-अभिमन्यु सिंह राजवी
Bhairon Singh Shekhawat: आपातकाल की वह रात आज भी भारतीय लोकतंत्र की स्मृतियों में किसी काले अध्याय की तरह दर्ज है। आधी सदी बीत जाने के बाद भी जब उस दौर का ज़िक्र होता है, तो उस दौर के दर्द को देख चुके परिवारों के लोगों की आंखों में भय, संघर्ष और साहस की मिली-जुली तस्वीरें तैरने लगती हैं। उन्हीं यादों के धुंधलके में आपातकाल (Emergency) का एक दृश्य ऐसा भी है, जो राजस्थान की हवाओं में आज तक जीवित है — उस दौर में जनसंघ के तेजस्वी नेता भैरोंसिंह शेखावत (Bhairon Singh Shekhawat) की गिरफ्तारी की घटना।
और पल पल बढ़ती गई गिरफ्तारी की आशंका
भैरोंसिंह शेखावत उन दिनों सांसद थे और दिल्ली में संसद सत्र के सिलसिले में गए हुए थे। उधर जयपुर से उनकी धर्मपत्नी ठकुरानी सूरज कंवर अपनी नन्हीं बेटी रतन कंवर को लेकर पीहर, बुचकला गई हुई थीं। रतन कंवर वही, जो राजस्थान के दिग्गज बीजेपी नेता नपरत सिंह राजवी की पत्नी है। गांव में उत्सव जैसा वातावरण था। पूरे पीपाड़ और आसपास के इलाके में एक अलग ही खुशी थी। पहली बार उनके “जवाईं सा” सांसद बनकर ससुराल आने वाले थे। रिश्तेदारों के चेहरे गर्व से दमक रहे थे, और गांव की हवाओं में मानो उत्सुकता घुल गई थी। लेकिन नियति ने उस रात कुछ और ही लिख रखा था। दिल्ली से जयपुर लौटते हुए भैरोंसिंह जी रात की ट्रेन में बैठे थे। जयपुर पहुंचे तो रात गहरी हो चुकी थी। उनींदी आंखों और थके कदमों के साथ वे जयपुर में एमएलए क्वार्टर्स जालूपुरा स्थित अपने घर पहुंचे। घर सूना था। परिवार का कोई सदस्य वहां नहीं था। उन्होंने अकेले ही चाय बनाई और शांत मन से बैठ गए। तभी अचानक टेलीफोन की घंटी बज उठी। उन्होंने रिसीवर उठाया, पर दूसरी ओर सन्नाटा था। कुछ क्षण बाद कॉल कट गई। ऐसा कई बार हुआ। उनके मन में एक अनजानी आशंका कौंध उठी। इतने में दरवाज़े पर दस्तक हुई। सामने जनसंघ के प्रदेशाध्यक्ष भानुकुमार शास्त्री खड़े थे। उनके चेहरे पर चिंता की गहरी रेखाएं थीं। थोड़ी ही देर में वरिष्ठ नेता सतीशचंद्र अग्रवाल और गुमानमल लोढ़ा भी वहां पहुंच गए। कमरे का वातावरण अचानक भारी हो उठा।

साथियों को ऐसे बचाया गिरफ्तारी से उन्होंने
भानुकुमार जी ने धीमे स्वर में कहा, “इंदिरा गांधी ने देश में इंटरनल इमरजेंसी लगा दी है… अटल जी, जेपी, आडवाणी जी… सबको गिरफ्तार कर लिया गया है।” कुछ क्षणों के लिए कमरे में सन्नाटा छा गया। फिर गुमानमल लोढ़ा बोले, “अब हमें भी शायद नहीं छोड़ेंगे…” भैरोंसिंह जी ने मेज पर रखे टेलीफोन की ओर देखते हुए कहा, “लगता है मेरा फोन भी टैप हो रहा है… बार-बार घंटी बजती है और तुरंत कट जाती है।” सतीशचंद्र जी गंभीर स्वर में बोले, “हम चारों को एक साथ यहां नहीं रुकना चाहिए… पुलिस कभी भी आ सकती है।” और तभी, जैसे समय ने उनकी आशंका को सच कर दिया हो। भैरोंसिंह जी ने खिड़की से बाहर झांका। बाहर जयपुर कलेक्टर और एसपी अमिताभ गुप्ता पुलिस बल के साथ उनके घर में प्रवेश कर रहे थे। शेखावत ने तुरंत साथियों से कहा, “आ सकती क्या हैं… वो तो आ गए। आप लोग पीछे वाले कमरे में चले जाओ। खिड़की से निकलने की कोशिश करो। किसी भी तरह यहां से निकल जाओ। जब तक मैं इन्हें उलझाता हूं।” भानुकुमार जी और गुमानमल लोढ़ा पीछे वाले कमरे की ओर गए। बाद में दरवाज़ा खुला और अधिकारी भीतर आते ही बोले – “सॉरी सर… हमें आपको गिरफ्तार करने के आदेश मिले हैं। मीसा के तहत आपको हिरासत में लिया जा रहा है।” कमरे में तनाव घुल गया। भैरोंसिंह जी और सतीशचंद्र अग्रवाल जानते थे कि अब बच निकलना संभव नहीं। फिर भी दोनों अधिकारियों से बहस करते रहे, ताकि पीछे वाले कमरे से उनके साथी सुरक्षित निकल सकें। कुछ देर बाद पुलिस ने भैरोंसिंह जी को हिरासत में ले लिया। उधर सतीशचंद्र जी भी अपनी सूझबूझ से समय निकालते रहे। उन्होंने अधिकारियों से कहा, “मुझे पहले कोर्ट ले चलो। आज मेरी पेशी है। अगर मैं नहीं पहुंचा तो आप सब पर कंटेम्प्ट ऑफ कोर्ट लग जाएगा।”

‘राजस्थान का एक ही सिंह’ जैसे नारों की गूंज
यह भी दरअसल साथियों को बच निकलने का समय देने की एक युक्ति थी। जब पुलिस उन्हें बाहर ले जाने लगी, तब भैरोंसिंह जी ने घर बंद करने के बहाने कुछ पल और मांगे। वे पीछे वाले कमरे तक गए। वहां खिड़की खुली थी और कमरा खाली। यह देखकर उनके चेहरे पर हल्की संतोष की रेखा उभरी — साथी सुरक्षित निकल चुके थे। बाहर तक आते-आते जनसंघ के कार्यकर्ता जमा होने लगे थे। पुलिस की गाड़ियों को देखकर लोगों में आक्रोश फैल गया। जैसे ही भैरोंसिंह जी को गिरफ्तार होते लोगों ने देखा, वातावरण नारों से गूंज उठा — “भारत माता की जय!” “इंदिरा गांधी मुर्दाबाद!” “राजस्थान का एक ही सिंह — भैरोंसिंह…! भैरोंसिंह…!” विदाई की उसी भीड़ में उनके भतीजे रविंद्र सिंह भी खड़े थे। भैरोंसिंह जी ने उन्हें पास बुलाया, घर की चाबी उनके हाथ में रखी और भर्राए गले से कहा, “यह आपकी काकीसा को दे देना… उनका और बेबी का ख्याल रखना… हमारा अब कुछ पता नहीं…” पुलिस की गाड़ी आगे बढ़ गई, लेकिन ‘राजस्थान का एक ही सिंह’ जैसे नारों की गूंज देर तक हवा में तैरती रही। वर्षों बाद भी भैरोंसिंह शेखावत की बेटी रतन कंवर जब उस रात को याद करती हैं, तो उनकी आंखें नम हो जाती हैं। उन्हें आज भी अपने पिता के वे शब्द सुनाई देते हैं — “काकीसा और बेबी का ख्याल रखना…” आपातकाल की वह रात केवल एक गिरफ्तारी की कहानी नहीं थी। वह लोकतंत्र के लिए लड़े गए शेखावत के साहस, त्याग और लाखों परिवारों के मौन संघर्ष की ऐसी दास्तान थी, जिसे इतिहास कभी भुला नहीं सकेगा।
(लेखक वरिष्ठ नेता नरपतसिंह राजवी के पुत्र और स्व. भैरोंसिह शेखावत के नाती हैं)
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