Arijit Singh: सिनेमा में पार्श्व गायन से अरिजीत सिंह (Arijit Singh) का अचानक संन्यास। जैसे, कोई चमकता सितारा अचानक टूटकर गिर जाए। जैसे किसी गहरे हरे पेड़ पर खिली धूप अचानक ठहर जाए। जैसे, सांसों में सजती कोई सुगंध सहसा सहम जाए। अरिजीत अवाक कर गए। यह सिर्फ एक गायक का थम जाना नहीं है। यह करोड़ों दिलों की धड़कन का ठहर जाना है। अरिजीत सिंह, नाम नहीं, एक एहसास है। उनकी गायकी ने कभी कभी शोर नहीं किया, वह धीरे-धीरे दिलों में उतरी। जैसे बारिश की पहली बूंद, जमीन में उतर कर मिट्टी की महक में मिलती है। जैसे रात में जगे हुए किसी अकेले ख्याल में खिलती है। जैसे सुबह के सूरज की चमकीली धूप हमको निखारती है। जिस आवाज़ ने हमें ‘तुम ही हो’ में जीना सिखाया। जिसने ‘अगर तुम साथ हो…’ में टूटना सिखाया। जिसने ‘चन्ना मेरेया – मेरेया…’ में ‘अच्छा चलता हूं, दुआओं में याद रखना…’ गाकर हमें विदा होने का साहस दिया। वही आवाज़ खुद हमसे विदा ले रही है।
सिनेमाई संसार में सलमान की सियासत का साया
सिनेमा के संसार में सब कुछ सरल नहीं होता। यहां सुर से ज़्यादा समीकरण चलते हैं। संगीत से ज्यादा सियासत का शोर सुना जाता है और प्रतिभा से ज़्यादा किसी के अहम की सत्ता बोलती है। यहां अभिनय से ज़्यादा अहंकार गूंजता है। अरिजीत ने यह सब देखा। बहुत करीब से, सहज होकर, चुप रहकर। वह 2014 का एक अवार्ड फंक्शन था। सुस्त नजर आ रहे अरिजीत का सलमान खान ने मजाक उड़ाया, तो उन्होंने भी जवाब दे दिया। सिर्फ इतना सा कि ‘आप लोगों ने सुला दिया था’। और फिर, एक अघोषित सज़ा। बॉलीवुड के दो बड़े नाम। मगर अरिजीत के मुकाबले सलमान की सिनेमा जगत पर बड़ी सत्ता। फिल्मों के पोस्टरों से अरिजीत का नाम गायब होने लगा। परदे पर गानों में उनकी आवाज़ थमने लगी। जैसे रेडियो से अचानक कोई फ्रिक्वेंसी हट जाए। कोई आदेश नहीं, कोई नोटिस नहीं, बस एक चुपचाप सी खामोशी। यह वही आवाज़ थी जो उन दिनों हर प्रेम की कहानियों की पतवार हुआ करती थी। फिर आई एक सार्वजनिक माफ़ी। वह साल 2016 था। अपमान का घूंट पीकर अरिजीत ने फिर गाया। उसी के लिए, जिसके अघोषित आदेश ने उन्हें किनारे कर दिया था। क्योंकि अरिजीत गायक नहीं थे। वह साधक हैं संगीत के।

अरिजीत ने सिखाया दर्द को पीना – खूबसूरती से जीना
मगर, हर साधना की एक सीमा होती है। हर धैर्य का एक दायरा होता है। हर चुप्पी एक दिन टूटती है। और अब… वह टूट गई। अरिजीत का संन्यास किसी विरोध का शोर नहीं है। यह थके हुए मन की फुसफुसाहट है। हर खामोशी भी कुछ न कुछ बोलती है। अरिजीत बोले – ‘अब बस।‘ विडंबना देखिए। किसी ने उन्हें परदे से दूर रखा, मगर दुनिया ने उसी दौर में उन्हें अपने दिलों में और गहरा बसा लिया। लाइव कॉन्सर्ट्स। हजारों नहीं, लाखों लोग। हर उम्र के, हर देश में। लंदन के ग्रीन विच का ‘O2 – एरीना’ मिलेनियम डोम, संसार का सबसे प्रतिष्ठित और कॉन्सर्ट। ऐतिहासिक हाउसफुल। एक भारतीय पार्श्व गायक। विदेशी धरती और हजारों संगीत प्रेमियों का हुजूम। पूरा एरीना एक साथ गा रहा था — ‘हमारी अधूरी कहानी…।’ यह कॉन्सर्ट न केवल संगीत के लिहाज से बल्कि सांस्कृतिक रूप से भी ऐतिहासिक था। 02-एरीना का विशाल डोम अरिजीत सिंह की वैश्विक लोकप्रियता का गवाह बना। अपन भी उसी शो के दर्शक थे, और अरिजीत को साक्षात सामने सुन रहे थे। उस शो के लिए उनको 12 करोड़ रुपए मिले। लंदन में दुनिया के इस सबसे प्रतिष्ठित स्थल में परफॉर्म करने वाले और अब तक की सबसे बड़ी भीड़ जुटाने वाले कलाकारों में अरिजीत सबसे आगे निकल गए। उस रात कोई सुपरस्टार नहीं था। सिर्फ उनकी आवाज़ थी। लंदन की धरती से दुनिया के लाखों दिल जीत लिए जिसने, आज वही आवाज़ सिनेमा से दूर जा रही है।
मगर दुनिया ने अपने दिलों में और गहरा बसा लिया
दरअसल, यह संन्यास नहीं लगता। यह किसी टूटे हुए दिल का विराम लगता है। शायद अब अरिजीत किसी कॉरपोरेट समझौते के लिए नहीं गाएंगे। सिनेमा के किसी गुट की अनुमति से नहीं गाएंगे। अब वह सिर्फ अपने मन के लिए गाएंगे, और मन का गाएंगे। क्योंकि कुछ आवाज़ें सिर्फ मनोरंजन नहीं होतीं। वे जिंदगी में सहारा बनकर आती हैं। जब शब्द कम पड़ जाते हैं। जब आंसू बहने से डरते हैं। जब सांसें सहमी सी होती है। सहारे की उन आवाज़ों में से एक सबसे सुरीली आवाज खामोश हो रही है। खामोशी भी ऐसी कि जैसे संगीत से सजते हुए साज़ के सुर किसी ने अचानक मद्धम कर दिए हों। जमाना हत्तप्रभ है। क्योंकि अरिजीत ने सिखाया कि दर्द को पिया कैसे जाता है, उसे पीकर भी खूबसूरती से जिया कैसे जाता है। जब अरिजीत स्टेज पर आते हैं, भीड़ शोर नहीं करती, सांस रोक लेती है। मगर, जब सफलता किसी के दामन से लिपट रही हो, और जब दुनिया किसी को सर आंखों पर बिठाए हुए हो, तब अचानक कोई अपना झोला उठाए और कहे – ‘बस, बहुत हुआ, अब हम चले।’ ये साहस, ये विरक्ति, ये फकीरी… उसी अरिजीत सिंह में हो सकती थी, जो स्टेज पर भी हवाई चप्पल पहनकर चढ़ जाता था। जिसे न स्टारडम का नशा था, न लाइमलाइट की भूख।

कुछ तारे नहीं टूटते, कुछ सूरज ढल कर भी नहीं ढलते
अरिजीत सिंह का संन्यास एक खबर नहीं है। यह एक युग का ठहर जाना है। अरिजीत सिंह, जैसे कोई सपने में आया, दिल में समाया और सपना खत्म होने के बाद भी दिल में ही बसा रहा। बाहर निकला ही नहीं। इसीलिए, उनके संन्यास की घोषमा के बावजूद, दिल फिर भी उम्मीद करता है। क्योंकि तारे टूटते हैं, पर रोशनी देर तक बिखरी रहती है, निखरी रहती है। और अरिजीत की रोशनी? वह तो कभी नहीं बुझेगी, कभी नहीं टूटेगी, हमेशा रहेगी। क्योंकि कुछ तारे टूट कर भी नहीं टूटते। कुछ सूरज ढल कर भी नहीं ढलते। और चाहे कुछ भी हो जाए, कुछ आवाजें कभी खामोश नहीं होती। इसीलिए, आने वाले लंबे वक्त तक अरिजीत के गीत बजते रहेंगे और हर संगीत प्रेमी के ओठों पर उनके ये बोल सजते रहेंगे कि – अच्छा चलता हूं… और इसी के साथ लोग उनको अपनी दुआओं में याद रखेंगे।
-निरंजन परिहार
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