Rajasthan Congress: राजस्थान कांग्रेस में नगर निकाय चुनाव अब सिर्फ बीजेपी और कांग्रेस (Congress) के बीच मुकाबले का चुनाव नहीं रह गया है। राजस्थान कांग्रेस (Rajasthan Congress) पार्टी के भीतर टिकट वितरण की प्रक्रिया ने संगठन बनाम व्यक्तिगत राजनीतिक प्रभाव की पुरानी बहस को फिर जिंदा कर दिया है। सबसे बड़ा सवाल यह है कि राजस्थान (Rajasthan) में कांग्रेस जिस संगठनात्मक पुनर्निर्माण की बात कर रही है, उसमें जिला कांग्रेस अध्यक्ष और जिला प्रभारी वास्तव में कितने ताकतवर हैं? कांग्रेस के सबसे बड़े नेता राहुल गांधी जब संगठन में जिलाध्यक्षों को ताकत देने की बात कर रहे हैं, तो फिर नगर निकाय चुनाव उम्मीदवारी तय करने की ताकत विधायकों और विधानसभा चुनाव हार चुके उम्मीदवारों के पास क्यों रही? और क्या राजस्थान कांग्रेस के अध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा (Govind Singh Dotasra) विधायकों और विधायनसभा प्रत्याशियों को ताकत देकर अपनी निजी ताकत बढ़ाने की कोशिश में है? राजस्थान की राजनीति में यह सवाल बवाल मचा रहा है।
जिलाध्यक्षों और प्रभारियों की भूमिका पर सवाल
कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा की ओर से विधायकों और विधानसभा चुनावों में पार्टी के प्रत्याशियों को उनके-अपने क्षेत्रों में नगर निकाय उम्मीदवार तय करने की पर्याप्त छूट दिए जाने की चर्चा ने जिलाध्यक्षों और प्रभारियों के बीच बेचैनी पैदा की है। राजनीतिक रूप से यह व्यवस्था देखने में स्थानीय प्रभावशाली नेताओं को महत्व देने वाली लग सकती है, लेकिन संगठन के नजरिये से इसका संदेश बिल्कुल अलग जाता है। 21 अगस्त को निकाय और पंचायती राज चुनावों की तैयारियों को लेकर प्रदेश कांग्रेस की बैठक में विधायक, विधानसभा प्रत्याशी, जिला कांग्रेस अध्यक्ष और विधानसभा स्तर पर नियुक्त समन्वयक सभी शामिल हुए थे। पार्टी ने जिला स्तर पर प्रत्याशी चयन की प्रक्रिया बनाने की बात भी कही थी। लेकिन टिकट वितरण के स्तर पर जिलाध्यक्षों और प्रभारियों की भूमिका को लेकर अब पार्टी के भीतर सवाल उठने लगे हैं।
जिलाध्यक्षों को ताकत की राहुल गांधी की बात हवा
राहुल गांधी पिछले कुछ समय से कांग्रेस में जिला स्तर के संगठन को मजबूत करने पर जोर देते रहे हैं। उसी के हवाले से राजस्थान की राजनीति के जानकार वरिष्ठ पत्रकार विवेक श्रीवास्तव ने सोशल मीडिया एक्स पर लिखा कि यदि नगर निकायों में प्रत्याशी तय करने की वास्तविक ताकत विधायक और विधानसभा प्रत्याशी के पास ही रहनी थी, तो जिला प्रभारियों की नियुक्ति का राजनीतिक औचित्य ही क्या है? श्रीवास्तव कहते हैं कि राहुल गांधी ने गुजरात में एक सभा में कहा था कि जिले के जिले से चलाना चाहिए और जिले के नेताओं और जिलाध्यक्ष को ताकत देनी चाहिए और उसके विधायक के टिकट देने की भी ताकत देकर उसके हाथ मजबूत करने चाहिए। वरिष्ठ पत्रकार विवेक श्रीवास्तव ‘द हंटर न्यूज’ के अपने एक वीडियो कार्यक्रम में कहते हैं कि राजस्थान कांग्रेस ने जिला कांग्रेस अध्यक्ष और जिला प्रभारी को सारी ताकत देते हुए जिलाध्यक्षों को दरकिनार कर दिया। विवेक श्रीवास्तव का कहना है कि अब कार्यकर्ता राहुल की बात पर भरोसा कैसा करें?
संगठनात्मक पद के बावजूद अधिकार नहीं, तो असंतोष
राहुल गांधी के जिला अध्यक्षों को मजबूत करने का हवाला देते हुए राजनीतिक विश्लेषक निरंजन परिहार ने सोशल मीडिया ‘एक्स’ पर लिखते हैं कि अपने नेता राहुल गांधी के संदेश के उलट उनके प्रदेश अध्यक्ष तो अध्यक्षों के बजाय विधायकों और विधायक चुनाव में हारे हुए उम्मीदवारों को मजबूत कर रहे हैं, क्योंकि इससे उनकी अपनी राजनीति मजबूत होती रहेगी। लेकिन कांग्रेस में अक्सर ऐसा होता है। राजनीतिक विश्लेषक परिहार ने पहले भी कांग्रेस के जिलाध्यक्षों की नियुक्ति को लेकर चेताया था कि पद मिलने से अधिक महत्वपूर्ण यह है कि जिलाध्यक्ष अपने ही जिले के कार्यकर्ताओं का विश्वास हासिल कर पाता है या नहीं। परिहार का तर्क था कि संगठनात्मक पद देकर यदि व्यक्ति को वास्तविक राजनीतिक अधिकार नहीं दिया गया, तो वह पद असंतोष को खत्म करने के बजाय उसे और गहरा कर सकता है। यही बात निकाय चुनाव में और गंभीर हो जाती है। नगर पालिका या नगर निगम का चुनाव मूलतः स्थानीय कार्यकर्ताओं, वार्ड स्तर के समीकरणों और वर्षों से क्षेत्र में काम कर रहे नेताओं का चुनाव होता है।

कांग्रेस की समस्या पार्टी के अपने शक्ति केंद्र की
सोशल मीडिया ‘एक्स’ पर राजस्थान के वरिष्ठ पत्रकार अरविंद चोटिया ने लिखा कि आरआर तिवाड़ी जैसे समर्पित और वरिष्ठ कांग्रेसी नेता आज जिस कारण से धरने पर बैठे, वह चिंता बढ़ाने वाला है। चोटिया की राजस्थान कांग्रेस को लेकर हालिया टिप्पणियों में भी संगठन और बड़े नेताओं के बीच शक्ति-संतुलन का सवाल दिखाई देता है। उनके मुताबिक कांग्रेस नेतृत्व संभवतः यह मानकर चल रहा है कि अशोक गहलोत, सचिन पायलट और डोटासरा जैसे बड़े नेता पार्टी के भीतर ही रहेंगे और इसलिए केंद्रीय नेतृत्व अत्यधिक हस्तक्षेप से बच रहा है। इसका नतीजा यह हो सकता है कि राज्य और स्थानीय स्तर पर नेता अपनी-अपनी राजनीतिक शक्ति बढ़ाने लगें। राजनीतिक विश्लेषक त्रिभुवन के नजरिये से भी राजस्थान कांग्रेस की समस्या केवल चुनावी रणनीति की नहीं, बल्कि पार्टी के भीतर अलग-अलग शक्ति केंद्रों के बनने की है। हालिया राजनीतिक विश्लेषणों में डोटासरा को राजस्थान कांग्रेस में एक स्वतंत्र राजनीतिक धुरी के रूप में उभरते हुए देखा गया है। ऐसे में निकाय चुनाव का टिकट वितरण केवल वार्ड का उम्मीदवार तय करने की प्रक्रिया नहीं, बल्कि कांग्रेस के भीतर भविष्य के शक्ति-संतुलन की कवायद भी बन सकता है।
डोटासरा की खुद को ताकतवर बनाने की कोशिश
इस सबके बीच प्रदेश अध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा की दुविधा भी समझनी होगी। डोटासरा के पास अपने निजी समर्थक विधायकों की कमी है, ऐसे में वे इस चुनाव के जरिए अपना निजी नेटवर्क तैयार कर रहे हैं। वैसा भी विधायक और विधानसभा प्रत्याशी चुनावी राजनीति में तुरंत उपयोगी चेहरे होते हैं। उनके पास क्षेत्रीय नेटवर्क, संसाधन और स्थानीय प्रभाव होता है। डोटासरा समर्थकों का तर्क है कि विधायक और विधानसभा प्रत्याशी को टिकट चयन की जिम्मेदारी इन्हें देने से चुनाव प्रबंधन आसान होगा। लेकिन वरिष्ठ राजनीतिक पत्रकार हरिसिंह राजपुरोहित कहते हैं कि इस स्थिति के साथ जोखिम भी उतना ही बड़ा है कि यदि विधायक और संगठन जिलाध्यक्ष के बीच समन्वय नहीं रहा तो टिकट वितरण बगावत का कारण बन सकता है। राजपुरोहित कहते हैं कि बगावत का बिगुल बज चुका है। जयपुर जैसे बड़े नगर निकाय में ये खतरा पहले से दिखाई दे रहा है, तो प्रदेश भर में छोटी छोटी नगरपालिकाओं के चुनाव में भी लोग कांग्रेस छोड़कर बीजेपी में जाकर चुनाव लड़ रहे हैं।
राजस्थान कांग्रेस की संगठनात्मक परीक्षा का दौर
असल संकट यही है कि कांग्रेस अगर जिलाध्यक्ष को केवल संगठन का चेहरा बनाकर रखती है और राजनीतिक फैसले किसी दूसरे स्तर पर होते हैं, तो कार्यकर्ताओं के बीच जिलाध्यक्ष की विश्वसनीयता कमजोर होगी। दूसरी ओर, विधायक को पूरी तरह नजरअंदाज करना भी व्यावहारिक राजनीति नहीं है। इसलिए समस्या किसी एक पक्ष को ताकत देने की नहीं, बल्कि अधिकारों की स्पष्ट सीमा तय करने की है। नगर निकाय चुनाव इस लिहाज से राजस्थान कांग्रेस के लिए एक संगठनात्मक परीक्षा हैं। पार्टी को तय करना होगा कि वह चुनाव लड़ने के लिए केवल प्रभावशाली चेहरों पर निर्भर रहना चाहती है या ऐसा संगठन खड़ा करना चाहती है जिसमें जिलाध्यक्ष, प्रभारी, विधायक, विधानसभा प्रत्याशी और स्थानीय कार्यकर्ता एक स्पष्ट प्रक्रिया के तहत काम करें। कांग्रेस के भीतर असली सवाल इसलिए टिकट का नहीं, अधिकार की ताकत का है। और कांग्रेस में संगठनात्मक पद अभी भी राजनीतिक अधिकार की गारंटी नहीं हैं, यह राजस्थान कांग्रेस ने इस चुनाव में साबित कर दिया है।
-राकेश दुबे (वरिष्ठ पत्रकार)
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