Sunetra Pawar: सत्ता के सिंहासन राजाओं की राख सूखने के इंतजार नहीं करते। और राजनीति की रवायतें भी विलाप की अनुगूंज सुनने की आदी नहीं होती। इसीलिए, राजाओं के न रहने पर रानियों के राजगद्दी संभालने का इतिहास पुराना है। क्योंकि सियासत की सांसें सिसकियों में सिमटते देर नहीं लगती। यही वजह है कि सुनेत्रा पवार (Sunetra Pawar) अब उपमुख्यमंत्री हैं। महाराष्ट्र की पहली उपमुख्यमंत्री। पति अजीत पवार (Ajit Pawar) की जगह उन्होंने ले ली और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी की (NCP) सियासत की विरासत भी सम्हाल ली। सामान्य जिंदगियों के लिए यह असामान्य है कि पति का शोक शुरू भी नहीं हुआ लेकिन पत्नी ने पार्टी की पतवार पकड़ ली। राजनेता दिल से नहीं, दिमाग से फैसले लेते हैं, इसीलिए दशकों तक दिलों पर राज करते हैं। हमारी संस्कृति में शोक भले ही एक परंपरा है, लेकिन राजसी रवायतें रूढ़िवाद की मोहताज नहीं होती। सुनेत्रा ने इसीलिए पति की मौत के तीसरे दिन ही, सत्ता का बागडोर सम्हाल ली।

नारी की निर्णय क्षमता और नेतृत्व की ताकत के तेवर
सुनेत्रा पवार का महाराष्ट्र सरकार में उपमुख्यमंत्री पद पर का आना एक ऐसी घटना है, जिसने नारी की निर्णय क्षमता और नेतृत्व करने की त्वरित तात्कालिकता के तेवर नए तरीके से दिखाए हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सबसे पहले बधाई दी और अजीत पवार की परंपरा को आगे बढ़ाने की कामना भी की। हालांकि हमारी परंपराओं में शोक एक भावनात्मक अवस्था है, लेकिन सत्ता एक सतत प्रक्रिया। यहां आंसुओं से नहीं, अवसरों से इतिहास बनते हैं। जहां सामान्य जीवन ठहराव मांगता है, लेकिन राजनीति निरंतरता चाहती है। ऐसे में, सुनेत्रा पवार का उपमुख्यमंत्री बनना केवल एक संवेदनात्मक प्रसंग नहीं, बल्कि सत्ता-संतुलन की समझदार बिसात पर आगे बढ़ाया गया अपना एक निर्णायक मोहरा है। यह उस परंपरा का आधुनिक रूप है, जहां राजाओं के जाने के बाद रानियां केवल शोक में नहीं डूबीं, बल्कि राज्य की बागडोर संभालकर सत्ता को बिखरने से बचाती रहीं।
अजित पवार की वास्तविक राजनीतिक उत्तराधिकारी
अपनी निजी भावनाओं को दबाकर सुनेत्रा का आगे आना भावुकता का दमन नहीं, बल्कि एक नारी के विवेक का प्रमाण है। अजीत पवार के असमय चले जाने के बाद समूची राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी जिस दौर से गुजर रही थी, वहां नेतृत्व का शून्य एकजुटता को छिन्न – भिन्न कर सकता था। सत्ता की नाव और सियासत की पतवार अगर पल भर को भी डगमगाती, तो विरोधी लहरें उसे बहा ले जातीं। ऐसे समय में देवेंद्र फडणवीस की दूरदर्शिता और एनसीपी नेताओं की सलाह पर सुनेत्रा का पार्टी की पतवार थामना, न केवल अजित पवार की विरासत का संरक्षण है, बल्कि पार्टी की राजनीतिक सांसों को स्थिरता देने का साहसिक कदम भी। फिर, राजनीति भी तो केवल विरासत केवल नाम से नहीं चलती, उसे भी निभाने के लिए निर्णयों की धार चाहिए। सुनेत्रा ने साहस से सत्ता संभालकर यह जता दिया कि वे ही अजित पवार की वास्तविक राजनीतिक उत्तराधिकारी हैं। उन्होंने शोक को शक्ति में बदला और संवेदना को संकल्प में संचित किया है। देवेंद्र फडणवीस जानते थे कि राजनीति में खाली कुर्सियां विद्रोह को जन्म देती हैं और अनिर्णय सत्ता को कमजोर करता है। इसीलिए उन्होंने सुनेत्रा के लिए स्वागत द्वार खोले, सत्ता में साथ लिया और अब ताकत भी देंगे।

भावनाओं से नहीं, रणनीति के आधार पर चलती है सत्ता
वैसे भी, अजित पवार के बाद अचानक उपजी शून्य के हालात में राष्ट्रवादी कांग्रेस को एकजुट रखना आसान नहीं था। अंदरूनी खींचतान, नेतृत्व पर संशय और भविष्य की अनिश्चितता, इन सबके बीच सुनेत्रा पवार का उदय एक मजबूत स्तंभ की तरह हुआ है। उन्होंने यह संदेश दिया कि पार्टी अजीत पवार की है, उन्हीं की तरह अटल, अविचल और अडिग। जो बिखरेगी नहीं, बल्कि सत्ता के संगठित ढांचे में ढलकर आगे बढ़ेगी। उनका उपमुख्यमंत्री बनना केवल पद की प्राप्ति नहीं, बल्कि महाराष्ट्र में मराठा राजनीतिक नेतृत्व में स्थिरता की पुनर्स्थापना है। यही कारण है कि महाराष्ट्र की राजनीति में सुनेत्रा पवार एक उम्दा उदाहरण बनकर उभरी हैं। उन्होंने दिखाया है कि सत्ता भावनाओं के सहारे नहीं, रणनीति के आधार पर चलती है। यहां आंसुओं से नहीं, फैसलों से भविष्य तय होते हैं। अपने पति की जगह उपमुख्यमंत्री बन कर उन्होंने यह साबित किया है कि सियासत, सत्ता और सिंहासन किसी से भी कोई सरोकार नहीं रखते, वह केवल नेतृत्व की क्षमता में अपने भविष्य संजोते हैं।
विरासत आंसुओं से नहीं, आत्मविश्वास से आगे बढ़ती है
सियासत में सुनेत्रा पवार का यह कदम उन ऐतिहासिक परंपराओं की याद दिलाता है, जहां युद्ध के बाद रानियां राजमहलों में नहीं बैठीं, बल्कि रणभूमि में उतरीं, युद्ध लड़े, साम्राज्य संभाले और संस्कार भी। आज के लोकतंत्र में तलवार की जगह संविधान है, और परंपरा संगठन में बसी है, लेकिन सत्ता के संघर्ष की आत्मा वही है। वह आत्मा जानती है कि सत्ता संभालने के लिए साहस चाहिए, और सुनेत्रा पवार ने वही साहस दिखाया है। इसीलिए यह घटनाक्रम केवल पति के परलोक सिधारने पर पत्नी के पदभार ग्रहण करने की पटकथा नहीं, बल्कि भारतीय राजनीति की उस सच्चाई का आईना है, जहां भावनाएं सम्मान पाती हैं, लेकिन फैसले दिमाग से होते हैं। जहां शोक मनाया जाता है, लेकिन सत्ता को भी सूना छोड़ा नहीं जाता, और विरासत आंसुओं से नहीं, आत्मविश्वास से आगे बढ़ती है। सुनेत्रा पवार का आंसुओं के बजाय आत्मविश्वास संजोकर उपमुख्यमंत्री बनना इसी सशक्त राजनीतिक यथार्थ का उत्कृष्ट प्रतीक है, जहां संवेदनाएं मौन हो जाती है और संकल्प सत्ता संवारते है। सुनेत्रा अपने पिता दिग्गज राजनेता पदमसिंह पाटिल की राजनीतिक विरासत की वारिस हैं, और पहली बार पवार परिवार के पॉवर में उनका पांव हैं।
– निरंजन परिहार (राजनीतिक विश्लेषक)
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