Save Aravali: अरावली मर रही है। उसे मारा जा रहा है। जिन के हाथ में संरक्षण की ताकत है, वे ही मार रहे हैं। सारे मिल कर मार रहे हैं। खत्म कर रहे हैं और सदा के लिए समाप्त करने पर उतारू हैं। खननकर्ताओं को तो वैसे भी अरावली (Aravali) खोदने में मजा आ रहा है, लेकिन सरकार और न्याय व्यवस्था को भी अरावली के अस्तित्व की चिंता नहीं है। अरावली को बचाने की जरूरत है, क्योंकि ये वो पर्वतमाला हैं, जो करीब 2.5 अरब साल से भारत के एक बहुत बड़े हिस्से में बढ़ते रेगिस्तान को रोक रही हैं, तपिश से बचा रही हैं, हरियाली दे रही हैं, पानी बरसा रही है, नदियां दे रही हैं और जीवन का संरक्षण कर रही हैं। अरावली केवल एक भौगोलिक संरचना नहीं, बल्कि राजस्थान सहित गुजरात, हरियाणा और दिल्ली के जनजीवन, संस्कृति और जल सुरक्षा का आधार है। लेकिन, सरकार ने अरावली की पहाड़ियों को भी ऊंच-नीच में बांट दिया है। सरकार बोली, अब 100 मीटर से कम उंचाई की पहाड़ियां अरावली नहीं मानी जाएगी। सुप्रीम कोर्ट भी हां में हां मिलाते हुए बोली रही है कि सरकार ने जो कहा वही सही। अरावली पर सरकार के इसी कदम के घमासान मचा हुआ है।
सरकार की रिपोर्ट से खननकर्ता खुश, अरावली आहत
अरावली संसार की सबसे प्राचीन पर्वतमालाओं में से एक है, लेकिन भारत सरकार और सुप्रीम कोर्ट के एकमत होने पर खननकर्ताओं की खुशी लाजिमी है। वे अरावली को नए सिरे से खोदने की तैयारी में हैं, जिससे हमारी संस्कृति, पर्यावरण और जीवन धारा पर ही समाप्ति का खतरा खड़ा हो गया है। अरावली पर सरकार की नई परिभाषा तय हो जाने के बाद 100 मीटर से छोटी पहाड़ियों को जब अरावली माना ही नहीं जाएगा, तो वहां खनन पर पर्यावरण संरक्षण कानून भी लागू नहीं होंगे। फिर पहाड़, पेड़, जंगल, झरने, ढलान और चट्टान आदि सब कुछ खनन प्रतिबंध क्षेत्र और संवेदनशील ईको ज़ोन की कानूनी सीमा से बाहर हो जाएंगे और जंगलों की अंधाधुंध कटाई, पहाड़ों की लगातार खुदाई, और नए – नए निर्माणों के साथ ही अरावली के अनवरत दोहन के रास्ते भी खुल जाएंगे। जबकि, राजस्थान पानी को तरसता रहा है। दिल्ली साफ हवा के लिए मरी जा रही हैं, और हरियाणा अपना पहाड़ी हरापन खो रहा है। इन हालात में, जब सरकार से ठोस समाधान और नीतिगत हस्तक्षेप की उम्मीद थी, तो सरकार ने यह ऐसा कदम उठाया गया है, जिससे आने वाले वक्त में गंभीर पर्यावरणीय संकट खड़ा होना तय है।
तो 90 फीसदी पहाड़ियां अरावली नहीं
अरावली भले ही हिमालय जैसी ऊंची पर्वत श्रृंखला नहीं है, लेकिन हिमालय से भी पुरानी कऱोड़ों वर्षों में लगातार क्षरण से बनी बेहद पुरानी कम उंचाई वाली पर्वत श्रंखला है, जिसकी सबसे ऊंची चोटी माउंट आबू का गुरुशिखर है, 5652 मीटर उंची। मगर अरावली की 90 फीसदी पहाड़ियों की ऊंचाई 100 मीटर से भी कम है। अरावली पर्वत श्रंखला में कुल कितनी पहाड़ियां हैं, यह देखें, तो 20 मीटर से कम उंचाई की 1 लाख 7 हजार 494 पहाड़ियां है,और 20 मीटर की 12081 पहाड़ियां हैं। 40 मीटर तक उंचाई की 5009 पहाड़ियां हैं, 60 मीटर तक उंचाई की 2656 पहाड़ियां हैं और 80 मीटर तक उंचाई की 1594 हैं। इसे आगे, 100 मीटर तक उंचाई की 1048 पहाड़ियां है। अरावली पर्वत माला की कुल पहाड़ियों में से 100 मीटर से ज्यादा उंचाई वाली पहाड़ियां केवल 8.7 फीसदी ही हैं, तो इसका सीधा सा अर्थ यही है कि अगर भारत सरकार अरावली पर्वत श्रृंखला में 100 मीटर तक की पहाड़ियों में खनन की सिफारिशें वापस नहीं लेती है, तो अरावली पर्वत श्रंखला का लगभग 90 फीसदी हिस्सा आने वाले सालों में खत्म हो जाएगा।

सरकार खनन माफिया की संरक्षक, बोले गहलोत
अरावली पर सरकार के नए कदम से राजस्थान में तीन बार मुख्यमंत्री रहे दिग्गज नेता अशोक गहलोत भी आहत हैं। गहलोत का कहना है कि अरावली पर्वतमाला की पहाड़ियां राजस्थान की धमनियां हैं, इसी से हम सांस लेते हैं, इन्हें हर हाल में बचाना हमारा कर्तव्य है। गहलोत का आरोप है कि वर्तमान सरकार अरावली के संरक्षण के बजाय सरकार खनन माफिया की संरक्षक बनी हुई है, इसीलिए उसकी सिफारिश पर केंद्र ने इस बारे में पिर से सुप्रीम कोर्ट में अरावली के मामले में सिफारिश की है। वह मानते हैं कि अरावली के बिना राजस्थान रेगिस्तान बन जाएगा, इसी कारण जनता जाग रही है। राजनीतिक विश्लेषक निरंजन परिहार कहते हैं कि पूर्व मुख्यमंत्री गहलोत के समर्थन से अरावली बचाओ आंदोलन को राजनीतिक ताकत मिली है। लेकिन इस मुद्दे पर राजनीतिक षड़यंत्र के तहत बीजेपी की सोची – समझी चुप्पी है, उल्टे वकुछ नेता पलटवार भी कर रहे हैं, ताकि इसे केवल विपक्ष का आंदोलन साबित किया जा सके। राजनीतिक विश्लेषक परिहार कहते हैं कि भारत सरकार की अरावली की नई परिभाषा के बाद, अरावली पर्वत श्रंखला का लगभग 90% हिस्सा जब अरावली माना ही नहीं जाएगा, तो यह पर्वतमाला या पर्वत श्रंखला कैसे रहेगी, क्योंकि श्रंखला तो लगातार पहाड़ियों के समूह की अनवरत कतार से ही बनती है। परिहार कहते हैं कि अरावली आंदोलन के समर्थन में पूर्व मुख्यमंत्री गहलोत की सक्रियता ने सामाजिक संस्थाओं, पर्यावरण प्रेमियों, जनसामान्य और खास तौर से युवाओं को बड़े पैमाने पर प्रेरित किया है।
अरावली को खोने का खतरा रोके सरकार
‘अरावली बचाओ आंदोलन’ पर्यावरणविदों, आदिवासियों, सामाजिक संगठनों और राजनीतिक लोगों सहित जन सामान्य को भी एकजुट कर रहा है। ‘पानी बचाओ आंदोलन’ के प्रणेता पर्यावरणविद डॉ राजेंद्र सिंह भन्नाए हुए हैं। वह कहते हैं कि गुजरात से राजस्थान के बीचों बीच से निकलती हुई हरियाणा व दिल्ली तक 692 किलोमीटर में फैली अरावली पर्वत श्रंखला का राजस्थान में 550 किलोमीटर का विस्तार है। खासकर सिरोही, पाली, उदयपुर, राजसमंद, ब्यावर, अजमेर, जयपुर, भीलवाड़ा, बूंदी, दौसा और अलवर में फैली है। डॉ सिंह कहते हैं कि अरावली पर्वतमाला थार मरुस्थल को बढ़ने से रोक रही है और वर्षा जल को संरक्षित करके राजस्थान को जल स्रोत प्रदान करती है। मगर केंद्र सरकार की नई सिफारिशों की वजह अरावली खतरे में हैं, इसीलिए लोग आंदोलित हैं। पर्यावरणविद डॉ सिंह का कहना है कि हवा, जंगल, पहाड़, जल स्रोत और जैव-विविधता हमारे जीवन और भविष्य की बुनियाद हैं।

अरावली में खनन से गंभीर जलवायु संकट
अरावली एक महान पर्वत शृंखला है, इसकी छोटी पहाड़ियां भी उतनी ही अहम हैं, जितनी बड़ी पहाड़ियां। गोड़वाड़ इलाके में वृक्षारोपण अभियान चलाने वाली सामाजिक कार्यकर्ता ज्योति मुणोत कहता है कि ‘अरावली बचाओ आंदोलन’ संसार की सबसे पुरानी पर्वतमाला पर सरकार द्वारा लाए जा रहे इस संकट के विरुद्ध जन जागरण का प्रतीक है। अरावली में अनियंत्रित खनन ने 30 फीसदी से अधिक क्षेत्र को नष्ट कर दिया है। सुप्रीम कोर्ट की 2019 और 2024 की रिपोर्ट्स के हवाले से ज्योति मुणोत कहती हैं कि, पत्थर खदानों से पाली, सिरोही, उदयपुर, अजमेर, अलवर और जयपुर में जल संकट गहराया है और गोड़वाड़ का भूजल स्तर 300 मीटर नीचे चला गया है। शहरीकरण ने इस इलाके में वन क्षेत्र को 20% घटा दिया। दरअसल, अरावली पर्वत श्रंखला के बीच से अगर छोटी पहाड़ियां खनन के लिए खुल गईं, तो कुछ सालों बाद राजस्थान के जनजीवन पर ही बहुत बड़ा खतरा खड़ा होगा।
अरावली की पहाड़ियों को खोदना ख़तरनाक
अरावली बचाओ आंदोलन ने समूचे राजस्थान को झकझोर दिया है। बच्चा – बच्चा अरावली संरक्षण की मांग कर रहा है। जो खनन माफिया अरावली की पहाड़ियों को आज भी खोदते खोदते नहीं थक रहा है, वह सरकार के इस नए फैसले के बाद नए जोश के साथ नई पहाड़ियां खोदकर अपनी तिजोरी भरने के लिए मुश्कें कस रहा है। पर्यावरण विशेषज्ञ इसीलिए चेतावनी दे रहे हैं कि हम पहले से ही विकास के नाम पर अरावली को खोने के खतरे उठा रहे हैं, जबकि इनके बिना विकास का अर्थ ही शून्य रह जाएगा। अरावली की 100 मीटर तक की उंची पहाड़ियों को खनन के लिए खोलने वाला भारत सरकार का बनाया हुआ यह नया रास्ता देश के लिए बेहद ख़तरनाक हो सकता है, क्योंकि अरावली के सिमटने का मतलब है गंभीर जलवायु संकट। अरावली पर्वतमाला पानी देती है, हवा देती है और पर्यावरण को संरक्षित करती है, तभी जीवन सुरक्षित है। दरअसल, अरावली हमारे जनजीवन की पटरी है, और अगर पटरी ही तोड़ दी जाए, तो जिंदगी की रेल कैसे चलेगी?
– आकांक्षा कुमारी
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