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Home»देश-प्रदेश»Parliament Election: महानगरों में मतदान का मंजर मरा – मरा सा क्यूं है?
देश-प्रदेश 5 Mins Read

Parliament Election: महानगरों में मतदान का मंजर मरा – मरा सा क्यूं है?

Prime Time BharatBy Prime Time BharatMay 21, 2024No Comments
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Parliament Election: मुंबई में इस बार बेहद कम मतदान (Polling) हुआ। महज 49.4 प्रतिशत। मतलब साफ है कि महानगरों (Metro City) में मतदान का प्रतिशत लगातार गिरता जा रहा है।  बीते लोकसभा चुनाव (Parliament Election) में भी मतदान कम हुआ था और इस बार भी कम मतदान का सिलसिला जारी रहा। देश की आर्थिक राजधानी मुंबई (Mumbai) की सभी छह लोकसभा सीटों सहित महाराष्ट्र की 13 सीटों पर 20 मई को मतदान हुआ जो बमुश्किल 50 फीसदी के आंकड़े को पार कर पाया है। हालांकि, यह सिर्फ मुंबई ही नहीं है जहां मतदान का प्रतिशत बेहद खराब रहा। देश के बाकी महानगरों और बड़े शहरों में, बेंगलुरु, जहां 26 अप्रैल को मतदान हुआ था, वहां 54.76 प्रतिशत मतदान हुआ। चुनाव आयोग (Election Commission) के आंकड़ों के मुताबिक, लखनऊ में अनुमानित 52.03 प्रतिशत मतदान हुआ। चेन्नई के तीन संसदीय क्षेत्रों में कुल मिलाकर 55.94 प्रतिशत मतदान हुआ। पुणे में 53.54 प्रतिशत मतदान हुआ, जबकि हैदराबाद में 45.07 प्रतिशत का निराशाजनक मतदान दर्ज किया गया। दिल्ली, जहां 25 मई को मतदान होगा, ने पिछले लोकसभा चुनाव में 56.87 प्रतिशत मतदान हुआ था।लेकिन ऐसा क्यों है, यह एक बड़ा सवाल है।

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  • ‘कुछ भी नहीं बदलेगा’ की धारणा जिम्मेदारः परिहार
  • शहरों के अनसुलझे मुद्दों से लोग निराशः सोनवलकर
  • युवा निराश, कहते हैं कि वोट देने से क्या हो जाएगा
          • -आकांक्षा कुमारी

‘कुछ भी नहीं बदलेगा’ की धारणा जिम्मेदारः परिहार

चुनाव आयोग के वोटर टर्नआउट ऐप के अंतिम आंकड़ों के अनुसार, मुंबई की सभी छह सीटों सहित महाराष्ट्र में के 13 लोकसभा निर्वाचन क्षेत्रों में सबसे कम 49.04 प्रतिशत मतदान हुआ। वास्तव में, चुनाव आयोग के अनुसार, मुंबई की छह लोकसभा सीटों में से किसी ने भी 50 प्रतिशत मतदान का आंकड़ा पार नहीं किया। राजनीतिक विश्लेषक निरंजन परिहार मानते हैं कि मुंबई शहर के ज्यादातर लोग राजनीतिक रूप से उदासीन हैं। इस तथ्य की व्याख्या करते हुए राजनीतिक विश्लेषक परिहार कहते हैं कि न केवल मुंबई बल्कि देश भर के शहरी जनमानस के मन में यह धारणा प्रबल होती जा रही है कि ‘कुछ भी नहीं बदलेगा’। इसी के परिणामस्वरूप, लोगों की शहरी मुद्दों और समस्याओं, जैसे गरीबी, अपराध, पर्यावरण क्षरण और राजनीति में रुचि कम हो जाती है, जो शहरों और उसके निवासियों को प्रभावित करती है। दरअसल, कम मतदान को शहरों में रोजगार प्रदान करने वाले प्रमुख क्षेत्रों के बड़े पैमाने पर अनौपचारिकीकरण का भी प्रतिबिंब है, जिससे लोगों के लिए आजीविका चलाना भी एक कठिन काम हो गया है।  परिहार कहते हैं कि इसी कारण चुनाव आयोग की मुंबई शहरवासियों से अधिक संख्या में मतदान करके मुंबई के कम मतदान करने के कलंक को मिटाने की अपील का भी कोई असर नहीं हुआ।

शहरों के अनसुलझे मुद्दों से लोग निराशः सोनवलकर

मुंबई में हुए मतदान का विश्लेषण किया जाए, तो वह तो सचमुच बेहद ही खराब रहा। वरिष्ठ पत्रकार संदीप सोनलवकर कहते हैं कि मुंबई में इस बार पड़ रही अत्यधिक गर्मी भी लोगों को मतदान से बाहर निकलने से रोकने में बड़ा कारण रहा। सोमवार को मुंबई का तापमान 34 डिग्री सेल्सियस दर्ज किया गया। सोनवलकर बताते हैं कि शहर के मुद्दों की जटिलता मुंबई के निवासियों को असहाय महसूस कराती है। इसके अतिरिक्त यहां के लोगो में अपनेपन की कमी है, और राजनेताओं के प्रति कोई बहुत सम्मान नहीं है। वे कहते हैं कि मुंबई शहर और ठाणे जिले के कल्याण में भी मतदाताओं ने बुनियादी सुविधाओं की कमी की शिकायत है। सोनलवकर कहते हैं कि युवा वर्ग की महानगरों में राजनीति में कोई खास रुचि नहीं है, वे वोट देना भी नहीं चाहते, उनकी प्राथमिकताएं भी कुछ और ही हैं। एचडीएफसी के पूर्व चेयरमैन दीपक पारेख कहते हैं कि हालांकि वह ऐसे कई लोगों को जानते हैं जो वोट डालने के लिए एक घंटे तक इंतजार करते रहे लेकिन गर्मी के कारण लौट आए।

युवा निराश, कहते हैं कि वोट देने से क्या हो जाएगा

मुंबई उत्तर में 46.91 प्रतिशत मतदान हुआ, जबकि मुंबई उत्तर मध्य मुंबई में अनुमानित 47.46 प्रतिशत मतदान हुआ। मुंबई उत्तर पूर्व सीट पर 48.67 प्रतिशत मतदाताओं ने मतदान किया। मुंबई उत्तर पश्चिम में 49.79 प्रतिशत मतदान हुआ। चुनाव आयोग के वोटर टर्नआउट ऐप के अनुसार, मुंबई दक्षिण में अंतिम मतदान 44.63 प्रतिशत और मुंबई दक्षिण मध्य में 48.80 प्रतिशत था। मुंबई में 116 उम्मीदवारों की किस्मत पर मुहर लगाने के लिए 99 लाख से अधिक मतदाता वोट डालने के पात्र थे। इतिहास पर नजर डालें, तो मुंबई में मतदान का प्रतिशत आम तौर पर ख़राब रहा है। 1991 के लोकसभा चुनावों में यह घटकर अब तक के सबसे निचले स्तर 41.2 प्रतिशत पर आ गया था। शहरी उदासीनता उन कारकों में से एक है जो भारत की वित्तीय राजधानी में मतदान को प्रभावित करते हैं। महानगरों, यानी शहरों में मतदान बेहद कम होने के कुछ कारण और भी है, जिनमें बेकारी, रोज कमाने – खाने की मजबूरी, वोट देने से क्या होगा की मानसिकता, और ज्यादातर मतदान केंद्रों पर, मोबाइल फोन न ले जाने की बाध्यता।  वैसे, पांचवें चरण के मतदान की पूर्व संध्या पर चुनाव आयोग ने मुंबई, ठाणे और लखनऊ में पिछले दिनों मतदाताओं की उदासीनता को देखते हुए उनसे इस बार अधिक संख्या में मतदान करने का आग्रह किया था, लेकिन कोई फर्क नहीं पड़ा। लोकसभा चुनाव के पांचवें चरण के अंतिम दौर में यह देखने वाली बात होगी कि 25 मई को होनेवाले मतदान में, इस बार राष्ट्रीय राजधानी के मतदाता किस संख्या में वोट देने आते हैं।

-आकांक्षा कुमारी
Election Commission Metro City Mumbai Parliament Election Polling
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