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Home»देश-प्रदेश»Rajasthan Congress: कांग्रेस में विचित्र हालात… राजस्थान में किसी को परवाह ही नहीं!
देश-प्रदेश 7 Mins Read

Rajasthan Congress: कांग्रेस में विचित्र हालात… राजस्थान में किसी को परवाह ही नहीं!

Prime Time BharatBy Prime Time BharatMarch 3, 2026No Comments
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Dovind Singh Dotasra Rajasthan Congress Prime Time Bharat
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Rajasthan Congress: राजस्थान कांग्रेस (Congress) इस समय एक विचित्र मोड़ और मॉड पर है। उसके नेता और नेतृत्व नर्म फ़ज़ा की करवटें ले रहे हैं। लेकिन आम कार्यकर्ता इसे देखकर हैरान और परेशान है; क्योंकि पूरे राजस्थान (Rajasthan) प्रदेश में ऐसी कोई गतिविधि नहीं है, जिसने सत्तापक्ष को थोड़ा सा भी परेशान किया हो। इस बार तो विधानसभा तक में राजस्थान कांग्रेस (Rajasthan Congress) पार्टी का प्रदर्शन दयनीय रहा है। ऐसा कोई प्रश्न नहीं, जो सत्ता पक्ष को विचलित करे और शून्यकाल में ऐसा कोई मुद्दा नहीं कि सरकार भावशून्य दिखे।

Table of Contents

Toggle
  • कांग्रेस बेहद कमजोर साबित रही सदन में इस बार
  • सत्ता में आने और वापसी न होने का दर्द दोनों तरफ
  • संगठन सृजन अभियान बना संगठन विसर्जन अभियान
  • बीजेपी को फ़ायदा देने के तरीक़े से बनाए जिला अध्यक्ष
  • कांग्रेस नेतृत्व किसी कार्यकर्ता की सुनता कहां है ?
          • -त्रिभुवन (राजस्थान के वरिष्ठ पत्रकार)

कांग्रेस बेहद कमजोर साबित रही सदन में इस बार

विधानसभा में पार्टी के सदस्य न तो कभी इतनी संख्या में मौजूद रहे कि वे सत्तापक्ष को उस समय घेर लें, जब वे कम हों और न ही वे इतनी सुनियोजित आक्रामकता और तथ्यात्मक तैयारी से आए कि सत्ता पक्ष के मंत्री विचलित हों। इस मामले में कांग्रेस के पास बेहतर रणनीतिक मौक़ा था; क्योंकि उनके सामने सदन के रणक्षेत्र में नेता सहित पूरा फ़ौज़फ़ाटा ही अनाड़ी और अनुभवहीन था। भाजपा के वे नेता इस समय सदन के भीतर कांग्रेस के लगभग अनुपस्थित प्रदर्शन से बहुत हैरान हैं, जो ये मानकर चल रहे थे कि राज्यपाल के अभिभाषण पर बहस से लेकर बजट पर बहस और बाद में विभागीय मांगों पर कांग्रेस के व्यापक अनुभवी हां पक्ष को हलकान कर देंगे! लेकिन कई अनुभवी नेता तो वहां गए ही नहीं। संगठन और सदन के स्तर पर यह सियासी तुर्फ़ा तमाशा आम कार्यकर्ता और इस दल से सहानुभूति रखने वालों के दिलों को दुखा रहा है। सत्ता पक्ष अगर बहुत कुशल और तेजतर्रार हो और हाइकमान मज़बूत और अतिरिक्त सजग भी हो तो प्रतिपक्ष में ठंडी हवाएं बुरी आशंकाओं को जन्म देती हैं।

Rajasthan Congress Ashok Gehlot Sachin Pilot Prime Time Bharat
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सत्ता में आने और वापसी न होने का दर्द दोनों तरफ

राजस्थान कांग्रेस में अभी दो ही नेता ऐसे हैं, जो एक नंबर और दो नंबर पर हैं। यह नहीं कह सकते कि इनमें एक नंबर कौन और दो नंबर पर कौन है। एक को प्रदेश की जनता और हाईकमान ने तीन मौक़े दिए और वे इन तीनों मौक़ों पर बेहतरीन योजनाए देने के बावजूद पार्टी को सत्ता में नहीं लौटा पाए; लेकिन अगर हम भाजपा हाईकमान को देखें तो उसने वसुंधरा राजे जैसी आर्टिक्युलेट और बेहद लोकप्रिय तथा प्रभावशाली नेता को भी तीसरा मौक़ा नहीं दिया; क्योंकि उन्होंने दो सरकारें खो दी थीं। हर हाईकमान को कुछ न कुछ मानदंड तो रखने ही चाहिए। लेकिन इसका मतलब यह भी नहीं है कि अगर आपके पास कोई बेहतरीन नेता हो तो उसे आप इस तरह दरकिनार कर दें, जिस तरह भाजपा ने पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे को करने में कोई संकोच नहीं किया है। यह राजनीतिक दलों की लोकतांत्रिक मर्यादाओं का हनन है और इसका ख़ामियाज़ा देर-सबेर ऐसा करने वालों को किसी न किसी रूप में चुकाना पड़ता है। लेकिन कोई नेता अगर अपने दल के भीतर सत्ता के केंद्रीय कक्ष में ख़ुद ही को रखकर चलता है तो वह अपना न सही, दल की भावी संभावनाओं पर तुषारापात करता है और नए नेतृत्व की सुबहों को धुआं-धुआं और सियासी ख़ूबसूरतियों के हुस्न को उदास-उदास करके ही दम लेता है। और एक दिन इस तरह की नीम निगाहियों के कारण हालात आंखें चुराने लगते हैं।

संगठन सृजन अभियान बना संगठन विसर्जन अभियान

हालांकि यह तथ्य है कि राजस्थान में 1985 के बाद कांग्रेस या बीजेपी ने ऐसा कोई नेता पैदा नहीं किया है, जिसमें सरकार को रिपीट करने की कुव्वत रही हो। इससे पता चलता है कि राजस्थान की राजनीति में पिछले पैंतीस चालीस साल में न तो कोई जयनारायण व्यास हुआ है, जिसका नैतिक आभामंडल हो और न ही कोई मोहनलाल सुखाड़िया, जिसका लोकसमाज से बहुत सशक्त संवाद हो! लेकिन हम इस दल में एक और दो से आगे चलें तो फिर नौ तक एक भी नहीं और दस पर इतने लोग हैं कि उनमें आप किसी एक को नहीं ही वरीयता दे सकते। कुछ जाति के कारण लीडर माने जाते हैं तो कुछ पद मिल जाने से। संगठन सृजन अभियान संगठन विसर्जन अभियान के रूप में सुसंपन्न हुआ है, जिसके नतीजे आगामी विधानसभा चुनाव में एकदम सटीक ढंग से सामने आएंगे। हैरानियां ये हैं कि पहले तो लोगों को टिकट थमाए गए और फिर जब चुनाव जीत गए तो अधिकतर विधायकों को ही जिला अध्यक्ष भी बना दिया गया; जबकि बेहतर ये था कि ये पद उन नेताओं में से किसी नेता को दिए जाते, जो टिकट के प्रबल दावेदार थे।

Govind Singh Dotasara Rajasthan Congress Prime Time Bharat
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बीजेपी को फ़ायदा देने के तरीक़े से बनाए जिला अध्यक्ष

अब जहां-जहां सिटिंग एमएलए को जिलाध्यक्ष बनाया गया है, वहां वे पूरे जिले के विधायकों के स्वाभाविक बॉस बन गए हैं; जो संगठन मनोविज्ञान की दृष्टि से एक खण्डित मानसिकता को पैदा करता है। इतना ही नहीं, बहुत से इलाक़ों में बीजेपी को टक्कर देने के बजाय उसे फ़ायदा पहुंचाने वाले तरीक़े से जिला अध्यक्ष बनाए गए हैं। जैसे मेवाड़ की आदिवासी बेल्ट में सभी संवैधानिक पद एसटी के हैं तो वहां ग़ैरएसटी वर्ग के लोग संगठन को छोड़कर कहां जाएं? ऐसा ही टोंक-सवाई माधोपुर जैसे इलाक़ों में हुआ है। सच कहें तो इस किस्से का कोई अंत ही नहीं है। लेकिन यह जाने किस नज़र का फ़रेब है कि हाईकमान मानती है कि राजस्थान में उसकी लीडरशिप बेहतर है। अपने प्रदेश के हारे हुए प्रभारी हैं, जो इस प्रदेश में हार के बावजूद बने हुए हैं और कमोबेश यही हालात प्रदेश नेतृत्व के हैं। अगर पार्टी एक सजग निगाह से देखे तो उसे अभी संभल लेना चाहिए और उसके बाद उन नेताओं को प्रमुख भूमिका में रखना चाहिए; जिनमें राजनीति समझने की नैसर्गिक प्रतिभा है; लेकिन जातिगत समीकरण उनके पक्ष में नहीं।

कांग्रेस नेतृत्व किसी कार्यकर्ता की सुनता कहां है ?

दरअसल बात यह नहीं कि इस तरह के नेता जातिबल में कमज़ोर हैं; बल्कि यह है कि कुछ तो कठपुतली न होने का अभिशाप भोग रहे हैं। कांग्रेस में अगर किसी बड़े नेता की कठपुतली होने का “गुण” हो तो वह पद और मद दोनों ही आसानी से पा जाता है; फिर चाहे फ़सलें बहार की ख़ाक उड़ा के ही क्यों न रह जाएं। इसीलिए कुछ नेताओं की उन निगाहों की तुर्फ़ा करिश्मा-साज़ियां देखते ही रहिए, जो फ़ित्ने सुला के तब तक ठहर जाती हैं, जब तक माहौल पक्ष में न हो, फ़ित्ने जगा के रखते हैं। लेकिन अब समय आ गया है कि इस सियासी दल को अपने आम कार्यकर्ता की आवाज़ को सुनना चाहिए। पिछले कुछ साल से कांग्रेस के तारों की आंख भी भर आई हैं कि कोई तो उनके दर्द आमेज़ लफ़्ज़ों को समझ लेगा। लेकिन उफ़ ये ज़मीं की गर्दिशें और आह ये हाइकमान के ग़म की ठोकरें। अगर राजस्थानी कहावत को याद करें तो ये कहना सटीक होगा कि इस पार्टी की हालत इस समय उस पुत्रवधू जैसी है, जिसके बारे में कहा जाता है कि कुठौड़ लागी, सुसरो बैद! जिसके पास इलाज है, वह ससुर है और चोट वाले हिस्से उसे दिखाए नहीं जा सकते और चोट ऐसी है कि इलाज सिर्फ़ ससुर जी बैद के पास ही है!  लेकिन कहीं ऐसा न हो कि रघुपति सहाय की तरह कहना पड़े : “तुम नहीं आए और रात रह गई राह देखती, तारों की महफ़िलें भी आज आंखें बिछा के रह गईं! झूम के फिर चलीं हवाएं वज्द में आईं फिर फ़ज़ाएं, फिर तिरी याद की घटाएं सीनों पे छा के रह गईं, क़ल्ब ओ निगाह की ये ईद उफ़ ये मआल-ए-क़ुर्ब-ओ-दीद चर्ख़ की गर्दिशें तुझे मुझ से छुपा के रह गईं”!

-त्रिभुवन (राजस्थान के वरिष्ठ पत्रकार)

 

इसे भी देखेंः Rajasthan News: अपने ही बोझ से भारी होती राजस्थान की कांग्रेसी राजनीति

यह भी पढ़िएः Rajasthan Congress: नए जिलाध्यक्षों पर सवाल, बवाल और कांग्रेस का हाल

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