अमित शाह के चाणक्य अवतार का असली सत्य…
-निरंजन परिहार
Amit Shah: राजनीति अपनी जगह है, कांग्रेस की कमजोरियां अपनी जगह और बीजेपी के बढ़ते कदमों का मायावी संसार अपनी जगह। लेकिन चुनावी बिसात बिछाने और रणनीति के राज सुलझाने मामले में अमित शाह इस देश में खासे लोकप्रिय हो चुके हैं। इतने लोकप्रिय कि विरोधी दल उनकी तोड़ का कोई कारगर उपाय नहीं तलाश पा रहे। अमित शाह (Amit Shah) की चुनावी रणनीतियां बीजेपी (BJP) की जीत सुनिश्चित करने का आखरी इंतजाम होती है। इसीलिए वे भारतीय राजनीति के आधुनिक चाणक्य (Chanakya) हैं। वैसे, चाणक्य तो खैर, दुश्मन को केवल हराते थे, लेकिन अमित शाह हराते ही नहीं, डराते भी हैं और हालत भी खराब कराते हैं। देश में कहीं भी चुनाव (Election) हो, किसी भी राज्य में सत्ता की लड़ाई हो। उस सबके केंद्र में, बीजेपी की रणनीति के सबसे मजबूत स्तंभ अमित शाह ही दिखाई देते हैं। हाल ही में, पश्चिम बंगाल में बीजेपी की दुर्लभ जीत को सिर्फ एक चुनावी जीत के नजरिए से नहीं देखा जा सकता। यह एक असंभव सा चुनावी जीत का अभियान था, जिसे संभव बनाया अमित शाह ने। देश के गृह मंत्री के नाते वे आम तौर पर भले ही भारत की कानून और व्यवस्था सम्हालते दिखें, सहकारिता मंत्री के नते भले ही वे सदा सक्रियता में सिमटे दिखें, लेकिन असल में वे पल प्रतिपल, कांग्रेस के अंतिम अध्याय के अंतिम पन्ने के अंतिम अनुच्छेद को अंतिम रूप देने की अंतिम प्रक्रिया में स्वयं को समर्पित किए दिखते हैं।
संगठन की संचित सक्रियता के संचालन की कमान
राजनीति में कुछ चेहरे सत्ता चलाते हैं। कुछ चेहरे सत्ता बचाते हैं। और कुछ चेहरे सत्ता को विस्तार देते हैं। अमित शाह इस तीसरी श्रेणी के नेता हैं। वे चुनावी बिसात बिछाने के सबसे बड़े कारीगर हैं और अपने नेता नरेंद्र मोदी के लिए वे कुछ भी कर गुजरने को हर पल तैयार रहते हैं। पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी की वर्षों पुरानी राजनीतिक दीवारों को तो अमित शाह की रणनीति ने अब गिराया है, मगर इससे पहले महाराष्ट्र, दिल्ली, उत्तर प्रदेश, ओडीशा, जैसे असंभव से प्रदेशों में भी, उद्धव ठाकरे, अरविंद केजरीवाल, अखिलेश यादव और नवीन पटनायक जैसों की राजनीतिक ताकत को तिरोहित कर चुके हैं। अमित शाह जानते हैं कि जीत भाषणों से नहीं होती। संगठन की संचित सक्रियता के संचालन से होती है। और आज की राजनीति में, संगठन की नब्ज अमित शाह से बेहतर शायद ही कोई जानता हो। अमित शाह की सबसे बड़ी ताकत यह है कि वे चुनाव को चुनाव की तरह नहीं बल्कि युद्ध की तरह लड़ते हैं। और युद्ध का पहला नियम हैं कि हर मोर्चे पर सक्रियता। कौन उम्मीदवार कहां मजबूत है। किस सीट पर क्या जातीय समीकरण है। किस क्षेत्र में नाराजगी कितनी है। किस बूथ पर कितने वोटों का अंतर। और कितने वोट किसके जरिए कहां से जुटाए जा सकते हैं, इसकी समझ। राजनीति के इसी मोड़ पर अमित शाह का चुनावी गणित चौंकाता है और विपक्ष को डराता है। वे बीजेपी की चुनावी मशीनरी के सबसे धारदार चेहरे हैं। इसीलिए कहते है कि अमित शाह की किसी भी चुनावी उपस्थिति का सियासी सत्य यही है कि सामने वाले के पसीने छुटने तय हैं।
न किसी का इंतजार, न किसी चूक के लिए माफी
यह अभी तक एक रहस्य बना हुआ है कि बीजेपी को देश की सबसे बड़ी राजनीतिक ताकत और चुनाव जीतने की मशीन बनाने में जिनकी भूमिका निर्णायक रही है, उन अमित शाह में ऐसा आखिर क्या है, जो वे अचानक एक साथ अनेक मोर्चों पर सफलता के कई कई कार्तिमान एक साथ गढ़ लेते हैं। वे सिर्फ चुनाव नहीं जिताते। कार्यकर्ताओं में आत्मविश्वास पैदा करते हैं। संगठन में ऊर्जा भरते हैं। और हारती हुई बाजी को भी पलट देने की क्षमता रखते हैं। इसीलिए, उत्तर प्रदेश से लेकर गुजरात, त्रिपुरा से लेकर हरियाणा तक। असम से लेकर महाराष्ट्र, और दिल्ली से लेकर बंगाल तक, बीजेपी की अनेक सफलताओं के पीछे अमित शाह की चुनावी प्रयोगशाला काम करती रही है। उनकी राजनीति का सबसे बड़ा गुण है – न धैर्यम न क्षमादानम। वे किसी के लिए किसी का इंतजार नहीं करते और किसी भी चूक के लिए किसी को माफ नहीं करते। चाणक्य नीति से लेकर दंड विधान तक में वे एक समान धारा में बहते हैं। कश्मीर की स्वायत्तता समाप्त करने के मामले में भी देश ने देखा कि जल्दबाजी वे करते नहीं और हवा का इंतजार तो बिल्कुल भी नहीं करते। क्योंकि हवा तो वे खुद बनाते हैं और बनी हुई हवा को कब, कहां और कैसे तूफान में तब्दील करना है, इस रहस्य की गहराई को तो खैर उन्होंने गुजरात में ही जान लिया था। सियासत की शतरंज की हर बिसात पर, शह और मात में माहिर अमित शाह की सफलता को इसी से समझा जा सकता है कि बचपन से ही शतरंज खेलने के वे शौकीन रहे हैं। इसीलिए किसी और के राजनीतिक किले में घुसने की कला उनको आती है और राहुल गांधी के मामले में तो खैर, वे सदा से यह मानकर चल रहे हैं कि राजनैतिक आत्महत्या करने के मामले में राहुल इस देश में किसी और पर आश्रित नहीं हैं। पता नहीं, इस रहस्य के राजनीतिक गणित की खुद राहुल गांधी को समझ है या नहीं।
असंभव में भी संभव की संभावना देखनेवाला दिमाग
अमित शाह केवल जीत में विश्वास करते हैं। उनकी नजर में चुनाव अलग है और राजनीति अलग। चुनाव जीतेंगे, तभी तो राजनीति तो करेंगे। हार से तो राजनीतिक खत्मा हो जाता है। इसी उद्देश्य की पूर्ति में, जब बीजेपी कहीं हार जाती है, तो उसी दिन से अमित शाह दुगुनी ताकत से अगली जीत में जुट जाते हैं। यही कारण था कि बहुत ताकतवर नेता के तौर पर बहुप्रचारित ममता बनर्जी की ताजा हार देश के दिमाग पर छाई हुई है। देश ने देखा है कि जिस पश्चिम बंगाल में कमल का खिलना आसान नहीं था, वहां भी अमित शाह ने आसानी से बीजेपी की बहुत मजबूत सरकार बना डाली। उन्होंने असंभव को संभव बनाने की संभावना देखी। कहते हैं कि सौ रुपए की साड़ी और पचास रुपए की हवाई चप्पलों वाली गरीब सी दिखने वाली ममता बनर्जी की पकड़ भी मजबूत उनकी इसी गरीब छवि की वजह से ही थी। अमित शाह ने सबसे पहले छवि के इसी कमजोर छज्जे से हूंकार भरी और ममता के मालामाल होने को सार्वजनिक किया और ममता से भी ज्यादा आक्रामक शैली में उनके मुसलिम प्रेम को उजागर किया। असल में, अमित शाह ने पश्चिम बंगाल को चुनावी राज्य की तरह देखते हुए बंगाली मानसिकता के राजनीतिक मनोविज्ञान को पढ़ा। लोगों की नाराजगी समझी। युवाओं की बेचैनी पकड़ी। महिलाओं की मानसिकता महसूस की। और यहीं से शुरू हुआ अमित शाह का माइक्रो मैनेजमेंट। बूथ स्तर का संगठन। पन्ना प्रमुख से संवाद। हर जिले में अलग रणनीति। हर वर्ग के लिए अलग संदेश। और अलग समुदायों के लिए लग अप्रोच। वे जानते थे कि यह लड़ाई नरेंद्र मोदी के नेतृत्व की सफलता में उस संदेश की है कि बीजेपी अब सिर्फ हिंदी पट्टी की पार्टी नहीं रही।
रणनीतिक शक्ति से सज्ज संगठन के सृजनकर्ता
राजनीति में लोकप्रिय और प्रभावशाली तो अपने अपने स्तर पर लगभग सारे ही नेता होते हैं। लेकिन उनमें से बहुत कम ऐसे होते हैं, जो किसी के भी प्रभाव की पूरी राजनीतिक दिशा ही बदल डालने का माद्दा रखते हैं। मगर अमित शाह तो केवल राजनीतिक दिशा ही नहीं, राजनीति की पूरी की पूरी धुरी ही बदलने वालेी शख्सियत हैं। चुनावी राजनीति के इस दौर में अमित शाह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ऐसे सेनापति हैं, जिनकी अगुवाई में सिर्फ नारे, पोस्टर, झंडे, बैनर, रैली और आम सभाओं से काम नहीं चलता। वहां डेटा, संगठन, संदेश और रणनीति चारों को साथ लेकर चलना पड़ता है। और यही कारण है कि बीजेपी के भीतर अमित शाह सिर्फ देश के गृह मंत्री नहीं, बल्कि वे पार्टी के भरोसे का दूसरा नाम हैं। वे जीत की गारंटी हैं। वे सफल संगठक हैं और सबसे बड़े संकट मोचक भी। भारतीय राजनीति के विराट और विशाल परिदृश्य में अमित शाह आज उस रणनीतिक शक्ति का नाम हैं, जिसने बीजेपी को सिर्फ मजबूत नहीं किया, बल्कि उसे लगातार विस्तार देने का नया राजनीतिक विज्ञान भी दिया है। अपना मानना हैं कि अमित शाह को लोग जानते भी हैं और नहीं भी जानते। और जो जानते हैं, वे भी उनको कितना जानते हैं, यह वे नहीं जानते। और यह सब इसलिए है क्योंकि अमित शाह को जानना संभव ही नहीं, लगभग असंभव सा है। राहुल गांधी को अपने जीते जी कांग्रेस को अगर मजबूत देखना है, तो उनको भी उनकी पार्टी की जीत के लिए अमित शाह जैसा संगठक, रणनीतिकार और समर्पित कार्यकर्ताओं की फौज निर्मित करने वाला कोई प्रभावशाली नेता अपनी पार्टी के लिए तैयार करना होगा, वरना दुनिया देख ही रही है कि आत्मघात के लिए तो राहुल हर पल तैयार दिखते ही हैं।
(लेखक निरंजन परिहार चुनावी रणनीतिकार एवं राजनीतिक विश्लेषक हैं)
please read also: Narendra Modi: राजनीतिक ताकत के आईने में कहां नरेंद्र मोदी और कहां राहुल गांधी!

