BJP: वाराणसी और नागपुर से बीजेपी के लिए खतरे की घंटी सुनाई दी है। बीजेपी (BJP) के रणनीतिकार शायद इस खतरे को मामूली बताकर खारिज करना चाहेंगे। लेकिन वाराणसी (Varanasi) और नागपुर (Nagpur) विधान परिषद चुनावों में मिली हार को केवल दो सीटों का नुकसान समझना राजनीतिक भूल होगी। ये दोनों परिणाम बीजेपी के संगठनात्मक ढांचे, स्थानीय नेतृत्व और कार्यकर्ता के साथ उसके रिश्तों पर गंभीर सवाल खड़े करते हैं। सबसे बड़ा सवाल यही है कि जिस पार्टी के पास प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (Narendra Modi) जैसे लोकप्रिय और ताकतवर नेता का चेहरा है, केंद्र में सत्ता है, राज्यों में मजबूत सरकारें हैं और दुनिया के सबसे बड़े राजनीतिक संगठन होने का दावा है, वह अपने सबसे प्रभावशाली राजनीतिक गढ़ों में चुनाव कैसे हार रही है? वाराणसी प्रधानमंत्री मोदी का संसदीय क्षेत्र है। नागपुर महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस का गृहक्षेत्र और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का मुख्यालय होने के कारण बीजेपी की वैचारिक राजनीति का प्रमुख केंद्र है। नागपुर से ही बीजेपी के दो बार राष्ट्रीय अध्यक्ष और बारह साल से केंद्र में मंत्री नितिन गडकरी का भी गहरा राजनीतिक जुड़ाव रहा है। इसके बावजूद इन दोनों क्षेत्रों में बीजेपी की हार बताती है कि बड़े नेताओं की मौजूदगी और संगठन की जमीनी सक्रियता दो अलग-अलग चीजें हैं।
चेहरों की चमक के पीछे संगठन की दरारें
बीजेपी की चुनावी सफलता का सबसे बड़ा आधार, बूथ पर काम करने वाला कार्यकर्ता, स्थानीय समीकरणों की समझ रखने वाला नेता और जनता के बीच मौजूद रहने वाला संगठनात्मक ढांचा पार्टी की असली ताकत रहे हैं। लेकिन यही ताकत अब कमजोरी में तब्दील हो रही है। केंद्र में तेरह साल से सत्ता के दौरान सत्ता का विस्तार हुआ, नेताओं का कद बढ़ा, चुनावी प्रबंधन अधिक पेशेवर हुआ और राजनीतिक प्रचार के नए तरीके विकसित हुए। मगर स्थानीय नेतृत्व को कितना सम्मान मिला? कार्यकर्ताओं के कान कितनी गंभीरता से हुए? देश के जाने माने पत्रकार प्रदीप सिंह कहते हैं कि राजनीति में केवल शीर्ष नेतृत्व की लोकप्रियता के सहारे हर चुनाव नहीं जीता जा सकता। प्रदीप सिंह कहते हैं कि अगर कार्यकर्ता को लगे कि उसकी मेहनत का सम्मान नहीं हो रहा, स्थानीय नेताओं की उपेक्षा की जा रही है और फैसले लेने की प्रक्रिया में उसकी कोई भूमिका नहीं है, तो वह घर बैठ जाता है। यही वह खतरा है, जिसे बीजेपी को गंभीरता से समझना होगा।
मोदी के गढ़ में विपक्ष को मिला हथियार
वाराणसी की बीजेपी को समाजवादी पार्टी द्वारा हराना कोई सामान्य घटना नहीं है। यह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की राजनीतिक प्रतिष्ठा से जुड़े क्षेत्र में बीजेपी संगठन की कार्यप्रणाली पर सवाल है। पीएम मोदी लगातार तीसरी बार वाराणसी से सांसद चुने गए हैं। लेकिन पिछले लोकसभा चुनाव में उनकी जीत का अंतर पहले की तुलना में काफी कम रहा था। अब विधान परिषद चुनाव में बीजेपी की हार ने कई सवालों को धार दे दी है। राजनीतिक विश्लेषक निरंजन परिहार कहते हैं कि उत्तर प्रदेश सरकार में पूर्वांचल से नौ मंत्री होने का दावा राजनीतिक शक्ति का संकेत तो हो सकता है, लेकिन यह शक्ति चुनावी नतीजों में तब्दील क्यों नहीं हो सकी? क्या संगठन कार्यकर्ताओं को एकजुट नहीं कर पाया? या फिर स्थानीय असंतोष को समय रहते समझने में नेतृत्व नाकाम रहा? राजनीतिक विश्लेषक निरंजन परिहार का मानना है कि मोदी के चुनाव क्षेत्र में समाजवादी पार्टी की जीत उसके राजनीतिक प्रचार का हथियार बन सकता है। विपक्ष यह संदेश देने की कोशिश कर सकता है कि प्रधानमंत्री के अपने संसदीय क्षेत्र में भी बीजेपी को हराया जा सकता है।
संघ के मुख्यालय में ही संगठन की परीक्षा
नागपुर का परिणाम राजनीतिक रूप से और भी अधिक महत्वपूर्ण है। यह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का मुख्यालय है। देवेंद्र फडणवीस का गृहक्षेत्र और नितिन गडकरी जैसे वरिष्ठ नेता के राजनीतिक प्रभाववाला इलाका है। इसके बावजूद कांग्रेस की लगातार दूसरी बार जीत ने बीजेपी के लिए असहज सवाल खड़े कर दिए हैं। महाराष्ट्र की राजनीति के जानकार वरिष्ठ राजनीतिक पत्रकार राजकुमार सिंह कहते हैं कि इस चुनाव में कांग्रेस को देशभर में मिली एकमात्र सीट नागपुर से मिलने का राजनीतिक संदेश अनदेखा नहीं किया जा सकता। हालांकि किसी एक चुनाव के आधार पर व्यापक जनसमर्थन में बदलाव का निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी, लेकिन इस परिणाम ने बीजेपी के संगठनात्मक दावों की परीक्षा जरूर ली है। राजकुमार सिंह कहते हैं कि अगर किसी क्षेत्र में पार्टी के पास बड़े नेताओं की मौजूदगी, मजबूत वैचारिक आधार और संगठनात्मक संसाधन हों, फिर भी वह चुनाव हार जाए, तो केवल विपक्ष की रणनीति को जिम्मेदार ठहराना पर्याप्त नहीं होगा।
हार के बाद कार्रवाई या फिर वही पुराना बचाव
बीजेपी के कुछ नेता इन परिणामों का विधानसभा चुनावों पर असर नहीं पड़ने की दलील दे रहे हैं। लेकिन बीजेपी की राजनीति के जानकार हरिगोविंद विश्वकर्मा कहते हैं कि यह तर्क सुनने में सुविधाजनक है, लेकिन राजनीतिक रूप से जोखिम भरा है। विश्वकर्मा का कहना है कि विधान परिषद चुनाव के नतीजे विधानसभा चुनावों के परिणामों की भविष्यवाणी नहीं करते। फिर भी वे संगठन की स्थिति, स्थानीय समीकरणों और नेतृत्व की प्रभावशीलता के बारे में संकेत जरूर हैं। इसीलिए सवाल यह है कि इन दो हार से पार्टी क्या सीखती है। क्या जिम्मेदार नेताओं की जवाबदेही तय होगी? क्या उम्मीदवार चयन और चुनावी प्रबंधन की समीक्षा होगी? क्या स्थानीय कार्यकर्ताओं की शिकायतें सुनी जाएंगी? क्या क्षेत्रीय नेताओं को केवल चुनाव के समय इस्तेमाल करने के बजाय निर्णय प्रक्रिया में सम्मानजनक स्थान मिलेगा?
राजनीतिक विश्लेषकों की नजर में असली संकट
बीजेपी की संगठनात्मक कार्यशैली और चुनावी राजनीति को समझने वाले वरिष्ठ संपादक प्रदीप सिंह, राजनीतिक विश्लेषक निरंजन परिहार और राजनीतिक टिप्पणीकार संदीप शुक्ल के विचार इस पूरे घटनाक्रम की पड़ताल के लिए महत्वपूर्ण हैं। इस प्रसंग में तीन बिंदु विशेष ध्यान देने योग्य हैं, प्रदीप सिंह के विश्लेषण के संदर्भ में सत्ता और संगठन के बीच संतुलन का सवाल, निरंजन परिहार के राजनीतिक विश्लेषण के संदर्भ में स्थानीय नेतृत्व और चुनावी संदेश का महत्व, तथा संदीप शुक्ल की राजनीतिक टिप्पणी के संदर्भ में कार्यकर्ता की भूमिका और शीर्ष नेतृत्व की जवाबदेही। इन तीनों पहलुओं को साथ रखकर देखने पर बुनियादी सवाल यही बनता है कि क्या बीजेपी का चुनावी तंत्र स्थानीय असंतोष को समय रहते पहचान पा रहा है?
कार्यकर्ता नाराज तो किले भी दरक सकते हैं
बीजेपी की ताकत हमेशा उसके बड़े नेताओं तक सीमित नहीं रही। वरिष्ठ पत्रकार संदीप शुक्ल कहते हैं कि बीजेपी की असली शक्ति उसके कार्यकर्ता में रही है, जो बूथ पर खड़ा होता है, मतदाताओं से संपर्क करता है, संगठन का संदेश पहुंचाता है और चुनाव के दिन तक लगातार मेहनत करता है। लेकिन कार्यकर्ता कोई मशीन नहीं है, जिसे आदेश देकर हर परिस्थिति में परिणाम हासिल कर लिया जाए। शुक्ल कहते हैं कि स्थानीय नेताओं की उपेक्षा होगी, कार्यकर्ताओं की शिकायतें अनसुनी रहेंगी और संगठनात्मक जिम्मेदारी के बजाय केवल बड़े चेहरों पर निर्भरता बढ़ेगी, तो चुनावी मशीनरी की कार्यक्षमता प्रभावित होगी ही। शुक्ल की राय में, बीजेपी के लिए अब समय है कि स्थानीय नेतृत्व को उचित सम्मान दे और कार्यकर्ताओं को चुनावी गणित का साधन मानने के बजाय पार्टी की केंद्रीय शक्ति के रूप में स्वीकार करे। क्योंकि सियासी किले केवल ऊंची दीवारों से सुरक्षित नहीं रहते। बल्कि उनकी नींव भी मजबूत होनी चाहिए। वाराणसी और नागपुर ने बीजेपी को यही चेतावनी दी है। सवाल अब यह नहीं कि पार्टी हारी क्यों, बल्कि यह है कि क्या वह अपनी हार से सबक लेगी?
– राकेश दुबे (वरिष्ठ पत्रकार)
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