सकता होता। उनके “ये” की यह सूची बहुत लंबी थी। उन्होंने बताया कि भाजपा के पास एक व्यक्ति ऐसा है। उन्होंने नाम बताया सुनील बंसल (Sunil Bansal)। एक इतना बड़े नेता और एक ऐसा संघ युवा का नाम, जो आम तौर पर बहुत लोकप्रिय नहीं है। उन्होंने उनकी ख़ूबियां बताईं तो मैं भी हत्प्रभ रह गया। वे कहने लगे, भारतीय जनता पार्टी की चुनावी सफलताओं पर बात होती है तो मंच पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का चेहरा दिखता है। रणनीति के शिखर पर गृहमंत्री अमित शाह का नाम आता है। प्रदेशों में मुख्यमंत्री और प्रदेश अध्यक्ष तालियाँ बटोरते हैं; लेकिन इस पूरे विराट चुनावी यंत्र के भीतर कुछ ऐसे लोग भी होते हैं, जिनके हाथ ग्रीस से सने होते हैं, जिनकी आवाज़ माइक पर नहीं आती, मगर जिनके बिना पहिया घूमता नहीं। और देखो, सुनील बंसल उसी किस्म के संगठन-पुरुष हैं। कम बोलने वाले, कम दिखने वाले, लेकिन भाजपा की बूथ-राजनीति के उन इंजीनियरों में से एक, जिनकी असली शक्ति पोस्टर पर नहीं, पन्ना प्रमुख की सूची, जातीय समीकरण की डायरी, बूथ समिति की उपस्थिति और उम्मीदवार चयन की सूक्ष्म फाइलों में छिपी रहती है।

पीएम मोदी और शाह की रणनीति के राजदार
बंसल की कहानी राजस्थान विश्वविद्यालय की छात्र-राजनीति से शुरू होती है। वे 1989 में राजस्थान विश्वविद्यालय छात्रसंघ के महासचिव बने, फिर एबीवीपी और संघ की धारा से होकर भाजपा के संगठन तंत्र में आए। 1990 के आसपास वे संघ के प्रचारक बने। यानी वह जीवन जिसमें व्यक्ति का निजी जीवन लगभग संगठन की ज़रूरतों में विलीन हो जाता है। यही उनकी पहली चौंकाने वाली ताक़त है: वे पारंपरिक अर्थ में जनसभा-नेता नहीं हैं; वे उस वैचारिक-प्रशिक्षण स्कूल के आदमी हैं, जहाँ नेता बनने से पहले कार्यकर्ता बनना सिखाया जाता है। साल 2014 में उत्तर प्रदेश वह प्रयोगशाला बना, जहाँ सुनील बंसल का नाम भाजपा के अंदर निर्णायक ढंग से उभरा। उस समय अमित शाह यूपी के प्रभारी थे और बंसल को संगठन की मशीनरी कसने का काम मिला। उत्तर प्रदेश जैसा राज्य, जहाँ लोकसभा की 80 सीटें, जातियों का घना जंगल, बूथों का समुद्र, स्थानीय गुटबाज़ी की भूलभुलैया, संगठन के भीतर योगियों और भोगियाें के बीच ख़तरनाक़ मारकाट, ब्राह्मणों और श्रमणों के तनाव, राजपूतों और अवधूतों के खिंचाव और न जाने क्या-क्या, वहाँ भाजपा ने 2014 में 80 में से 73 सीटें सहयोगी सहित जीतकर जो चमत्कार किया, उसमें बंसल की भूमिका को पार्टी के भीतर बहुत गंभीरता से देखा गया। मुझे वह बता रहे थे कि काँग्रेस या दूसरे दलों में भी गृह मंत्री अमित शाह जैसा रुख रखने वाले लोग मिल जाएंगे; लेकिन वह सुनील बंसल नहीं मिलेगा, जो अमित शाह की पटकथा को हूबहू रणनीति बनाकर ज़मीन पर लागू करने वाली कड़ी बने। 2017 के विधानसभा चुनाव की तैयारी में भी वे आरएसएस भाजपा के बीच अहम पुल बने। आरएसएस भाजपा के बीच पुल बनने वाला व्यक्ति बड़ा जोखिम पर चलता है। वह सरकार को आई हुई सरकार को डुबो भी सकता है और गई हुई सत्ता को लौटा भी सकता है। पहला उदाहरण राजस्थान का है, जहां भाजपा और आरएसएस के तनाव ने वसुंधरा राजे को न केवल सत्ता से अपदस्थ करवा दिया, वे निरंतर जीततीं तो शायद मोदी का विकल्प भी बनतीं। भाजपा में सर्वोच्च स्तर पर उन्हें लेकर जो रिज़र्वेशंस दिखते हैं, वे इस तरफ इशारा करते हैं।
बैक रूम रणनीतिकार से संगठन के पावर सेंटर
भाजपा की उत्तर प्रदेश सफलता केवल मोदी लहर नहीं थी; वह डेटा, बूथ, सामाजिक गठजोड़ और संगठनात्मक अनुशासन की संयुक्त रचना थी। बंसल ने इसी कला को साधा। “मेरा बूथ, सबसे मज़बूत” जैसे अभियानों को केवल नारे नहीं रहने दिया, बूथ-दर-बूथ संरचना, पन्ना प्रमुख मॉडल, स्थानीय प्रभावशाली चेहरों की पहचान और कार्यकर्ता-फीडबैक की ठोस प्रणाली में बदला। 2017 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में भाजपा की अभूूर्व जीत ने बंसल को “बैक-रूम रणनीतिकार” से “संगठन के पावर-सेंटर” में बदल दिया। यूपी में संगठन महामंत्री के रूप में बंसल को 2014 लोकसभा और 2017 विधानसभा की सफलता का श्रेय दिया जाता है। बहुत से पॉलिटिकल विशेषज्ञों ने उन्हें अमित शाह का “मैन फ्राइडे” भी कहा और यह भी लिखा कि वे उम्मीदवार चयन और पदाधिकारियों की नियुक्ति जैसे महत्वपूर्ण मामलों में प्रभाव रखते थे। “मैन फ्राइडे” यानी वह व्यक्ति, जो किसी नेता, अधिकारी या प्रमुख व्यक्ति का बेहद भरोसेमंद, निष्ठावान और सक्षम दाहिना हाथ हो यानी ऐसा सहायक, जो तरह-तरह की जिम्मेदारियाँ चुपचाप और दक्षता से निभा सके। भाजपा में संगठन महामंत्री का पद मुख्यमंत्री और प्रदेश अध्यक्ष के बीच संतुलन बनाने वाली अदृश्य धुरी हुआ करता है। लेकिन राजस्थान में प्रकाशचंद्र के समय यह धुरी उलटी घूमी और इसने भाजपा को सत्ता से बाहर कर दिया। प्रकाशचंद्र बहुत ईमानदार व्यक्ति थे। अल्पभाषी थे। संघ सिद्धांतों के पक्के थे। लेकिन उनकी वसुंधरा राजे से नहीं। वे शायद सुनील बंसल जैसे व्यवहार कुशल नहीं थे, जैसा कि सिद्धांतवादी लोगों के साथ हर जगह हुआ करता है। लेकिन उन्हें हटाया गया तो मोबाइल से सिम निकाली, फ़ोन लौटाया, धोती कुर्ता उठाया और चले गए।

कई प्रदेशों में बीजेपी की सत्ता वापसी का चेहरा
ख़ैर, बंसल की दूसरी चौंकाने वाली विशेषता है कि वे हार से भी संगठन निकालते हैं। बंगाल इसका उदाहरण है। 2021 में भाजपा सत्ता से बहुत दूर रह गई, 2024 लोकसभा में उसका प्रदर्शन 2019 की तुलना में घटा; लेकिन बंसल ने इसे स्थायी पराजय नहीं माना। उन्होंने बंगाल में आंतरिक झगड़े कम करने, केंद्रीय नेतृत्व और प्रदेश इकाई की दूरी घटाने, नाराज़ नेताओं को वापस सक्रिय करने, उम्मीदवारों की स्थानीय लोकप्रियता का आकलन करने और बूथ-स्तर पर ढाँचा फिर से खड़ा करने पर जोर दिया। उन्होंने जातीय समीकरण, स्थानीय मुद्दे, उम्मीदवार की लोकप्रियता और बूथ संरचना तक सूक्ष्म प्रबंधन किया। ओडिशा में उनकी भूमिका और भी दिलचस्प है। 2022 में भाजपा ने उन्हें राष्ट्रीय महामंत्री बनाकर ओडिशा, बंगाल और तेलंगाना जैसे तीन राज्यों की जिम्मेदारी दी। ये तीनों ऐसे क्षेत्र थे, जहाँ भाजपा या तो सत्ता से बाहर थी या मजबूत विस्तार चाहती थी। बंसल को उत्तर प्रदेश के संगठन महामंत्री पद से राष्ट्रीय महामंत्री बनाकर ओडिशा, पश्चिम बंगाल और तेलंगाना का प्रभारी बनाया गया था। उसी रिपोर्ट में इन तीन राज्यों के सामूहिक महत्व की ओर इशारा था। ये मिलकर लोकसभा में 80 सांसद भेजते हैं। ओडिशा में भाजपा ने 2024 में जो किया, वह भारतीय राजनीति में क्षेत्रीय किले के टूटने की मिसाल है। नवीन पटनायक और बीजद का लंबा शासन, प्रशासनिक पकड़ और शांत-छवि; इन सबके बावजूद भाजपा ने वहाँ सरकार बना ली। बंसल की देखरेख में भाजपा ने ओडिशा में संगठन नेटवर्क मजबूत किया, 2024 लोकसभा चुनाव में 21 में से 20 सीटें जीतीं और विधानसभा में पहली बार पूर्ण बहुमत की सरकार बनाई। तेलंगाना में भी भाजपा ने अपना आधार बढ़ाया। वहाँ पार्टी सत्ता में नहीं आई; लेकिन लोकसभा में उसने आठ सीटें जीतकर खुद को कांग्रेस और बीएसआर के बीच तीसरी-चौथी ताकत भर नहीं, आक्रामक विकल्प के रूप में रखा।
हर चुनाव में कमाल की कारीगरी के किरदार
बंसल की राजनीति में “हैरान” करने वाली बात यह है कि वे चमकदार भाषणों से नहीं, संरचना के धीरज वाले गणित से काम करते हैं। वे चुनाव को भावनाओं का महासागर मानते हैं, पर उसे पार करने के लिए नाव की कील, रस्सी, चप्पू और नाविक की गिनती करते हैं। कहाँ जातीय असंतोष है? किस बूथ पर कार्यकर्ता निष्क्रिय है? किस स्थानीय नेता की नाराज़गी से पाँच हजार वोट खिसक सकते हैं? किस उम्मीदवार का नाम ऊपर से मज़बूत दिखता है, मगर गाँव में स्वीकार्य नहीं? किस सीट पर संघ का नेटवर्क मज़बूत है; पर भाजपा का स्थानीय चेहरा कमज़ोर? यही वे प्रश्न हैं, जिनसे बंसल की चुनावी कारीगरी बनती है। एक और महत्वपूर्ण पक्ष है। संघ और भाजपा के बीच उनका पुल होना। संघ के प्रचारक पृष्ठभूमि से आए बंसल भाजपा के राजनीतिक तात्कालिक लक्ष्य और संघ के दीर्घकालिक संगठनात्मक स्वभाव, दोनों की भाषा समझते हैं। यही कारण है कि वे “चुनाव जीतने” और “संगठन खड़ा करने” को अलग-अलग काम नहीं मानते। उत्तर प्रदेश से ओडिशा, तेलंगाना और बंगाल तक उनकी पद्धति यही रही। पहले ढाँचा, फिर संदेश; पहले कार्यकर्ता, फिर प्रचार; पहले बूथ, फिर बड़ा मंच। इसलिए सुनील बंसल को केवल “रणनीतिकार” कहना अधूरा है। वे भाजपा की उस नई शैली का प्रतिनिधित्व करते हैं जिसमें चुनाव अब केवल भाषण, जातीय समीकरण और संसाधन का खेल नहीं रहा; वह माइक्रो-मैनेजमेंट, डेटा, संगठनात्मक अनुशासन, नाराज़गी-प्रबंधन, सोशल इंजीनियरिंग और वैचारिक नेटवर्क के संयोजन का विज्ञान बन चुका है। वे इस विज्ञान के प्रयोगशाला-प्रमुख हैं। सुनील बंसल की भूमिका यह सबक देती है कि अब राजनीतिक दलों को अपने साथ एक ऐसा अलग संगठन भी खड़ा करना होगा, जो उन्हें सुनील बंसल जैसे कार्यकर्ता तैयार करके दे।
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त्रिभुवन (वरिष्ठ पत्रकार) उनकी ‘एक्स’ वॉल से साभार
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