Dhurandhar: अक्षय खन्ना छा गए, दर्शकों का भा गए और एक लंबे वक्त के बाद भारतीय सिनेमा की मुख्यधारा में फिर आ गए। हमारे हिंदी सिनेमा की अब तक की सबसे सुपर हिट फिल्म ‘धुरंधर’ में अक्षय खन्ना के अभिनय को जबरदस्त प्रशंसा मिल रही है। ‘धुरंधर’ में अक्षय खन्ना ने जिस मेहनत, समर्पण और सजीवता से खुद को रहमान डकैत के रोल में ढाला है, उससे उनके करियर को एक नया आयाम मिला है। अब अक्षय फर्श से सीधे अर्श पर हैं। दुनिया भर में उनके अभिनय को सराहा जा रहा है और ‘शोले’ में गब्बर सिंह के रोल में अमजद खान की बराबरी में ‘धुरंधर’ में अक्षय खन्ना के रहमान डकैत के किरदार को माना जा रहा है।
परदे से निकलकर दिलों में उतर गए अक्षय खन्ना
वैसे भी, किसी भी काम को कोई भी मुकाम यूं ही हासिल नहीं होता, और खास कर सिनेमा में। दरअसल, जब किसी अभिनेता को दर्शकों की सराहना मिलती है, तो उसके पीछे केवल उस फिल्म की सफलता के आंकड़ों की नहीं, बल्कि भावना, मेहनत और सघन साधना सहित उस किरदार में उसके उतर जाने जैसे समर्पण भाव की एक लंबी शृंखला होती है। ऐसी ही साधना के बाद ‘धुरंधर’ में अक्ष्य खन्ना का किरदार सामने आया है, जिसने दर्शकों के मन-मस्तिष्क में गहरी छाप छोड़ी है। इसीलिए, ‘धुरंधर’ देखने के बाद सबसे सशक्त अभिनेता के रूप में अक्षय खन्ना की छवि बार-बार उभरकर सामने आती है। रहमान डकैत के रूप में कैमरे में समाकर, परदे पर उतरते हुए सीधे दर्शकों की दुनिया के दिलों में बस गए हैं अक्षय खन्ना। उन्होंने जिस गहनता, गंभीरता और गूढ़ता के साथ साथ संजीदगी और सहजता से स्वयं को रहमान डकैत को किरदार में ढाला है, वह अभिनय के आकाश में एक नया आयाम बन गया है।

अक्षय ने शोर से नहीं, सन्नाटे से भूमिका को ताकत दी
रहमान डकैत का चरित्र केवल एक नाम नहीं, बल्कि एक संपूर्ण मानसिक संरचना है। इस संरचना में हिंसा का अंधकार है, आत्मसंघर्ष का द्वंद्व है और भीतर ही भीतर सुलगती संवेदना की मंद आंच भी। अक्षय खन्ना ने इस चरित्र को निभाते समय किसी बाहरी आडंबर का सहारा नहीं लिया, बल्कि अपनी अंतरंग अनुभूतियों के सहारे अपने अभिनय के आकाश को और ऊंचाई दी है। रहमान डकैत तो किरदार में अक्षय की आंखों में ठहराव है, आवाज़ में कंपन है और भावाभिव्यक्ति के रेखांकन में अनुभवों का संचित सार है। उनके हर संवाद में एक खास किस्म की अनुगूंज है, जो सीधे दर्शक के अंतर्मन तक पहुंचती है, जैसे रहमान डकैत की दी हुई मौत बड़ी कसाईनुमा होती है। फिल्म अभिनेता और अब दुबई में बड़े बिजनेसमैन बने विवेक ओबरॉय इस पिल्म में अक्षय के प्रतिभा प्रदर्शन से जबरदस्त प्रभावितक हैं। विवेक कहते हैं – अक्षय ने रहमान डकैत को शोर से नहीं, अपने भीतर पसरे सन्नाटे से ताकतवर बनाया है। उनकी आंखों में आक्रामकता कम, मगर हिसाब – किताब ज्यादा दिखता है, मानो हर नज़र किसी को तौल रही हो, हर ठहराव किसी फैसले की प्रस्तावना हो और हर कदम किसी के अंत का आगाज।

अक्षय परदे पर आते नहीं, रहमान डकैत में घटित होते हैं
‘धुरंधर’ के हर दृश्य में अक्षय खन्ना का अभिनय एक अदृश्य कंपन जोड़ता है। यह कंपन न तो शोर मचाता है और न ही स्वयं को थोपता है, बल्कि चुपचाप दृश्य की संवेदना को गाढ़ा करता चलता है। उनकी उपस्थिति में संवाद केवल बोले नहीं जाते, वे महसूस किए जाते हैं। यही कारण है कि अभिनेत्री और राजनेता स्मृति ईरानी ने भी अक्षय खन्ना के अभिनय की जमकर तारीफ की है। स्मृति ने कहा कि अक्षय खन्ना ने उम्मीदों से भी बेहतर काम किया है। पूर्व केंद्रीय मंत्री स्मृति ने अक्षय के साथ अपनी फिल्म ‘तीस मार खान’ की एक क्लिप साझा की है, जिसमें एक डायलॉग भी है – ‘वो रहा मेरा सुपरस्टार, मेरा ऑस्कर’। राजनीतिक विश्लेषक निरंजन परिहार आम तौर पर सिनेमा पर टिप्पणी नहीं करते, लेकिन ‘धुरंधर’ में अक्षय खन्ना के रोल से वे अभिभूत हैं। परिहार कहते हैं कि ‘धुरंधर’ में अक्षय खन्ना परदे पर आते नहीं, परदे पर घटित होते हैं और उनकी मौजूदगी किसी चमकदार उद्घोषणा की मोहताज नहीं रहती। परिहार कहते हैं कि रहमान चकैत को रोल में अक्षय खन्ना हर दृश्य के भीतर धीरे-धीरे सरकते हैं और एक दर्शक के तौर पर हम उनको अपने भीतर उतरता हुआ सा महसूस करते हैं।

अभिनय का सन्नाटा सहमता है और चुप्पी हवाओं में घुलती है
फिल्म प्रमाणन बोर्ड के सदस्य रहे विजय सिंह कौशिक कहते हैं कि धुरंधर से पहले भी अक्षय खन्ना अपनी अभिनय क्षमता साबित कर चुके थे। निसंदेह वे एक अच्छे अभिनेता हैं। ‘धुरंधर’ में रहमान डकैत की भूमिका में उन्होंने नेचुरल एक्टिंग की है। उन्हें देखते समय ऐसा लगता है जैसे किसी अभिनेता को नहीं बल्कि वास्तविक किरदार हैं। ‘दैनिक भास्कर’ के मुंबई संस्करण के संपादक विजय सिंह कौशिक कहते हैं कि इस फिल्म में अक्षय खन्ना की सबसे बड़ी विशेषता यही है और हालांकि उन्होंने ऐसा पहली बार नहीं किया है, इसके पहले भी उन्होंने ‘दृश्यम’ में इसी तरह की नेचुरल एक्टिंग की थी। विजय सिंह कौशिक ने बिल्कुल सही कहा है। क्योंकि रहमान डकैत के संवाद अक्षय खन्ना के मुंह से निकलकर हवा में नहीं घुलते, सीधे सामने वाले की हड्डियों तक उतरते हैं, और उसे कंपकंपाने लगते है। मगर, जब वे चुप होते हैं, तब भी अभिनय का सन्नाटा रुकता नहीं, सहमता है और उसी वक्त उनकी चुप्पी, चुपचाप उनके चेहरे से निकल कर हवाओं में हौले हौले घुलने लगती है। पहले भी अक्षय अपनी चयनशीलता और संजीदा भूमिकाओं के लिए जाने जाते थे, किंतु ‘धुरंधर’ के बाद उनकी पहचान और भी दृढ़ हो गई है। यह भूमिका उनके लिए केवल एक सफलता नहीं, बल्कि आत्मस्थापन का क्षण है। उन्होंने यह सिद्ध कर दिया है कि सच्चा अभिनेता वही होता है, जो अभिनय नहीं, बल्कि चरित्र की आत्मा को पकड़ता हैं।
‘धुरंधर’ में भूमिका खत्म करके भी खत्म नहीं होते अक्षय
‘धुरंधर’ की कथा जैसे-जैसे आगे बढ़ती है, वैसे-वैसे रहमान डकैत का रूप भी परत दर परत खुलता जाता है। कभी वह निर्दयी दिखता है, कभी असमंजस में घिरा हुआ, और कभी अपने ही निर्णयों से जूझता हुआ तो कभी जटिलता के जाल में जकड़ा हुआ। इस तकह की जटिलता को अभिनय में उतारने के लिए केवल तकनीकी दक्षता पर्याप्त नहीं होती, बल्कि इसके लिए अभ्यास, अनुशासन और भावनात्मक संतुलन की आवश्यकता होती है। अक्षय खन्ना की यही विशेषता उन्हें भीड़ से अलग कर गई। उनके अभिनय में कोई बनावटीपन नहीं, बल्कि एक सहज, संतुलित और सरल स्वरूप में संपूर्ण प्रवाह है। राजनीतिक विश्लेषक परिहार का कहना ठीक ही है कि ‘धुरंधर’ फिल्म जैसे किसी की कोई अधूरी सी बात हो, जैसे कोई टूटा हुआ सपना हो और जैसे कोई छूटा हुआ अपना हो, जिसे भूलना संभव ही नहीं। उसी तरह से ‘धुरंधर’ में अपनी भूमिका खत्म करके भी अक्षय खन्ना खत्म नहीं होते, उनका किरदार लगातार हमारे साथ चलता रहता है दिमाग में, बसा रहता है दिल में और छाया सा रहता है हमारे माहौल में। आपने भी अगर ‘धुरंधर’ देखी है, तो रहमान डकैत ने आपको भी जरूर लूट लिया होगा। नहीं देखी, तो देख लीजिए, वरना कुछ खास देखने से चूक जाएंगे। क्योंकि जिंदगी तो ऐसे ही चलती रहेगी।
– आकांक्षा कुमारी
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