Budget 2026: देश ने कई बजट देखे हैं, लेकिन ऐसा बजट (Budget) नहीं देखा। ब्लैक फ्राइडे सुना था, लेकिन ब्लैक संडे पहली बार सुना। कोई बजट इतना बुरा कैसे हो सकता है? यह सवाल सरकार पर कोई व्यंग्य नहीं, जनभावना के आदर का है। उधर, संसद में नरेंद्र मोदी (Narendra Modi) सरकार की वित्त मंत्री बजट (Budget 2026) पेश कर रही थी, लोकसभा तालियां बजा रही थीं। और निवेशकों में मातम पसर रहा था। भाषण के हर पन्ने के पलटने साथ निवेशकों की उम्मीदें पुराने पन्नों की तरह फटती चली गईं। नतीजा, एक ही दिन में 11 लाख करोड़ रुपये हवा हो गए। यह सरकार की उपलब्धि है या निवेशकों के साथ धोखा, तय करना मुश्किल है। निवेशक कोई सूट – बूट वाले कार्पोरेट देवता नहीं होते। वे वही हैं जो महीने के आख़िर में ईएमआई जोड़ते हैं, बच्चों की फीस गिनते हैं, और बचत खाते से थोड़ा सा निकालकर बाज़ार में लगाते हैं। नौकरीपेशा, छोटे दुकानदार, किसान, मज़दूर, सब ने आज नहीं तो कल के भरोसे निवेश का रास्ता चुना। सरकार ने भी सबको यही सिखाया, निवेश करो, देश बढ़ाओ। और जब देश बढ़ाने की बारी आई, तो निवेशकों का धन ही साफ कर दिया।
उधर वित्त मंत्री का भाषण, इधर बाज़ार धड़ाम
पिछले कुछ वर्षों में निवेश का कल्चर बढ़ा है, यह तथ्य है। डीमेट खातों की संख्या रिकॉर्ड स्तर पर पहुंची। भारत में कुल डीमैट खाते जनवरी 2026 तक 21.6 करोड़ से अधिक और म्यूचुअल फंड फोलियो की कुल संख्या 26.13 करोड़। एसआईपी हर गली-मोहल्ले की चर्चा बन गया। खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी देश के इस निवेश उत्साह से परिचित हैं। तभी तो वे निवेश के प्लेटफ़ॉर्म्स से संवाद करते दिखते हैं। जिरोधा के सीईओ को घर बुलाकर इंटरव्यू देते हैं। स्कूल-कॉलेज के छात्र भी एसआईपी करने लगे, कंपाउंडिंग पर चर्चा करने लगे। देश ने सरकार पर भरोसा किया, मोदीजी पर विश्वास जताया। लेकिन बजट आया, तो उधर वित्त मंत्री का भाषण, इधर बाज़ार धड़ाम। सेंसेक्स एक ही दिन में 2370 अंक तक लुढ़का। निफ्टी करीब 749 अंक तक फिसल गया। और करोड़ों निवेशकों की जेब से 11 लाख करोड़ रुपए एक झटके में गायब। अर्थशास्त्र में इसे ही विश्वास का अवमूल्यन कहते हैं। और आपकी – हमारी भाषा में हमारी बचत पर डाका।

सपने टूट गए, जीवन रूठ गया, भरोसा फूट गया
सरकार फिर भी कहती है, बजट अच्छा है। अरे अच्छा है, तो फिर बाज़ार क्यों रोया? बजट अच्छा है, तो आम आदमी की बचत क्यों पिघली? बजट अच्छा है, तो म्यूचुअल फंड की कमाई क्यों फुर्र हो गई, वह भी इतनी कि मूलधन तक संकट में? सवाल सरल हैं, जवाब भी साफ चाहिए। पर जवाबों की जगह आश्वासन मिलेंगे – निवेश को लॉन्ग टर्म में देखिए। सच तो यह है कि लॉन्ग टर्म वही देखेगा, जिसके पास जीवन में शॉर्ट टर्म भी बचा होगा। यहां तो सारी टर्में ही टर्मिनेट हो गई हैं। देश हैरान है कि उसके पूरे 11 लाख करोड़ एक झटके में छिन कैसे गए। सपने टूट गए। जीवन रूठ गया। और भरोसा फफोले की तरह फूट गया। सरकारी पाप इसी तरह होते हैं। विकास का आईना दिखाकर। विकास कब होगा, कैसे होगा, किसके लिए होगा, और किसका हो रहा है, कौन जाने। यह पाप इसलिए है मोदीजी, क्योंकि यह केवल आम आदमी का आर्थिक नुकसान नहीं, सरकार की नैतिकता पर चोट है। सरकारों का काम भरोसा बनाना होता है, तोड़ना नहीं। बजट अगर सुधार का औज़ार है, तो पहला सुधार निवेशक के विश्वास से शुरू होना चाहिए था। लेकिन यहां तो बजट भाषण के साथ ही भरोसा भर-भराकर गिर पड़ा, और कोई उठाने भी नहीं आया।
नरेंद्र मोदी की नीयत पर भरोसा, लेकिन कब तक
सरकार की कोशिशों से देश को निवेश की आदत सिखाई गई, एसआईपी की आदत लगाई गई और और फिर उसी आदत की सज़ा दे दी गई। देश का आम नागरिक अब भी अपने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की नीयत पर भरोसा करता है, क्योंकि वे गरीब घर से निकले हैं। लेकिन वही भरोसा करने वाला ऐसे ही लुटता रहा, तो भरोसा कब तक करेगा, यह राम जाने! अपना सवाल है कि अच्छे बजट का प्रमाण अगर चेहरों की मुस्कान से मिलता है, तो आज देश के करोड़ों बचतकर्ताओं के चेहरे क्यों बुझे हुए हैं? सवाल यह भी है कि कोई बजट आम आदमी के 11 लाख करोड़ कैसे डुबो सकता है? इसका अगर आपके पास कोई जवाब हो, तो अनुरोध है कि कृपया प्रधानमंत्री तक भेज दें, ताकि वे देश को उत्तर दे सकें, क्योंकि निवेशकों के लुटने के अंतिम उत्तरदायी तो आखिर मोदीजी ही है…!
– निरंजन परिहार (राजनीतिक विश्लेषक)
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