
Dharmendra Pradhan: समर्पित नेता किसी भी दल में कभी दरकिनार नहीं होते। वे मुख्यधारा में बने रहते हैं। धर्मेंद्र प्रधान (Dharmendra Pradhan) भी मुख्यधारा में रहेंगे। वे फिर लौटेंगे। सत्ता में नहीं, तो संगठन में। उनकी अगली भूमिका की पटकथा लिखी जा चुकी है। प्रधान की राजनीति और उनकी ताकत दोनों को, केवल मंत्री पद पर रहने या उसे छोड़ने तक सीमित करके नहीं देखा जा सकता। सियासत की समझ रखने वाले जानते हैं कि बीजेपी (BJP) की राजनीति में संकेत शब्दों से कम और व्यवहार से ज्यादा दिए जाते हैं। धर्मेंद्र प्रधान ने मंत्री (Minister) पद से इस्तीफा दिया। लेकिन पार्टी ने सुनिश्चित किया गया कि संदेश सम्मान का जाए, असहमति का नहीं। इसीलिए संसद (Parliament) परिसर का दृश्य महत्वपूर्ण था। पूर्व मंत्री के रूप में धर्मेंद्र प्रधान पहली बार संसद पहुंचे, तो स्वागत किसी विजेता नेता जैसा हुआ। बीजेपी सांसदों ने उनके समर्थन में नारे लगाए। संसदीय परिसर में धर्मेंद्र प्रधान जिंदाबाद के स्वर गूंजे। मिथिला पाग पहनाकर सम्मानित किया गया। बीजेपी जैसी अनुशासित पार्टी में ऐसे दृश्य सामान्य नहीं होते। वहां नारे प्रायः प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए लगते हैं। किसी दूसरे नेता के पक्ष में ऐसा उत्साह अपने आप में एक खास राजनीतिक संकेत है।

धर्मेंद्र प्रधान कोई कूचे से बेआबरू होकर नहीं निकले हैं
बीजेपी के इन 12 साल के राज में, कई शिक्षा मंत्री आए और गए। स्मृति ईरानी गईं। प्रकाश जावडेकर गए। रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ भी गए। लेकिन उनके जाने पर पार्टी ने कोई विशेष राजनीतिक संदेश नहीं दिया। लेकिन धर्मेंद्र प्रधान कोई कूचे से बेआबरू होकर निकले मंत्री नहीं है। उनके मामले में तस्वीर अलग दिखी। पहले तो इस्तीफे में देरी हुई। आखिरी समय तक विकल्प तलाशे गए। मंत्रालय बदलने की चर्चा चली। तो, मतलब साफ है कि पार्टी उन्हें हटाना नहीं चाहती थी। परिस्थितियों ने फैसला कराया। संगठन में उनका सम्मान जैसा पहले था, वैसा ही बरकरार है। इस्तीफे के बाद भी बीजेपी नेतृत्व का व्यवहार बहुत कुछ कह गया। शीर्ष नेताओं ने उनके काम की खुलकर सराहना की। किसी ने उनके योगदान पर सवाल नहीं उठाया। किसी ने यह नहीं कहा कि शिक्षा मंत्रालय असफल रहा। संदेश यही है कि प्रधान का इस्तीफा कॉक्रोच जनता पार्टी के प्रदर्शन के मूल्यांकन की वजह से नहीं, बल्कि उस प्रदर्शन से पैदा हुई अपार अराजकता, प्रदर्शनकारियों की अत्यंत अश्लीलता और बेशर्मी भरी बेहूदगी की वजह से हुआ।
बीजेपी अपने भरोसेमंद नेताओं को वनवास में नहीं भेजती
प्रधान ने स्वयं को स्ट्रीट फाइटर बताया, तो बीजेपी समर्थक सोशल मीडिया तंत्र भी सक्रिय हो गया। उनके संघर्ष का इतिहास सामने लाया गया। छात्र राजनीति से लेकर संगठन तक की यात्रा याद दिलाई गई। यह संयोग नहीं था। यह एक खास किस्म का सम्मानजनक राजनीतिक नैरेटिव तैयार करने की प्रक्रिया थी। उद्देश्य साफ था, धर्मेंद्र प्रधान को राजनीतिक विमर्श के केंद्र में बनाए रखना। यही कारण है कि अब चर्चा इस्तीफे से ज्यादा पुनर्वास की हो रही है। बीजेपी वैसे भी, अपने भरोसेमंद नेताओं को राजनीतिक वनवास में नहीं भेजती। संगठन और सरकार के बीच उनकी उपयोगिता बनी रहती है। धर्मेंद्र प्रधान उन नेताओं में हैं जिन्होंने संगठन, चुनाव प्रबंधन और राज्यों की राजनीति, तीनों में अपनी क्षमता साबित की है। इसलिए उनके लिए अगली भूमिका तय होना स्वाभाविक माना जा रहा है। तत्काल एक संभावनाएं सबसे अधिक चर्चा में हैं। उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में बड़ी जिम्मेदारी। बीजेपी जानती है कि उत्तर प्रदेश का चुनाव केवल राज्य का चुनाव नहीं होता। उसका असर सीधे राष्ट्रीय राजनीति पर पड़ता है। ऐसे में संगठन और रणनीति समझने वाले नेता की जरूरत रहती है। धर्मेंद्र प्रधान इस भूमिका में फिट बैठते हैं।

संगठन और सरकार, दोनों जगह उपयोगी रहे हैं प्रधान
इस तथ्य से कोई इन्कार नहीं कर सकता कि धर्मेंद्र प्रधान बीजेपी के उन नेताओं में हैं, जिन्होंने राजनीति को केवल सत्ता का माध्यम नहीं, बल्कि संगठन की साधना माना है। उनका सबसे बड़ा गुण उनकी निर्विवाद कार्यक्षमता है। जहां जिम्मेदारी मिली, वहां परिणाम देने की कोशिश की। संगठन हो या सरकार, दोनों जगह उन्होंने खुद को उपयोगी साबित किया। वे भाषण से ज्यादा प्रबंधन के नेता हैं। विवाद से ज्यादा संवाद के पक्षधर हैं। कठिन राज्यों में संगठन खड़ा करना हो या चुनावी रणनीति बनानी हो, पार्टी ने बार-बार उन पर भरोसा किया। ओडिशा से लेकर उत्तर प्रदेश तक उन्होंने संगठन के लिए जमीन पर काम किया। यही कारण है कि बीजेपी में उनकी पहचान केवल पूर्व केंद्रीय मंत्री की नहीं, बल्कि संकटमोचक रणनीतिकार की है। पार्टी नेतृत्व जानता है कि ऐसे नेता रोज पैदा नहीं होते। इसलिए राजनीतिक परिस्थितियां चाहे जो हों, धर्मेंद्र प्रधान जैसे नेताओं का महत्व पद से नहीं, बल्कि उनकी उपयोगिता, विश्वसनीयता और संगठन के प्रति उनकी निष्ठा से तय होता है।
मंत्री पद गया, लेकिन राजनीतिक पूंजी बची है प्रधान की
ओडिशा में धर्मेंद्र प्रधान की राजनीतिक जड़ें हैं, अतः दूसरी संभावना ओडिशा की राजनीति से जुड़ी है। प्रधान लंबे समय से राज्य की राजनीति का प्रमुख चेहरा रहे हैं। बीजेपी वहां अपनी पकड़ और मजबूत करना चाहती है। इसलिए भविष्य में उन्हें बड़ी जिम्मेदारी मिल सकती है। मुख्यमंत्री पद की चर्चाएं भी इसी संदर्भ में सामने आ रही हैं। यह तत्काल हो या बाद में, लेकिन यह संभावना राजनीतिक गलियारों में लगातार बनी हुई है और आने वाले सालों तक बनी रहेगी। बीजेपी की शैली हमेशा संकेतों की राजनीति रही है। पार्टी बहुत कम मौकों पर अपने नेताओं के लिए सार्वजनिक सहानुभूति का वातावरण बनाती है। धर्मेंद्र प्रधान के मामले में एक सोची – समझी रणनीति के तहत यह वातावरण बनाया गया है। राजनीति में कई बार पद चला जाता है, लेकिन नेतृत्व का विश्वास बना रहता है। कई बार पद बच जाता है, लेकिन विश्वास खत्म हो जाता है। धर्मेंद्र प्रधान के मामले में फिलहाल तस्वीर पहली वाली दिख रही है। कुर्सी गई है, लेकिन राजनीतिक पूंजी बची हुई है। शायद पहले से ज्यादा मजबूत होकर। अब निगाहें मंत्रिमंडल विस्तार पर नहीं, बीजेपी के अगले बड़े राजनीतिक दांव पर रहेंगी। वहीं तय होगा कि धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा वास्तव में विराम था या फिर किसी बड़ी भूमिका की प्रस्तावना।
– निरंजन परिहार
(लेखक राजनीतिक विश्लेषक हैं)
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