Sharad Pawar: राजनीति का भी अपना एक अलग मायाजाल होता है। यहां मर्यादाएं सबसे पहले दम तोड़ती हैं। परंपराएं कमजोर पड़ती हैं। और आदर्शों को उपहास का विषय बना दिया जाता है। यहां मौत भी सियासत से मुक्त नहीं रहती। दुख को भी शक के कटघरे में खड़ा कर दिया जाता है। श्रद्धांजलि से पहले षड्यंत्र तलाशे जाते हैं। और आंसुओं से पहले बयान तैयार हो जाते हैं। माना कि सरकार का दायित्व शासन करना है। लेकिन विपक्ष का एजेंडा तो सिर्फ ही एक होता है, सरकार को कटघरे में खड़ा करना। हर हाल में, हर कीमत पर और हर मामले में। मौत भी यहां राजनीति से अछूती नहीं रहती। सहज निधन भी सियासी हथियार बन जाते हैं। दुख प्रकट करने से पहले साजिश गढ़ी जाती है और संवेदना से पहले संदेह बोया जाता है।

कुछ नेताओं ने संयम नहीं चुना, संदेह का शोर किया
अजित पवार (Ajit Pawar) के विमान हादसे में दुखद निधन पर भी यही तस्वीर सामने आई। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शोक जताया, लेकिन विपक्ष अपना अलग ही शोर मचा रहा था। शोक की घड़ी को राजनीतिक अवसर में बदलने की कोशिश हुई। कुछ नेताओं ने संयम नहीं चुना। बल्कि संदेह का शोर खड़ा किया। ममता बनर्जी ने हत्या की आशंका जता दी। अखिलेश यादव ने निष्पक्ष जांच की मांग उछाल दी। नितिन राउत ने इसे षड्यंत्र बता दिया। मल्लिकार्जुन खड़गे ने संदेह का बीज बोया। और उमर अब्दुल्ला ने जांच एजेंसियों पर सवाल खड़े कर दिए। एक सुर में नहीं, लेकिन एक मकसद के साथ। सरकार को घेरने का मकसद। राजनीतिक लाभ का मकसद। संवेदनशीलता यहां गैरहाजिर थी। शोक पीछे छूट गया था। और राजनीति आगे बढ़ चुकी थी। स्पष्ट था कि यह सियासी रणनीति थी। यह संवेदना नहीं, लाभ के लोभ की होड़ थी। निशाने पर सरकार थी। तो फिर संवेदनशीलता को तो कहीं पीछे छूट ही जाना था।
शरद पवार ने विपक्ष को नेतृत्व का अर्थ समझा दिया
शरद पवार (Sharad Pawar) तभी सामने आए। ऐसे समय में जब विपक्ष के शब्द ज़हर बन रहे थे, जब आरोप आग की तरह फैल रहे थे, पवार कैसे चुप रहते। मगर, न कोई आक्रोश। न कोई पलटवार। न कोई कटु टिप्पणी। सिर्फ एक वाक्य, एक शांत वाक्य। पवार बोले – यह हादसा है। इस पर राजनीति नहीं होनी चाहिए। केवल नौ शब्दों ने पूरी बाजी पलट दी। विपक्ष चुप हो गया। संयम ने हमला कर दिया। सादगी ने तलवार चला दी। और शोर मौन में बदल गया। विपक्ष स्तब्ध रह गया। षड्यंत्र की थ्योरी हवा हो गई। आरोपों की धार कुंद पड़ गई। राजनीतिक लाभ की योजना धराशायी हो गई। सरकार पर हमला कमजोर पड़ गया, और शोक की गरिमा लौट आई। पवार गजब के राजनेता हैं। विपक्षी हैं, लेकिन विपक्ष की ही बोलती बंद कर दी। वह भी सिर्फ डेढ़ वाक्य में। उन्होंने शोक के क्षण में नेतृत्व का पाठ पढ़ाया। राजनीति में मर्यादा की याद दिलाई। और यह साबित किया कि शक्ति शोर में नहीं, संयम में होती है। उन्होंने बता दिया कि राजनीति सिर्फ सत्ता की लड़ाई नहीं होती। यह संवेदना, जिम्मेदारी और विवेक की परीक्षा भी होती है। बिना शोर। बिना आरोप। बिना उत्तेजना। पवार नेतृत्व का अर्थ समझा गए। यही उनकी असली ताकत है। यही उनकी रणनीति है। यही उनकी दूरदर्शिता है।

सियासत के संवेदनशील शिखर पुरुष शरद पवार
शरद पवार जानते हैं कि कब बोलना है। और उससे भी बेहतर—कब चुप रहकर बोल देना है। वे टकराव नहीं चुनते। वे परिस्थिति को परास्त करते हैं। दशकों का अनुभव उनके शब्दों में झलकता है। राजनीतिक विभाजनों को संभालने का हुनर उन्हें आता है और गठबंधन की गांठ कैसे बांधी जाती है, यह भी वे जानते हैं। कांग्रेस से निकल कर एनसीपी को खड़ा करना कोई संयोग नहीं था और फिर से कांग्रेस के साथ खड़े होना कोई अवसर नहीं। वे महाराष्ट्र में कांग्रेस से बड़ी पार्टी के नेता थे, फिर भी कांग्रेस के मुख्यमंत्री पद दिया यह धैर्य, गणना उनकी सियासी दीर्घ दृष्टि का परिणाम था। शरद पवार कभी जल्दबाजी में निर्णय नहीं लेते। संकट में भी संतुलन नहीं खोते। वे विरोधी को गाली नहीं देते। उसे आईना दिखाते हैं। दशकों का अनुभव उनकी आंखों में बोलता है। राजनीति की नब्ज़ उनकी उंगलियों में है। विभाजन हों या संकट— वे हमेशा संतुलन चुनते हैं। शरद पवार सिर्फ राजनेता नहीं हैं। वे राजनीति की पाठशाला हैं। संकट में भी राजनीति को ऊंचाई देते हैं और विरोधियों को बिना लड़े परास्त कर देते हैं। यही उनकी बेजोड़ राजनीतिक कला है। और यही कला उन्हें सियासत का संवेदनशील शिखर पुरुष बनाए हुए है।
– निरंजन परिहार (राजनीतिक विश्लेषक)
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