Narendra Modi: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 76 साल के हो गए। गुजरात के वड़नगर (Vadnagar) में जन्म 17 सितंबर 1950 को जन्मा एक शख्स, जिसने देश के प्रधानमंत्री (Prime Minister) जैसे सबसे अहम पद की अपनी यात्रा में भारतीय राजनीति के शब्दकोश के कई पुराने और स्थापित अर्थ भी पूरी तरह से बदल दिए। भारतीय राजनीति में नरेंद्र मोदी (Narendra Modi) एक ऐसा नाम, जिसने राजनीति में वंश से ज्यादा संघर्ष, विरासत से ज्यादा संगठन और पहचान से ज्यादा प्रदर्शन को अपनी राजनीतिक पूंजी बनाया। गुजरात (Gujarat) के वडनगर के एक साधारण परिवार से निकला बालक। रेलवे स्टेशन की चाय (Tea Shop) की दुकान से जुड़ी बचपन की स्मृतियां। और फिर देश की राजनीति (Politics) के सबसे ऊंचे शिखर तक पहुंचा एक व्यक्ति। यह कहानी केवल नरेंद्र मोदी की नहीं है। यह बीजेपी (BJP) के रूपांतरण की कहानी भी है। सन 2014 में जब मोदी पहली बार प्रधानमंत्री बने, तब बीजेपी केवल सात राज्यों में सत्ता में थी। 2026 तक बीजेपी-नीत एनडीए (NDA) का शासन 21 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों तक पहुंच चुका है। यह विस्तार भारतीय राजनीति के संघीय नक्शे में एक असाधारण परिवर्तन है।

बीजेपी बनी दुनिया की सबसे बड़ा राजनीतिक दल
मोदी की राजनीति ने बीजेपी को केवल चुनाव लड़ने वाली पार्टी नहीं रहने दिया। उसे चुनाव जीतने वाली मशीनरी में बदलने की प्रक्रिया को तेज किया। बूथ से लेकर दिल्ली तक। कार्यकर्ता से लेकर प्रधानमंत्री तक। मोबाइल ऐप से लेकर घर-घर संपर्क तक। बीजेपी का संगठन, बूथ-केंद्रित हुआ। कार्यकर्ता केंद्रित हुआ। डेटा केंद्रित हुआ। और 2025 में बीजेपी की सदस्य संख्या लगभग 14 करोड़ और छह लाख से अधिक बूथों पर संगठनात्मक समितियों तक पहुंच गई। बीजेपी दुनिया की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी है। और यही वह जगह है जहां मोदी की राजनीति का एक महत्वपूर्ण सूत्र दिखाई देता है। मोदी जानते थे कि नेता अकेला चुनाव नहीं जीतता। पीछे खड़ा संगठन चुनाव जीतता है। मोदी ने इसी संगठन को अपने राजनीतिक मॉडल का आधार बनाया। फिर आया दूसरा परिवर्तन – सोशल इंजीनियरिंग। दशकों से भारतीय राजनीति में जाति अक्सर चुनावी समीकरण का केंद्र थी। हर जाति का अपना वोट बैंक। हर समुदाय का वोट और हर क्षेत्र का वोट। मोदी ने इस गणित को पूरी तरह समाप्त नहीं किया। बल्कि उसके ऊपर एक नया राजनीतिक गणित खड़ा किया। जाति के ऊपर लाभार्थी। स्थानीय पहचान के ऊपर राष्ट्रीय पहचान। और पारंपरिक समीकरणों के ऊपर ‘विकास’ का दावा। उज्ज्वला, जनधन, प्रधानमंत्री आवास, घर घर शौचालय, आयुष्मान भारत, पीएम किसान, मुफ्त राशन। इन योजनाओं ने राजनीति में एक नया शब्द लोकप्रिय किया और वह था लाभार्थी। यही मोदी मॉडल की एक महत्वपूर्ण विशेषता बनी।
सरकारी योजनाएं अर्थात एक तीर, कई निशाने
सरकार योजना बनाती है। लाभ सीधे व्यक्ति तक पहुंचता है। और व्यक्ति योजना को सरकार से जोड़ता है। लेकिन कहानी इतनी सरल भी नहीं है। मोदी ने जाति की राजनीति को पूरी तरह से खत्म करने के बजाय उसके साथ एक नया लाभार्थी और विकास – केंद्रित राजनीतिक समीकरण जोड़ा। यही है राजनीति का नया पेंच। ऊंची जाति, ओबीसी, दलित, आदिवासी, महिला, किसान, गरीब, और नया मध्यम वर्ग। अलग-अलग सामाजिक समूहों के लिए अलग-अलग सरकारी योजनाएं। लेकिन राजनीतिक संदेश एक – विकास का लाभ सीधे घर तक। इसीलिए मोदी की राजनीति को केवल हिंदुत्व या केवल विकास की राजनीति कहना सही नहीं होगा। एक और बड़ा बड़ा परिवर्तन रहा बीजेपी की सामाजिक पहुंच। कभी बीजेपी पर शहरी और ऊंची जातियों की पार्टी थी। मोदी युग में पार्टी ने ओबीसी, दलित, आदिवासी, महिलाओं और गरीब लाभार्थियों तक अपनी पहुंच बढ़ाने का प्रयास किया। राजनीति में इसे ही कहते हैं ‘एक तीर, कई निशाने।’ एक तरफ वैचारिक कोर। दूसरी तरफ सामाजिक विस्तार। तीसरी तरफ कल्याणकारी योजनाएं। चौथी तरफ मजबूत संगठन। और पांचवीं तरफ नरेंद्र मोदी का व्यक्तिगत राजनीतिक ब्रांड। यह संयोजन बीजेपी की चुनावी राजनीति की पहचान बना।

भारतीय राजनीति का केंद्र बदल दिया मोदी ने
और फिर आया कांग्रेस का पतनकाल। 2014 में बीजेपी ने लोकसभा में 282 सीटें जीतीं। 2019 में यह संख्या 303 हुई। उसी अवधि में कांग्रेस 44 से 52 सीटों तक नीचे गिर गई। 2024 में तस्वीर बदली। बीजेपी 240 सीटों पर रही और अपने दम पर बहुमत से नीचे आ गई, तो कांग्रेस ने भी दम दिखाया और 99 तक पहुंच गई। हालांकि बीजेपी लोकसभा की सबसे बड़ी पार्टी बनी रही और असके नेतृत्व में एनडीए ने सरकार बनाई। और 2024 ने दिखाया कि मोदी की राजनीतिक शक्ति बहुत बड़ी होने के बावजूद चुनावी राजनीति में उनकी प्रतिस्पर्धा अभी समाप्त नहीं हुई। फिर भी एक तथ्य निर्विवाद है कि नरेंद्र मोदी ने भारतीय राजनीति का केंद्र बदल दिया। कांग्रेस लंबे समय तक भारतीय राजनीति की स्वाभाविक धुरी रही थी। मोदी के दौर में कांग्रेस को हटाकर बीजेपी उस केंद्रीय धुरी में केंद्रीय स्थान पर आ गई। यह परिवर्तन केवल चुनावी सीटों का परिवर्तन नहीं था। यह राजनीतिक भाषा का परिवर्तन था। ‘सरकार’ से ‘डिलीवरी’ तक। ‘वोट बैंक’ से ‘लाभार्थी’ तक। ‘दिल्ली’ से ‘बूथ’ तक। ‘पार्टी’ से ‘ब्रांड’ तक।

नरेंद्र मोदी की एक बहुत बड़ी राजनीतिक प्रतिभा यह भी है कि वे समय की नब्ज को पढ़ने की क्षमता रखते हैं। अपने भाषण को अभियान में बदलते हैं। अभियान को संगठन में बदलते हैं। संगठन को चुनावी मशीनरी में बदलते हैं और सरकारी योजना को राजनीतिक संवाद में। यह संयोग नहीं, रणनीति है। साधारण परिवार से आए मोदी के लिए राजनीति में सबसे बड़ी पूंजी धन नहीं थी, वंश नहीं था, राजनीतिक खानदान नहीं था। बल्कि पूंजी थी, संगठन, परिश्रम, संचार और अवसर पहचानने की क्षमता। वडनगर के साधारण पारिवारिक परिवेश और शुरुआती जीवन के संघर्षों का साथ मोदी की हर कार्यशैली साफ दिखता है। इसलिए मोदी की कहानी भारतीय राजनीति में इतनी असाधारण दिखाई देती है।बचपन में ही पता नहीं कब उन्होंने इस कहावत को दिमाग पर अंतकित कर लिया था कि ‘मंजिल उन्हीं को मिलती है, जिनके सपनों में जान होती है।’ वडनगर से दिल्ली तक का रास्ता लंबा था। लेकिन उससे भी लंबी राह थी बीजेपी को बदलने की, जिसे उन्होने सफलतापूर्वक बदल दिया।
अब यहां से अगली राह है मोदी के मुकाम की
आज नरेंद्र मोदी का नाम केवल प्रधानमंत्री के रूप में नहीं देखा जाता। वह बीजेपी के राजनीतिक परिवर्तन का केंद्रीय संदर्भ भी बन चुका है। बारह वर्ष सत्ता में रहना एक उपलब्धि है। बारह वर्ष बाद भी राजनीतिक केंद्र बने रहना दूसरी बात है। और कभी केवल दो सांसदों वाली रही अपनी पार्टी को सात राज्यों से 21 राज्यों वाले शासन तक पहुंचते देखना भारतीय राजनीति के इतिहास में एक अलग अध्याय है। और सबसे बढ़कर नरेंद्र मोदी अपने आप में एक ऐसा राजनीतिक आख्यान है, जिसे बीजेपी ने बीते बारह वर्षों में देश के बड़े हिस्से तक पहुंचाया है। नरेंद्र मोदी की राजनीतिक यात्रा का सबसे बड़ा सबक है कि साधारण शुरुआत इतिहास की सीमा नहीं होती। दमदार लोगों के लिए वही शुरुआत सबसे लंबी छलांग की पहली सीढ़ी भी बन जाती है।
– निरंजन परिहार
(लेखक राजनीतिक विश्लेषक हैं एवं सन 2013-14 में गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी के देश का प्रधानमंत्री बनने के महाअभियान में चुनावी रणनीतिक टीम में काम कर चुके हैं)
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