Rajasthan Nikay Chunav 2026: कांग्रेस पता नहीं कुछ सोच भी रही है या नहीं, लेकिन राजस्थान में निकाय चुनाव (Rajasthan Nikay Chunav 2026) उसके लिए चिंता का विषय साबित हुए हैं। यह चिंता और चिंतन दोनों का विषय है कि कांग्रेस के संगठन सृजन अभियान में संगठन का सृजन हुआ या क्षरण? इन चुनावों ने प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा (Govind Singh Dotasra) के दावों की जमीनी परीक्षा का सच सामने रख दिया। खास बात यह रही कि जहां संख्याबल कांग्रेस के साथ था, कुर्सी बीजेपी ले गई और कहीं जीते हुए कांग्रेसी पार्षद ही बीजेपी के उम्मीदवार बन गए। कांग्रेस के लिए राजस्थान के नगर निकाय चुनाव ने संगठन सृजन अभियान के सामने एक असहज सवाल खड़ा कर दिया है। राजस्थान (Rajasthan) प्रदेश अध्यक्ष डोटासरा लगातार बूथ स्तर तक कांग्रेस की मजबूती के दावे करते रहे, लेकिन निकाय चुनावों में बूथ पर ही कांग्रेस (Congress) बिखरी हुई दिखी। डोटासरा बार – बार बीजेपी (BJP) के प्रदेश अध्यक्ष मदन राठोड़ की खिल्ली उड़ाते रहे, लेकिन नि काय चुनावों में राठोड़ ने डोटासरा की गिल्ली उड़ा दी। कार्यकर्ताओं को एकजुट रखने की बात करने वाले डोटासरा की पार्टी को निकाय चुनावों में बुरी हार का सामना करना पड़ा।

कांग्रेस के बिखराव को बयान करते चुनाव परिणाम
राजस्थान में निकाय चुनाव में बहुमत का गणित कई जगह धरा का धरा रह गया। कांग्रेस के अपने ही खेमे के वोट खिसके, तो कहीं निर्दलियों ने पाला बदला। कुल 309 नगर निकायों में चुनाव हुए। उनमें से, 21 सितंबर तक घोषित 302 निकायों में से बीजेपी ने 200 में बाजी मारी और कांग्रेस ने 94 निकायों में अपना मुखिया बनाया। सात निकायों में निर्दलीय प्रमुख बने। कुल 10 नगर निगमों में जिन 7 के नतीजे घोषित हुए, उनमें से 6 में बीजेपी मेयर पद ले गई, जबकि कांग्रेस को केवल बीकानेर में सफलता मिली। पाली में कांग्रेस का मेयर बनना लगभग तय था, लेकिन कांग्रेस के 29 उम्मीदवार जीतने के बावजूद कांग्रेस के उम्मीदवार को केवल 3 वोट ही मिले। इन चुनावों में 47 नगर परिषदों में टचुनाव हुए जिनमें, बीजेपी को 31 तो, कांग्रेस के केवल 13 में ही जीत हासिल हुई। कुल 252 नगर पालिकाओं में 163 में बीजेपी की जीत हुई, तो कांग्रेस आधे से भी कम 80 में ही सिमट गई। यह केवल बीजेपी की जीत की कहानी नहीं है। यह कांग्रेस के भीतर टिकट, महत्वाकांक्षा, बगावत, क्रॉस-वोटिंग और चुनाव के बाद बदलते राजनीतिक रिश्तों की भी कहानी है। सन 2026 के निकाय प्रमुखों के चुनाव में कई जगह सामने आया वोटों का गणित कांग्रेस के अंदरूनी बिखराव को बयान करता है।
अजमेर-पाली में संख्या कांग्रेस की, सत्ता बीजेपी की
अजमेर इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। कांग्रेस के 37 पार्षद थे। बीजेपी के 32। फिर भी बीजेपी की अनामिका शर्मा को 43 वोट मिले। यानी बीजेपी के अपने पार्षदों से 11 ज्यादा वोट। कांग्रेस के पास संख्या ज्यादा होने के बावजूद मेयर की कुर्सी हाथ से निकल गई। पाली में कहानी और भी तीखी है। बीजेपी के 21, निर्दलीयों के 15 और सबसे ज्यादा कांग्रेस के 29 पार्षद थे। इसके बावजूद बीजेपी की नमिता बुबकिया मेयर बन गईं और कांग्रेस उम्मीदवार को केवल 3 वोट ही मिले। यानी चुनाव के बाद का गठजोड़ और मतदान-व्यवहार वार्ड चुनाव के मूल गणित पर भारी पड़ा। इसी तरह का मामना धौलपुर का भी रहा। धौलपुर में कांग्रेस के 27 पार्षद होने के बवजूद निर्दलीय गिरीश कुमार गर्ग अध्यक्ष बने, जबकि उन्होंने वार्ड चुनाव भी नहीं लड़ा था। जोधपुर में पहले तो 44-44 दोनों के बराबर रहे, लेकिन बाद में रीपोलिंग में बीजेपी की एक सीट बढ़ गई। नतीजे अभी हवा में हैं।
पिण्डवाड़ा और आबूरोड़ का मामला बेहद चौंकाने वाला
सिरोही जिले का पिण्डवाड़ा कांग्रेस के लिए शायद सबसे प्रतीकात्मक मामला है। कांग्रेस ने 25 में से 13 वार्ड जीतकर स्पष्ट बहुमत हासिल किया था। बीजेपी के सात और निर्दलीयों के पांच पार्षद थे। लेकिन कांग्रेस के टिकट पर जीते पार्षद राकेश रावल पार्टी बीजेपी से अध्यक्ष पद के उम्मीदवार बन गए। उन्होंने बीजेपी की सदस्यता ले ली। अध्यक्ष चुनाव में राकेश रावल को 14 वोट और कांग्रेस प्रत्याशी अचल सिंह बालिया को 11 वोट मिले। राकेश रावल को वरिष्ठ कांग्रेसी माना जाता था, लेकिन वे पपद के लिए पार्टी छोड़ गए। आबूरोड का मामला कांग्रेस की आंतरिक राजनीति को दूसरे कोण से सामने लाता है। वार्ड 16 से कांग्रेस की नरगिस कायमखानी चुनाव जीतीं। वह नगर कांग्रेस की अध्यक्ष हैं। नगर पालिका अध्यक्ष बनने के लिए उन्होंने खूब जोर लगाया, लेकिन कांग्रेस ने शोभा जोशी को अधिकृत उम्मीदवार बनाया। अंततः बीजेपी की भावना अग्रवाल को 27 वोट मिले और वे अध्यक्ष बनीं, जबकि बीजेपी के पास 20 पार्षद ही थे। स्थानीय राजनीतिक हलकों में यह चर्चा है कि टिकट नहीं मिलने से नाराज नरगिस ने, नगर अध्यक्ष होने के बावजूद अपनी ही पार्टी कांग्रेस के खिलाफ मतदान किया और बीजेपी को समर्थन पहुंचाया। लेकिन गोपनीय मतदान होने के कारण नरगिस के ऐसे मतदान की प्रत्यक्ष पुष्टि नहीं है। मगर, इतना जरूर है कि आबूरोड का परिणाम कांग्रेस की एकजुटता को लेकर सवाल पैदा करता है।

बागी, निर्दलीय और गुट, कांग्रेस की तीन चुनौतियां
निकाय चुनावों में कांग्रेस की समस्या तीन स्तरों पर दिखाई देती है। पहला — बागी। टिकट नहीं मिला तो नेता निर्दलीय हुए या दूसरी पार्टी में चले गए। पिण्डवाड़ा इसका प्रत्यक्ष उदाहरण है। दूसरा — निर्दलीय। इन चुनावों में 10,244 वार्डों में से बीजेपी ने 4,182, कांग्रेस ने 3,619 और निर्दलीयों ने 2,273 वार्ड जीते। इतने बड़े निर्दलीय समूह ने अनेक निकायों में अध्यक्ष चुनाव का समीकरण बदलने की क्षमता दिखाई। तीसरा — आंतरिक गुटबाजी। निकाय चुनाव में प्रत्याशी अक्सर स्थानीय राजनीति के केंद्र बन जाते हैं। विधायक, पूर्व विधायक, स्थानीय संगठन और व्यक्तिगत समर्थक—सभी की अपनी पसंद होती है। टिकट वितरण के बाद नाराजगी बची रह जाए तो चुनाव के दिन उसका असर दिखाई दे सकता है। कांग्रेस के खेमे में मायूसी है। राजस्थान कांग्रेस अध्यक्ष गोविंद डोटासरा ने कहा कि कांग्रेस जनता की अदालत में जीती है, लेकिन बीजेपी ने सत्ता की ताकत और पैसे के बल पर चुनाव जीता,कांग्रेस के पार्षदों को धमकाया। जबकि असल में डोटासरा कांग्रेस की कमजोरी का बयान ही नहीं कर रहे।
फेल रहा डोटासरा के संगठन सृजन का परीक्षाफल
कांग्रेस के सामने अब सवाल केवल यह नहीं है कि उसने कितनी सीटें जीतीं। सवाल यह है कि जीते हुए पार्षदों को कितनी मजबूती से अपने साथ रखा। पार्टी ने कई जगह बीजेपी पर दबाव और सरकारी मशीनरी के इस्तेमाल के आरोप लगाए हैं। बीजेपी ने इन आरोपों को खारिज किया है। लेकिन इन आरोपों से अलग कांग्रेस को अपने भीतर भी देखना होगा। क्योंकि अजमेर में संख्या थी, कुर्सी नहीं। पाली में संख्या थी, सत्ता नहीं। पिण्डवाड़ा में कांग्रेस का जीता पार्षद ही बीजेपी का अध्यक्ष बन गया। आबूरोड में पार्टी के भीतर टिकट और दावेदारी का विवाद चर्चा में रहा। यही निकाय चुनाव का सबसे बड़ा राजनीतिक संदेश है — चुनाव केवल वोट से नहीं जीते जाते। संगठन वोटों को कुर्सी तक पहुंचाता है। और जहां संगठन की कड़ियां कमजोर पड़ती हैं, वहां सबसे बड़ा दल भी सबसे छोटी कुर्सी के सामने बड़ा दिखते-दिखते छोटा हो सकता है।
– आकांक्षा कुमारी
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